पढ़ने के बदले खदानों में काम कर रहे हैं बिहार के बच्चे | भारत | DW | 27.08.2019
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भारत

पढ़ने के बदले खदानों में काम कर रहे हैं बिहार के बच्चे

बिहार और झारखंड के अभ्रक वाले इलाकों में 14 साल तक की उम्र के पांच हजार से ज्यादा बच्चों ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी है. वे खदानों में काम करने लगे हैं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के एक सर्वे से इसका पता चला है.

बीते साल भारत में काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी टेर दे होम्स की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि बिहार व झारखंड की अभ्रक खदानों में 22 हजार से ज्यादा बच्चे मजदूरी कर रहे हैं. सर्वेक्षण के दौरान इन इलाकों के ज्यादा बच्चों के कुपोषण की चपेट में होने की बात भी सामने आई है. पहले भी इन खदानों में काम करने वाले बच्चों की मौतों के मामलों को छिपाने के आरोपों ने सुर्खियां बटोरी थीं. अब भी अक्सर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. लेकिन यह सामने नहीं आ पातीं. इनको स्थानीय स्तर पर ही दबा दिया जाता है.

भारत अभ्रक के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है. यहां झारखंड व बिहार में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. इसके अलावा आंध्र प्रदेश में भी इसका कुछ उत्पादन किया जाता है. इलेक्ट्रॉनिक व सौंदर्य प्रसाधनों के अलावा रंगों के उत्पादन में भी अभ्रक का इस्तेमाल किया जाता है. पर्यावरण के अनुकूल होने की वजह से हाल के वर्षों में इस खनिज की अहमियत काफी बढ़ गई है.

सर्वेक्षण रिपोर्ट

आयोग को अपने सर्वेक्षण में पता चला कि अभ्रक खदान वाले इलाकों में बच्चों के लिए मौकों की भारी कमी है. इसी वजह से बच्चे अपने परिवार की आय बढ़ाने के लिए बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर मजदूरी करने लगते हैं. उक्त सर्वेक्षण बिहार के नवादा के अलावा झारखंड के गिरीडीह और कोडरमा जिलों में किया गया. आयोग की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड के अभ्रक खदान वाले इलाकों में छह से 14 साल की उम्र के 4,545 बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं और स्कूल नहीं जाते. झारखंड व बिहार के अभ्रक खदान वाले इलाकों में बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी इस सर्वेक्षण के मुताबिक बिहार के नवादा जिले में स्कूल नहीं जाने वाले ऐसे बच्चों की तादाद 649 है. इन बच्चों के स्कूल नहीं जाने की वजह के बारे में आयोग ने कहा है कि पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी नहीं होना इसका कारण है, खदान से अभ्रक के टुकड़े एकत्र करना और महात्वाकांक्षा की कमी ही इसकी प्रमुख वजह है.

सर्वेक्षण रिपोर्ट में स्थानीय अधिकारियों के हवाले कहा गया है कि इलाके के कई परिवारों का गुजारा अभ्रक के टुकड़े बेचकर होने वाली आय से ही चलता है. वहां रहने वाले ज्यादातर परिवारों को लगता है कि बच्चों को स्कूल भेजने से कोई फायदा नहीं है. इसिलए लोग स्कूल भेजने की बजाय बच्चों को अभ्रक के टुकड़े एकत्र करने के लिए खदानों में भेजने को तरजीह देते हैं. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अभ्रक के खनन और इस उद्योग को बाल मजदूरों से मुक्त करने की सिफारिश की है. उसने कहा है कि खनन प्रक्रिया और टुकड़े एकत्र करने से बच्चों को दूर रखा जाना चाहिए. इस उद्योग को बाल मजदूरों से मुक्त करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों व विकास एजेंसियों को जिला और स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल कर ठोस कदम उठाने होंगे. रिपोर्ट में बच्चों से अभ्रक के टुकड़े खरीदने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की भी सिफारिश की है.

बाल मजदूरी में सबसे आगे हैं ये देश

मौतों का आंकड़ा नहीं

आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि नवादा की 15, गिरिडीह की 40 और कोडरमा की 45 बस्तियों में छह से 14 साल के बच्चे अभ्रक के टुकड़े एकत्र करने जाते हैं. आयोग ने अभ्रक खदान से सटी बस्तियों में बच्चों के कुपोषण पर भी गहरी चिंता जताई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार के नवादा जिले के 69 प्रतिशत और झारखंड के कोडरमा व गिरीडीह में क्रमशः 14 और 19 प्रतिशत बस्तियों में रहने वाले बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.

अभ्रक खदान वाले इलाको में बाल मजदूरों की मौत एक आम बात है. लेकिन संबंधित खनन कंपनियां और बच्चों के परिवार भी ऐसे मामलों को भरसक छिपाने का प्रयास करते हैं. कुछ साल पहले इनके खुलासे पर काफी शोर मचा था. लेकिन बाद में फिर सब कुछ जस का तस हो गया. गैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि इलाके में चलने वाले ज्यादातर खदान अवैध हैं. लेकिन सरकार और जिला प्रशासन ने इस ओर से आंखें बंद कर रखी है. नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के बचपन बचाओ आंदोलन का कहना है कि जर्जर और गैर-कानूनी खदानों में होने वाली बच्‍चों की मौत के आंकड़े भयावह हैं. लेकिन इनमें से दस प्रतिशत मामले में भी कहीं कोई रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई जाती.

पुराना है उद्योग

अभ्रक के खनन का उद्योग काफी पुराना है. अंग्रेजों ने 19 वीं सदी के आखिर में अविभाजित बिहार के कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग, नवादा, जमुई, गया और भागलपुर जिलों में फैले अभ्रक की खोज की थी. लेकिन वर्ष 1980 में वनों की कटाई रोकने के कानून बनने और इस प्राकृतिक खनिज का विकल्प मिल जाने की वजह से सात सौ से ज्यादा खदानों वाले इस उद्योग पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ा. लगातार बढ़ती लागत और पर्यावरण संबंधी कठोर नियमों की वजह से ज्यादातर खदानों को मजबूरन बंद कर दिया गया. लेकिन अवैध रूप से खनन का काम जारी रहा. विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश में जंगलों और खुली पड़ी खदानों से अवैध रूप से खनन कर लगभग 70 प्रतिशत अभ्रक का उत्पादन किया जाता है. देश में अभ्रक की केवल 38 वैध खदानें हैं.

बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में काम करने वाले संगठनों की दलील है कि इस खनन उद्योग को कानूनी दर्जा देने से अभ्रक की कालाबाजारी तो कम होगी ही, बाल मजदूरी की समस्या पर भी प्रभावी रूप से अंकुश लगाया जा सकेगा. लेकिन पर्यावरण संबंधी कानूनों और संरक्षित वन क्षेत्र में होने की वजह से अब उन खदानों को कानूनी मंजूरी मिलना बेहद मुश्किल है.

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