परिपक्वता दिखाने का वक्त | ब्लॉग | DW | 31.12.2014
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ब्लॉग

परिपक्वता दिखाने का वक्त

जम्मू कश्मीर में चुनाव हो गए. बड़ी पार्टियों के नेताओं ने राज्यपाल से मुलाकात जरूर की है लेकिन सरकार बनाने की कोई कवायद नहीं दिख रही. राजनीतिक दलों के लिए यह लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी दिखाने का वक्त है.

लोकतंत्र में चुनाव जनप्रतिनिधित्व वाली सरकार बनाने के लिए होते हैं, पार्टियों या नेताओं के हितसाधन के लिए नहीं. जम्मू कश्मीर की जनता ने हाल में हुए चुनावों में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है लेकिन अपनी प्राथमिकताएं दिखाईं हैं. अब विधान सभा में पहुंची पार्टियों की जिम्मेदारी सरकार चलाने लायक बहुमत खोजने की है और लोकतंत्र में इसका रास्ता बातचीत है. और बातचीत की पहल उन पार्टियों को करनी चाहिए जिन्हें सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं और जो बहुमत के लायक समर्थन जुटाने की स्थिति में हैं.

भारत का संविधान बहुमत वाली सरकार के गठन की मांग नहीं करता लेकिन सरकार के पास बहुमत होने की मांग जरूर करता है. परिपक्व लोकतंत्र का मतलब होता है कि शासन करने वाली दूसरी पार्टियों या नेताओं की मजबूरी का फायदा उठाने या उनके हितों का शिकार बनने के बदले बातचीत के जरिये न्यूनतम कार्यक्रम तय करें और स्थिर सरकार देने की कोशिश करें. जम्मू कश्मीर में चार पार्टियां विधान सभा में पहुंची हैं. पीडीपी के पास सबसे ज्यादा सीटें हैं, उसे सरकार का नेतृत्व करने का हक है. वह या तो कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ मिलकर सरकार बना सकती है या बीजेपी के साथ मिलकर. लेकिन नतीजे आने के इतने दिन बाद तक सरकार बनाने की कोई बातचीत शुरू नहीं हुई है.

परंपराएं जो भी रही हों, परिपक्वता दिखाने का वक्त आ गया है. लोकतंत्र की पहचान मुश्किल परिस्थितियों में ही होती है और राजनीतिक दलों के लिए चुनाव का नतीजा ऐसी ही मुश्किल स्थिति है जिसमें प्रतिद्वंदी या विरोधी पार्टी के साथ सहयोग करना है. लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व राजनीतिक दलों का ही है. वे अपने अपने राजनीतिक कार्क्रम के साथ लोगों का समर्थन जीतने की कोशिश कर रहे हैं, एक दूसरे से प्रतिद्वंद्विता कर रहे हैं, दुश्मनी नहीं. चुनाव का मैदान युद्ध का मैदान नहीं है, जिसका मकसद एक दूसरे को खत्म करना हो. चुनाव खत्म हो गया, अब उन्हें हकीकत की जमीन पर उतरना चाहिए और प्रांत में सुरक्षा और विकास के लिए स्वच्छ और स्थिर प्रशासन देने की कोशिश करनी चाहिए. तभी पार्टियों में और लोकतंत्र में लोगों का भरोसा बनेगा.

ब्लॉग: महेश झा

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