पति की जागीर नहीं है पत्नी: सुप्रीम कोर्ट | दुनिया | DW | 27.09.2018
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दुनिया

पति की जागीर नहीं है पत्नी: सुप्रीम कोर्ट

भारत की सर्वोच्च अदालत ने ऐतिहासिक फैसले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 को असंवैधानिक और मनमाना ठहराया है. 158 साल पुरानी इस धारा के तहत व्यभिचार (एडल्ट्री) अपराध था.

फैसला सुनाने वाले एक जज ने कहा कि महिलाओं को अपनी जागीर नहीं समझा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि "एक पुरुष का शादीशुदा महिला के साथ यौन संबंध बनाना अपराध नहीं है."

मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने कहा, "व्यभिचार अपराध नहीं हो सकता. यह निजता का मामला है. पति, पत्नी का मालिक नहीं है. महिलाओं के साथ पुरूषों के समान ही व्यवहार किया जाना चाहिए."

मुख्य न्यायाधीश ने जस्टिस एएम खानविलकर की ओर से फैसला सुनाते हुए कहा कि कई देशों में व्यभिचार को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया गया है. उन्होंने कहा, "यह अपराध नहीं होना चाहिए."

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "किसी भी तरह का भेदभाव संविधान के कोप को आमंत्रित करता है. एक महिला को उस तरह से सोचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिस तरह से समाज चाहता है कि वह उस तरह से सोचे."

न्यायाधीश रोहिंटन एफ नरीमन ने फैसला सुनाते हुए कहा, "महिलाओं को अपनी जागीर नहीं समझा जा सकता है."

न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने एकमत लेकिन अलग फैसले में कहा कि समाज में यौन व्यवहार को लेकर दो तरह के नियम हैं, एक महिलाओं के लिए और दूसरा पुरूषों के लिए. उन्होंने कहा कि समाज महिलाओं को सदाचार की अभिव्यक्ति के रूप में देखता है, जिससे ऑनर किलिंग जैसी चीजें होती हैं. सर्वोच्च अदालत ने यह भी माना कि शादी के बाहर यौन संबंध बनाना बेशक तलाक का ठोस कारण हो सकता है.

(भारत में कुछ कानून मधुमक्खी का छत्ता बन चुके हैं. उन पर बात करना बवाल खड़ा कर देता है. ऐसे कौन से कानून हैं जिन पर खूब विवाद होता है.)

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