परमाणु देशों की हथियारों में बढ़ती रुचि | दुनिया | DW | 15.06.2015
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दुनिया

परमाणु देशों की हथियारों में बढ़ती रुचि

दुनिया भर में शांति स्थापना करने के उद्देश्य पर केंद्रित सिपरी की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि निरस्त्रीकरण के वायदों के बावजूद परमाणु देशों की रुचि हथियारों में बढ़ती हुई नजर आ रही है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च (सिपरी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2010 से 2015 के बीच दुनिया भर में वॉरहेड की संख्या 22,600 से कम हो कर 15,850 हो गयी है. सालाना रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014 की तुलना में यह संख्या 500 कम है. रिपोर्ट के अनुसार हथियारों की संख्या में भारी कमी का मुख्य श्रेय अमेरिका और रूस को जाता है क्योंकि 90 फीसदी हथियार इन्हीं दोनों देशों के पास हैं. अमेरिका के पास 7,260 जबकि रूस के पास करीब 7,500 मुखास्त्र हैं.

हालांकि इस दौरान हथियारों के आधुनिकीकरण पर कई "लंबे और बेहद महंगे प्रोग्राम" चलाए गए. सिपरी के रिसर्चर शैनन काइल ने एक बयान में इस बारे में कहा, "परमाणु निरस्त्रीकरण की ओर अंतरराष्ट्रीय रुझान के बावजूद, परमाणु हथियार रखने वाले देशों का इनके आधुनिकीकरण के लिए बड़े कार्यक्रम चलाना दिखाता है कि निकट भविष्य में इनमें से कोई भी अपने परमाणु हथियार नहीं त्यागेगा."

1968 में हुई परमाणु अप्रसार संधि के अन्य तीनों देश चीन, फ्रांस और ब्रिटेन "या तो परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के लिए नए सिस्टम तैयार कर रहे हैं, कर चुके हैं या ऐसा करने का इरादा रखते हैं." चीन के पास 260, फ्रांस के पास 300 और ब्रिटेन के पास 215 वॉरहेड मौजूद हैं. अमेरिका और रूस समेत ये पांचों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य हैं. रिपोर्ट के अनुसार पांचों देशों में चीन ही एकमात्र देश है जिसके मुखास्त्रों की संख्या में "मामूली" वृद्धि देखी गयी है. अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस के पास ही 4,300 सक्रिय परमाणु हथियार हैं और इनमें से 1,800 को "हाई अलर्ट" की श्रेणी में रखा गया है.

भारत और पाकिस्तान का मसला

वहीं भारत और पाकिस्तान अपने हथियार बढ़ाने में लगे हैं. भारत के पास 90 से 110 और पाकिस्तान के पास 100 से 120 के बीच वॉरहेड हैं, जबकि इस्राएल के पास 80. इसके अलावा उत्तर कोरिया के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि वह छह से आठ मुखास्त्रों वाला शस्त्रागार बना तो रहा है लेकिन उसके तकनीकी विकास का आकलन करना मुश्किल है.

रिपोर्ट ने पारदर्शिता के मुद्दे पर लिखा है कि अमेरिका एकमात्र ऐसा देश है जो अपने हथियारों के बारे में खुल कर जानकारी देने के लिए तैयार है. इसके विपरीत ब्रिटेन और फ्रांस कुछ जानकारी गोपनीय रखते हैं और रूस कुछ भी आधिकारिक रूप से नहीं बताता है. इसके अलावा चीन भी गोपनीयता में विश्वास रखता है और भारत और पाकिस्तान से परमाणु हथियारों को ले कर केवल यही खबर मिल पाती है कि उन्होंने कोई नया परीक्षण किया है. काइल ने कहा कि इन देशों में परमाणु हथियारों से जुड़ी जानकारी को "देश की सुरक्षा में सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है." हाल ही में भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा कि पिछले 40-50 साल से किसी बड़ी जंग के ना होने के कारण सेना की प्रतिष्ठा में कमी आई है. पर्रिकर की इस बयान पर भारी आलोचना हो रही है.

आईबी/एमजे (डीपीए, एएफपी)

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