नौ साल की उम्र से गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं बाबर अली | दुनिया | DW | 01.10.2018
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दुनिया

नौ साल की उम्र से गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं बाबर अली

25 साल के बाबर अली दुनिया में सबसे कम उम्र के प्रिंसिपल हैं. पिछले 16 साल में बाबर ने 5,000 से ज्यादा बच्चों को कक्षा एक से लेकर आठ तक पढ़ाया है. आज उनके स्कूल में 500 छात्र-छात्राएं हैं.

आज से 16 साल पहले, बाबर अली को अपनी ही उम्र के बच्चों को कूड़ा-करकट बीनते देख, उनके लिए कुछ करने का विचार आया था. बाबर इस बात से दुखी थे कि उनके ये मित्र गरीबी के कारण स्कूल नहीं जाते थे. इसलिए उन्होंने अपनी पढ़ाई का कुछ हिस्सा उनके साथ साझा करने का फैसला लिया. बाबर अली खुद उन गरीब बच्चों को पढ़ाने लगे.

कोलकाता से 200 किलोमीटर दूर मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा शहर के एक सरकारी स्कूल में पांचवीं कक्षा के छात्र बाबर अली ने अपने घर के पीछे के आंगन में गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. उस समय उनके मन में एक ही ख्वाहिश थी कि देश के हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले. इसी सोच के साथ आगे बढ़ते हुए इस खामोश समाज-सुधारक ने पिछले डेढ़ दशक में सैकड़ों गरीब बच्चों को अपने प्रयासों से शिक्षित किया है. आज बाबर 25 साल के हो चुके हैं.

नौ साल की उम्र में बाबर अली ने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था

नौ साल की उम्र में बाबर अली ने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था.

बाबर ने आईएएनएस से कहा, "मैं इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पाया कि मेरे मित्र कूड़ा-करकट चुनें और मैं स्कूल जाऊं. इसलिए मैंने उनको अपने घर के आंगन में अपने साथ बैठने को कहा, ताकि मैं उनको पढ़ना-लिखना सिखा सकूं." बाहर के घर का वह आंगन अब स्कूल बन चुका है. उस जगह पर अब आनंद शिक्षा निकेतन चल रहा है. यह संस्थान 2002 में ही अस्तित्व में आया और बाबर आज इस स्कूल के प्रिंसिपल हैं. वह दुनिया के सबसे कम उम्र के प्रिंसिपल हैं.

बाबर ने बताया, "मैंने आठ विद्यार्थियों के साथ इस स्कूल की शुरुआत की थी, जिसमें 5 साल की मेरी छोटी बहन अमीना खातून भी शामिल थी." करीब 80 लाख आबादी वाले मुर्शिदाबाद जिले में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले लोगों और बच्चों की आबादी काफी अधिक है. इनमें से अधिकतर खेतों में काम करते हैं या बीड़ी बनाते हैं.  मुर्शिदाबाद देश में बीड़ी का सबसे बड़ा उत्पादक है.

बाबर बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते थे और खुद भी स्कूल में पढ़ते थे. वह बच्चों को बंगला भाषा, विज्ञान और भूगोल के अलावा गणित की बुनियादी बातें भी सिखाते. बाबर ने बताया, "मुझे इस काम में मेरी मां बानुआरा बीबी और पिता मोहम्मद नसीरूद्दीन से काफी मदद मिली. मेरी मां आंगनवाड़ी कर्मचारी हैं और पिता जूट के कारोबारी. दोनों ने स्कूल में ही पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन उन्होंने अपने पड़ोस को शिक्षित बनाने के लिए उनका साथ दिया."

उन्होंने बताया, "मैं जिन बच्चों को पढ़ाता हूं उनको अपने परिवार से बहुत कम मदद मिलती है. अपने परिवार और शिक्षकों की मदद से मैं स्कूल चलाता रहा हूं और बच्चों के कपड़े, किताबें और पढ़ने लिखने की अन्य सामग्री मुहैया करवाता रहा हूं." बाबर को शिक्षकों के अलावा, जिला अधिकारियों से भी सहयोग मिलता रहा है. अब इस संस्थान को पश्चिम बंगाल विद्यालय शिक्षा विभाग से निजी स्कूल के तौर पर मान्यता भी मिली है.

वर्ष 2002 से लेकर अब तक बाबर ने 5,000 से ज्यादा बच्चों को कक्षा एक से लेकर आठ तक पढ़ाया है, उनमें से कुछ बतौर शिक्षक वहां काम करने लगे हैं. उनके स्कूल में वर्तमान में 500 छात्र-छात्राएं हैं और 10 शिक्षक हैं. इसके अलावा स्कूल में एक गैर-शैक्षणिक कर्मचारी हैं. सह-शिक्षा में संचालित इस स्कूल में पहली से लेकर आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है.

भावना अकेला (आईएएनएस)

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