पनबिजली परियोजना के खिलाफ तेज होती आवाजें | दुनिया | DW | 14.04.2017
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

पनबिजली परियोजना के खिलाफ तेज होती आवाजें

असम-अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर सुबनसिरी नदी पर देश की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना का काम दोबारा शुरू करने के फैसले का असम में भारी विरोध हो रहा है.

असम राज्य विधानसभा ने बीते महीने दो हजार मेगावाट वाली इस परियोजना का काम दोबारा शुरू करने पर सहमति दी थी और सरकार से इसका काम जल्द शुरू कराने को कहा था. विभिन्न संगठनों के विरोध की वजह से दिसंबर, 2011 से ही इसका काम ठप है. अब तक महज 56 फीसदी काम ही पूरा हुआ है.

काम शुरू करने की मांग

राज्य विधान सभा में इस सप्ताह उक्त परियोजना का काम दोबारा शुरू करने की मांग उठी. तमाम राजनीतिक दलों ने इसके लिए आम सहमति से एक प्रस्ताव भी पारित किया. केंद्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने भी परियोजना का काम जल्दी ही शुरू करने की बात कही है. विधानसभा अध्यक्ष हितेंद्र नाथ गोस्वामी कहते हैं, "असम के विकास के लिए इस परियोजना को शीघ्र पूरा करना जरूरी है. सरकार को राज्य के लोगों और संगठनों से बातचीत के जरिये उनको भरोसे में लेकर इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए." बीजेपी विधायक देवेंद्र नाथ हजारिका ने सदन में यह मुद्दा उठाया था. इस पर चर्चा के बाद गोस्वामी ने कहा कि सदन में इस परियोजना का निर्माण कार्य दोबारा शुरू करने पर आम राय है. इस मुद्दे को तत्काल हल किया जाना चाहिए. उनका कहना था, "बिजली के बिना राज्य का औद्योगिकीकरण संभव नहीं है. यह जनहित से जुड़ा एक बेहद अहम मसला है."

सरकार की ओर से बिजली मंत्री पल्लब लोचन दास ने कहा, "सरकार परियोजना का विरोध करने वाले संगठनों से बातचीत के लिए तैयार है." उन्होंने भरोसा दिया कि सर्वानंद सोनोवाल सरकार शीघ्र इस दिशा में पहल करेगी. बिजली मंत्री ने बताया कि नेशनल हाइड्रो पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) की इस परियोजना का 56 फीसदी काम पूरा हो गया है. वह बताते हैं, "शुरूआती दौर में परियोजना के विरोध के बाद गठित विशेषज्ञ समिति ने बांध की डिजाइन में बदलाव समेत कई सिफारिशें की थीं. एनएचपीसी ने समिति की सभी सिफारिशों को मान लिया है."

सुबनसिरी परियोजना

असम-अरुणाचल सीमा पर सुबनसिरी नदी पर बनने वाली देश की इस सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना के साथ सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े वाली कहावत चरितार्थ हुई थी. वर्ष 2011 में इसके शुरू होते ही कृषक मुक्ति संग्राम समिति, अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद ने इसका विरोध शुरू कर दिया था. उनकी दलील थी कि परियोजना पूरी होने के बाद असम में इस नदी के किनारे बसे इलाकों में इसका काफी प्रतिकूल असर होगा और उनके वजूद पर खतरा पैदा हो जाएगा. इन संगठनों की दलील है कि हल्के भूकंप की स्थिति में भी इलाके में भारी तबाही फैलेगी. असम को इस परियोजना से 533 मेगावाट बिजली मिलनी है. इसे दिसंबर 2012 में तैयार होना था.

वर्ष 2002 में इसका खाका तैयार होने पर परियोजना की अनुमानित लागत 6,285 करोड़ रखी गई थी. लेकिन सितंबर, 2015 में यह बढ़ कर 18,064 करोड़ तक पहुंच गई. दिसंबर, 2011 तक इस परियोजना पर 8,400 करोड़ खर्च हो चुके थे. एनएचपीसी का कहना है कि इसके पूरी नहीं होने की वजह से उसे रोजाना एक करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है.

विरोध

आसू समेत दूसरे संगठनों के विरोध को ध्यान में रखते हुए असम सरकार ने दिसंबर, 2014 में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था. समझा जाता है कि समिति के चार स्थानीय सदस्यों ने परियोजना पर अपनी आपत्ति जताई थी. अब विधानसभा में इसका काम शुरू होने पर सहमति बनने के बाद तमाम संगठन एक बार फिर विरोध में लामबंद होने लगे हैं. आसू ने एक बयान में कहा है कि इस बांध के प्रतिकूल असर के बारे में लोगों के मन में जो शंकाएं हैं, उनका समाधान किए बिना वह बांध का निर्माण दोबारा शुरू नहीं होने देगा. पहले सरकार को इस मुद्दे पर विभिन्न विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट को अक्षरशः लागू करना चाहिए. संगठन ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और विधान सभा अध्यक्ष हितेंद्र नाथ गोस्वामी को भी पत्र भेजा है. इसमें परियोजना का काम शुरू करने के विधान सभा के फैसले को अलोकतांत्रिक और एकतरफा बताया गया है. आसू के अध्यक्ष दीपंकर नाथ कहते हैं, "असम सरकार या विधायक इस मुद्दे के विशेषज्ञ नहीं हैं. विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर इस बारे में कोई फैसला किया जाना चाहिए."

कृषक मुक्ति संग्राम समिति के सलाहकार अखिल गोगोई कहते हैं, "विभिन्न समितियों ने इस परियोजना के खिलाफ राय दी है. वर्ष 2010 में असम विधानसभा की ओर से गठित एक समिति ने भी मौजूदा स्वरूप में इलाके में बड़े बांधों का निर्माण नहीं करने की सलाह दी थी." इन संगठनों का कहना है कि जब तक बांध की प्रस्तावित ऊंचाई कम नहीं की जाती और निचले इलाकों पर इसके प्रतिकूल असर पर अंकुश लगाने के ठोस उपाय नहीं किये जाते, तब तक इसका काम दोबारा शुरू नहीं करने दिया जाएगा.

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुद्दे पर विभिन्न समितियों ने अलग-अलग सिफारिशें की हैं. उन तमाम समितियों की सिफारिशों को सामने रख कर आम सहमति बनाने और सुरक्षा के ठोस उपाय करने के बाद ही परियोजना का काम दोबारा शुरू करना बेहतर होगा. ऐसा नहीं होने की स्थिति में काम शुरू नहीं किया जा सकेगा. लेकिन केंद्र और असम की बीजेपी सरकारें अब विरोध की परवाह नहीं करते हुए इस परियोजना पर आगे बढ़ रही हैं. इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं.

रिपोर्टः प्रभाकर

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन