पर्यावरण की दुर्दशा से कब मुक्त होगा भारत? | ब्लॉग | DW | 12.11.2018
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ब्लॉग

पर्यावरण की दुर्दशा से कब मुक्त होगा भारत?

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा, इन मामलों में भारत पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं के नजदीक है. लेकिन देश में पर्यावरण की कुल स्थिति शोचनीय ही कही जाएगी. चाहे घटते जंगल हों या बढ़ता प्रदूषण.

भारत सरकार का दावा है कि जलवायु परिवर्तन पर वो अपनी दो प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की राह पर है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की तीव्रता में कमी और नॉन फॉसिल ईंधन के उपयोग की बढ़ती दर को देखते हुए माना जा रहा है कि भारत 2030 की डेडलाइन से पहले  ही निर्धारित मानकों को पूरा कर सकता है. लेकिन हरित भारत अभियान के मामले में लक्ष्य लगातार फिसलता जा रहा है.

माना जा रहा है कि अपने लक्ष्यों की ओर प्रगति की रिपोर्ट सरकार अगले महीने तक, संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्यदायी संस्था, यूएनएफसीसीसी को सौंप सकती है. बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार ने रिपोर्ट के ड्राफ्ट की समीक्षा करते हुए बताया है कि पेरिस समझौते के तहत भारत ने तीन प्रतिबद्धताएं जतलाई थीं. अपनी जीडीपी की ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की तीव्रता में 2030 तक 33-35 प्रतिशत की कटौती कर उसे 2005 के स्तर से नीचे लाना. इसके अलावा नॉन फॉसिल ईंधन स्रोतों पर आधारित ऊर्जा क्षमता 40 फीसदी करना.

इस दौरान भारत 2030 तक ढाई से तीन अरब टन कार्बन सिंक यानी वनक्षेत्र तैयार करेगा. जंगल वातावरण से कार्बन डाय ऑक्साइड गैस को अवशोषित करते हैं और इसीलिए उन्हें कार्बन सिंक कहा जाता है. मीडिया खबरों के मुताबिक रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्सर्जन तीव्रता 2014 तक 21 फीसदी तक नीचे आई है. 2010 से 2014 के दरम्यान सुधार की दर 2005-2010 के मुकाबले बेहतर पाई गई है. इसी तरह केंद्रीय ऊर्जा प्राधिकरण के मुताबिक गैर-फॉसिल ईंधन पर आधारित ऊर्जा क्षमता में 35 फीसदी का योगदान हुआ है.

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जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत अपनी प्रतिबद्धताओं में भले ही आगे रहना चाहता है लेकिन सरकारों का और अधिकारियों का रवैया कुल मिलाकर पर्यावरण को लेकर उदासीन ही रहा है. फिर वो चाहे गंगा जैसी नदियों का प्रदूषण हो या फिर छोटे बड़े शहरों, महानगरों का वायु प्रदूषण. दिल्ली ही नहीं देश के कई शहर धूल और धुएं से घिरे हुए हैं. पर्यावरण में आ रहे बदलावों से पहाड़ी इलाके भी अछूते नहीं है.

स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के कुप्रभावों के बारे में अपनी तरह की पहली बैठक पिछले दिनों जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बुलाई थी लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस महत्त्वपूर्ण बैठक में भारत सरकार का कोई मंत्री नहीं पहुंचा. बैठक में स्वास्थ्य, पर्यावरण और पेट्रोलियम मंत्रियों को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था लेकिन तीनों केंद्रीय मंत्री उन दिनों सरकार पटेल की मूर्ति के अनावरण के अवसर पर रन फॉर यूनिटी अभियान में व्यस्त थे. इससे भारत की पर्यावरण को लेकर गंभीरता और सरकार के रवैये का भी पता चलता है. इस बैठक में भारत एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था और अपने अनुभवों और हालात को साझा भी कर सकता था.

आज स्थिति ये है कि वायु की गुणवत्ता, जैव विविधता और ग्रीन हाउस उत्सर्जन के मामलों पर अपेक्षित सुधार न कर पाने के कारण भारत वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में सबसे निचले पायदानों पर है. 2018 में भारत 180 देशों में 177वें स्थान पर है. ये आंकड़ा स्टेट ऑफ इंडिया एन्वायरन्मेंट (एसओई) की रिपोर्ट में आया है. ऊर्जा क्षेत्र में भी स्थिति निराशाजनक है. 2022 तक 175 गीगावॉट की अक्षय ऊर्जा की स्थापना का लक्ष्य सुस्ती का शिकार है.

वन क्षेत्र में यूं तो करीब 0.2 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है लेकिन ये वृद्धि दरअसल खुले जंगल की है जिसमें व्यवसायिक वृक्षारोपण शामिल है. सघन वन का दायरा सिकुड़ रहा है. एक चिंताजनक पहलू ये भी है कि निर्माण कार्यों के लिए जंगल काटने का सिलसिला बढ़ा है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की आपत्तियों और फटकार के बावजूद ऐसे निर्माण जारी हैं. हाल का उदाहरण उत्तराखंड की चार धाम ऑल वेदर रोड परियोजना है. रही सही कसर, वाहनों की संख्या में बढोतरी से फैलते प्रदूषण और जंगलों की आग ने पूरी कर दी है.

जलवायु परिवर्तन को लेकर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में पिछले दिनों भारत के लिए कुछ गंभीर चेतावनी थी. रिपोर्ट के मुताबिक अगर हालात न सुधरे तो 2050 तक भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी का करीब तीन फीसदी गंवाना पड़ सकता है. इसका असर देश की करीब आधी आबादी के जीवन स्तर पर भी पड़ेगा. ऐसी स्थिति में भारत को तत्काल न सिर्फ अपने पर्यावरण सुधार कार्यक्रमों, नीतियों, कानूनों और अभियानों को चाकचौंबद करना चाहिए, बल्कि उन पर नए सिरे से विचार भी करना चाहिए.

सामाजिक तौर पर लोगों को और जागरूक करने के अभियान पूरी तेजी और ताजगी से चलाए जाने चाहिए और उन्हें बेशुमार नारों, एकदिवसीय भव्यताओं और दीर्घकालीन राजनीतिक नफेनुकसान के गणित से बचाया जाना चाहिए. पर्यावरणीय चेतना, एक समग्र नागरिक और मनुष्य चेतना का अटूट हिस्सा है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए.

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