पत्रकारों के लिए नहीं, जनता के लिए जरूरी है प्रेस फ्रीडम | दुनिया | DW | 30.05.2019
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दुनिया

पत्रकारों के लिए नहीं, जनता के लिए जरूरी है प्रेस फ्रीडम

इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि मीडिया पर से लोगों का भरोसा उठने लगा है. और यही एक बड़ी वजह है कि दुनिया भर में नेता लोगों से यह कह पा रहे हैं कि पत्रकार उनके दुश्मन हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने मेनस्ट्रीम मीडिया को जब से "फेक न्यूज" कहना शुरू किया है, दुनिया भर में ये ट्रेंड चल पड़ा है. आज मीडिया की स्वतंत्रता पर जितना खतरा है, उतना अब तक कभी भी नहीं रहा है. डॉयचे वेले द्वारा जर्मनी के बॉन शहर में आयोजित ग्लोबल मीडिया फोरम के दौरान इस मुद्दे पर भी चर्चा हुई. एशियाई देशों में अभिव्यक्ति की आजादी की स्थिति को समझने के लिए भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, थाईलैंड और हांगकांग से पत्रकार शामिल हुए. सभी ने माना कि लोकतांत्रिक देशों में भी सरकारें मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा बनी हुई हैं.

भारत के वरिष्ठ पत्रकार और "द वायर ऑनलाइन" के सिद्धार्थ वरदराजन का कहना था कि आलोचना सरकार और बड़ी कंपनियों दोनों को ही पसंद नहीं आती है, "मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के दिखाए रास्ते पर चलता है. उसे खुद को सेंसर करने में कोई दिक्कत नहीं होती और वह उसी तरह से रिपोर्ट करता है जैसा कि सरकार चाहती है. जबकि जो पत्रकार सरकार के एजेंडे पर नहीं चलते हैं, उन्हें झूठे मानहानि के मुकदमों में फंसा कर उन पर दबाव बनाया जाता है."

बीजेपी अकसर "द वायर" पर कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार के खिलाफ लिखने का आरोप लगाती रही है. सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि उन्हें डर है कि लोकसभा चुनावों में भारी जीत के बाद मोदी सरकार देश में पत्रकारिता पर और काबू करने की कोशिश करेगी. वे कहते हैं, "सरकार पत्रकारों पर दबाव बनाने के लिए खुफिया एजेंसियों का भी सहारा लेती है. इस तरह के पत्रकारों को राष्ट्र विरोधी करार दिया जाता है. अभिव्यक्ति की आजादी और सोशल मीडिया पर नियंत्रण के लिए नए नए कानून बनाए जा रहे हैं."

स्वतंत्र है पाकिस्तान का मीडिया?

वहीं पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार शाहजेब जिलानी का कहना था कि जहां तक सरकार की आलोचना की बात है तो पाकिस्तान का मीडिया काफी स्वतंत्र है. भारत की तुलना में वहां एक बड़ा फर्क है, "आप नेताओं की आलोचना कर सकते हैं, यहां तक कि प्रधानमंत्री की भी लेकिन आप सेना के खिलाफ एक शब्द नहीं कह सकते. सेना ने एक तरह से न्यूज चैनलों पर कब्जा कर रखा है."

पश्तून तहफूज मूवमेंट (पीटीएम) की मिसाल देते हुए जिलानी बताते हैं, "पीटीएम की गतिविधियों के बारे में लोग केवल सोशल मीडिया के जरिए ही जान सकते हैं, मेनस्ट्रीम मीडिया ने तो जैसे इस पर एक अघोषित बैन लगा रखा है." पीटीएम दरअसल पाकिस्तान का एक मानवाधिकार संगठन है जो देश के उत्तर पश्चिमी हिस्से की दुर्दशा के लिए सेना को जिम्मेदार ठहराता है और वहां से सेना को हटाने की पैरवी करता है.

वहीं, बांग्लादेश के जाने माने पत्रकार, फोटोग्राफर और एक्टिविस्ट शाहिदउल आलम का कहना था की मीडिया की स्वतंत्रता सिर्फ एशिया में ही नहीं पूरी दुनिया में ही खतरे में है. शाहिदउल आलम को अगस्त 2018 में सरकार के खिलाफ प्रचार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और नवंबर 2018 में उन्हें जमानत पर रिहा किया गया.

जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में सरकारें अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया को दबाने की कोशिशों में लगी हैं, वहीं एशिया के अन्य देशों मसलन चीन और थाईलैंड में वे सीधे तौर पर मीडिया के कामकाज में हस्तक्षेप करती हैं.

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019

आलोचना से परे है चीनी सरकार

बीबीसी चीनी सेवा के पूर्व संपादक रेमंड पीटर ली का कहना था, "प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों की सूची में चीन 177वें पायदान पर है. सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी चीनी मीडिया पर नियंत्रण रखती है और फाइनेंशियल टाइम्स के अलावा बाकी सभी विदेशी समाचार सेवाएं वहां प्रतिबंधित हैं." ली का कहना है कि चीन में मीडिया संस्थान कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य ही चलाते हैं. ऐसे में, "आप उम्मीद नहीं कर सकते कि वे सरकार की आलोचना करेंगे."

जहां तक बात हांगकांग की है तो वहां भी मीडिया का बदलता हुआ रूप नजर आ रहा है. ली बताते हैं, "हांगकांग में जो लोग मीडिया संस्थान चलाते हैं, उन्हें चीन के साथ व्यापार भी करना होता है. ऐसे में हांगकांग में सेल्फ सेंसरशिप बढ़ने लगी है."

कुछ ऐसा ही हाल थाईलैंड का भी है. वरिष्ठ पत्रकार प्रवित रोजनाफरूक का कहना है कि पिछले पांच सालों में हालात बद से बदतर हो चले हैं, "थाईलैंड में आप राजा की आलोचना नहीं कर सकते हैं. राज तंत्र वहां आलोचना से परे है." रोजनाफरूक ने इसके लिए यूरोपीय संघ को भी कुसूरवार बताया. उन्होंने कहा कि ईयू आर्थिक कारणों से सैन्य जुंटा की गतिविधियों की अनदेखी करता है."

अपने पाठकों को ही भूल गया मीडिया

वहीं बांग्लादेश में "द डेली स्टार" अखबार के संपादक और प्रकाशक महफूज आनम का कहना था कि सरकारों ने हमेशा ही मीडिया की आवाज दबाने की कोशिश की है. फर्क सिर्फ इतना है, "अतीत में वे ऐसा छिप कर करते थे, अब खुल कर करते हैं." उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी विकास के कारण भी मीडिया को सेंसर करना अब ज्यादा आसान हो गया है.

इसके अलावा आनम ने यह भी कहा कि पत्रकारों को भी आत्मचिंतन की जरूरत है, "ट्रंप ने मेनस्ट्रीम मीडिया को जनता का दुश्मन घोषित कर दिया. हमें विश्लेषण करने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ. लोगों का पत्रकारों से भरोसा उठने लगा क्योंकि पत्रकार अपने पाठकों, अपने दर्शकों को ही भूल गया. आज हम विज्ञापन देने वालों को ज्यादा महत्व देने लगे हैं."

आनम ने कहा कि मीडिया की विफलता दुनिया भर में लोकतंत्र के लिए खतरा बन गई है, "वक्त आ गया है कि पत्रकार एकजुट हों. लोगों को यह समझना होगा कि मीडिया की स्वतंत्रता पत्रकारों के लिए नहीं, जनता के लिए जरूरी है."

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