न शौर्य दिवस मनेगा, न काला दिवस, फिर भी अयोध्या में प्रशासन सतर्क और सख्त | भारत | DW | 05.12.2019
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भारत

न शौर्य दिवस मनेगा, न काला दिवस, फिर भी अयोध्या में प्रशासन सतर्क और सख्त

अयोध्‍या में पिछले सत्ताईस साल से छह दिसंबर की तारीख कुछ खास होती है. साल 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हिन्दू इसे ‘शौर्य दिवस’ के तौर पर और मुसलमान ‘योमे-गम’ यानी शोक दिवस या काला दिवस के तौर पर मनाते हैं.

शौर्य दिवस का आयोजन मुख्य रूप से विश्व हिन्दू परिषद करती है जो इस दिन को हिन्दुओं की विजय के रूप में देखती है तो काला दिवस मुस्लिम वर्ग बाबरी मस्जिद ध्वस्त किए जाने के गम में मनाता है. शौर्य दिवस के तौर पर अयोध्या समेत देश के तमाम हिस्सों में वीएचपी कई कार्यक्रम आयोजित करती है जिनमें जुलूस और प्रदर्शन भी होते हैं जबकि मुसलमान किसी एक जगह इकट्ठे होकर शोक प्रकट करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब इस विवाद को लगभग समाप्त मान लिया गया है इसलिए दोनों ही पक्षों ने इस बार ऐसा कोई आयोजन नहीं  करने का फैसला किया है लेकिन दोनों ही समुदायों में सभी लोग इस पर एकमत हों, ऐसा भी नहीं है. वीएचपी की केंद्रीय इकाई ने जहां संतों के आह्वान के बाद शौर्य दिवस ना मनाने की घोषणा की है तो वहीं केंद्रीय नेतृत्व ने साफ तौर पर कहा है कि वह इस बार भी ठीक वैसे ही शौर्य दिवस के तहत तमाम कार्यक्रम आयोजित करेगी, जैसा हर बार होता आया है.

Indien Urteil Moschee (Reuters/D. Siddiqui)

फाइल

उधर अयोध्या जिला प्रशासन किसी भी तरह के टकराव या किसी अनहोनी को रोकने के लिए पूरी तरह से सतर्क है. पूरे जिले में यूं तो पिछले एक महीने से धारा 144 लगी है लेकिन छह दिसंबर को देखते हुए सख्ती और ज्यादा बरती गई है. अयोध्या के जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने साफतौर पर कहा है कि धारा 144 का सख्ती से पालन किया जाएगा और किसी भी व्यक्ति या समुदाय को बिना प्रशासन की अनुमति के कोई भी कार्यक्रम आयोजित करने की छूट नहीं दी जाएगी.

अयोध्या जिले में पुलिस को लगातार गश्त पर रहने का निर्देश दिया गया है. डीएम और एसपी की मौजूदगी में शांति कमेटी की बैठकें हुईं जिसमें दोनों समुदाय के लोगों से शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग देने की अपील की गई. एसएसपी आशीष तिवारी ने सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अयोध्या की शांति को भंग करने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाए. बुधवार को पुलिस अधिकारियों ने खुद अपनी टीम के साथ रूट मार्च किया और बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, मंदिरों इत्यादि पर जाकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया. इस बीच, प्रशासन ने राम जन्मभूमि की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेडिंग कर दी है.

विश्व हिन्दू परिषद के प्रदेश प्रवक्ता शरद शर्मा का कहना है कि अब जबकि मंदिर के पक्ष में फैसला आ गया है तो शौर्य दिवस जैसे आयोजन की कोई जरूरत नहीं है. उनके मुताबिक, "अब तो मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद ही कुछ होगा. इस दिन कोई कार्यक्रम नहीं आयोजित होगा लेकिन मंदिरों-मठों और घरों में दीपक जलाए जाएंगे.”

Indien Urteil Moschee (Reuters/D. Siddiqui)

फाइल

शरद शर्मा का कहना है कि अयोध्या के संतों के निर्देश पर ही शौर्य दिवस का आयोजन होता था और इस बार संतों ने इसके लिए मना किया है. उनके मुताबिक, "रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास ने अपील की है कि अब शौर्य दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं रहा क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए यह आयोजन होता था, उस उद्देश्य की अब पूर्ति हो गई है.”

लेकिन वीएचपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता की विनोद बंसल की ओर से जारी एक पत्र ने इस मामले को थोड़ा पेंचीदा बना दिया है. पत्र में लिखा गया है कि शौर्य दिवस पूरे देश में मनाया जाएगा और इस कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया है. लेकिन स्थानीय पत्रकार महेंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि अयोध्या में धारा 144 और प्रशासनिक सख्ती को देखते हुए केंद्रीय नेतृत्व की ओर से जारी पत्र पर अमल नहीं होगा, बल्कि जो स्थानीय नेतृत्व कह रहा है, उसी पर अमल होगा.

वहीं दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय में भी बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर शोक दिवस को लेकर भ्रम की स्थिति है. अयोध्या में बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी साफ तौर पर ऐसे आयोजन से इनकार कर रहे हैं लेकिन हर बार इसे आयोजित करने वाले हाजी महबूब का कहना है कि योमे-गम उनके घर पर मनाया जाता है और इस बार भी मनाया जाएगा. बकौल हाजी महबूब, "घर के भीतर कोई कार्यक्रम कर रहे हैं तो उसमें धारा 144 का उल्लंघन हो नहीं रहा है. हम लोग हमेशा इसी तरह से मनाते हैं. गम को आखिर गम की ही तरह तो मनाया जाएगा.”

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने भी योमे-गम को सार्वजनिक तौर पर नहीं मनाने का फैसला किया है. योमे-गम का आयोजन अयोध्या और अलीगढ़ में खासतौर पर किया जाता था. कमेटी ने अलीगढ़ में भी यह आयोजन न करने का फैसला किया है और डीएम के साथ हुई शांति वार्ता में कमेटी के प्रतिनिधियों ने शांति और संयम बरतने में प्रशासन को सहयोग करने का आश्वासन दिया है.

अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद पिछले करीब सत्तर साल से चल रहा था. पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने इस विवाद का पटाक्षेप करते हुए विवादित जमीन रामलला विराजमान को सौंप दी और मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में किसी और जगह पांच एकड़ जमीन देने का सरकार को निर्देश दिया है. इस विवाद में एक ऐतिहासिक घटना छह दिसंबर 1992 को हुई थी जब बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा हिन्दू कारसेवकों ने ढहा दिया था.

इस घटना के बाद आस-पास की 67 एकड़ जमीन को केंद्र सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया था और रामलला की मूर्ति को एक अस्थाई तंबू से ढक दिया गया था जहां लोग कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में उनके दर्शन के लिए जाते हैं. अब सुप्रीम कोर्ट ने इसी जगह पर मंदिर बनाने के लिए सरकार से तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाने को कहा है.

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