नौ दिन से क्यों अनशन पर बैठी हैं समाजसेवी मेधा पाटकर | भारत | DW | 02.09.2019
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भारत

नौ दिन से क्यों अनशन पर बैठी हैं समाजसेवी मेधा पाटकर

नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के जलस्तर में वृद्धि से मध्य प्रदेश के कई गांव पानी में डूब गए हैं. विस्थापित और प्रभावित लोगों के समर्थन में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर पिछले नौ दिनों से अनशन पर बैठी हैं.

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर की इस संबंध में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से फोन पर वार्ता भी हुई, राज्य की कैबिनेट मंत्री विजयलक्ष्मी साधो उन्हें मनाने बड़वानी जिले के बड़दा गांव भी पहुंचीं, जहां मेधा पाटकर का अनशन चल रहा है, लेकिन उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगे नहीं मानी जाएंगी, वे अनशन जारी रखेंगी.

मेधा पाटकर पिछले 34 वर्षों से 'नर्मदा बचाओ' आंदोलन के बैनर तले सरदार सरोवर बांध की वजह से विस्थापित हुए लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं. बड़वानी जिले के इस डूबे हुए गांव छोटा बड़दा में विस्थापित हुए लोगों के समर्थन में मेधा पाटकर पिछले 25 अगस्त से ही अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं. उनके साथ कई सहयोगी भी अनशन कर रहे हैं. शनिवार को उन्हें अनशनस्थल से जबरन हटाने की कोशिश भी की गई लेकिन अपने समर्थकों के साथ मेधा पाटकर वहीं डटी रहीं.

मेधा पाटकर का कहना है कि किसी भी हालत में सरदार सरोवर में 133 मीटर के ऊपर पानी नहीं रहना चाहिए. मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, "हमने राज्य सरकार को अपने मुद्दों से अवगत करा दिया है. डूबे क्षेत्र के विभिन्न गांवों में पुनर्वास शिविरों को लगाया जाना चाहिए. इस बांध के विस्थापितों का अब तक ठीक से पुनर्वास नहीं किया गया है. पुनर्वास का मतलब प्रभावित परिवार को पांच लाख रुपये देना नहीं है बल्कि उन्हें आजीविका भी प्रदान की जानी चाहिए.”

छोटा बड़दा गांव सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर के जलमग्न क्षेत्र में पड़ता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक इस गांव में कम से कम एक हजार लोग अभी भी उचित पुनर्वास और जमीन के अधिग्रहण का इंतजार कर रहे हैं. इनका कहना है कि सरदार सरोवर बांध का जल भराव 133 मीटर के स्तर से अधिक नहीं होना चाहिए क्योंकि गुजरात में बारिश की कोई कमी नहीं है और वहां के सभी जलाशय भर गए हैं. साथ ही मध्य प्रदेश के भी तमाम जलाशय भरे हुए हैं.

मेधा पाटकर की मांग है कि चूंकि बांध विस्थापितों का पुनर्वास अभी तक पूरा नहीं हुआ है, इसलिए बांध के गेट खोलकर पानी की निकासी होनी चाहिए ताकि मध्य प्रदेश की बस्तियों और गांवों को बचाया जा सके. इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार का कहना है कि सरदार सरोवर का जलस्तर कम करना गुजरात सरकार के हाथ में है. सरकार के प्रवक्ता ने मीडिया को बताया कि इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार ने गुजरात सरकार से पुनर्वास होने तक जल स्तर कम करने की बात की थी, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ.

आंदोलनकारियों का आरोप है कि केंद्र और गुजरात सरकार 192 गांवों और एक शहर को बिना पुनर्वास के ही डुबाने की साजिश रच रहा है, जबकि वहां आज भी 32,000 परिवार रहते हैं. वहीं, मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव ने नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण यानी एनसीए को पिछले दिनों जो पत्र भेजा है उसके मुताबिक 76 गांवों में 6,000 परिवार ही डूब क्षेत्र में रहते हैं.

मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित सरदार सरोवर बांध में 138.68 मीटर तक जल भराव किया जाना है. जल स्तर के 131 मीटर से ऊपर जाने के बाद से धार, अलिराजपुर और बड़वानी के गांवों में पानी पहुंचने लगा है. करीब सौ गांव ऐसे हैं जो लगभग टापू बन चुके हैं और उनका अन्य हिस्सों से जमीनी संपर्क कट गया है.

सरदार सरोवर बांध भारत के इतिहास की शायद सबसे विवादास्पद परियोजना रही है. इसका सपना भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देखा था लेकिन तमाम तकनीकी और कानूनी अड़चनों के चलते साल 1979 में इसकी घोषणा हो सकी. दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के केवडिया में सरदार सरोवर बांध को राष्ट्र को समर्पित किया था.

नर्मदा नदी पर बनने वाले इस सबसे बड़े बांध के खिलाफ जबर्दस्त विरोध भी हुआ, मुकदमेबाजी भी हुई जिसके चलते इसे पूरा होने में इतना समय लग गया. ये अलग बात है कि जिन मुद्दों पर विरोध हो रहा था, वो अभी भी पूरी तरह नहीं सुलझ सके हैं और विरोध की आवाज आए दिन उठती रहती है.

इस परियोजना से महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे बड़े राज्य जुड़े हुए हैं. तीन साल पहले गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने इसकी ऊंचाई 121 से 138.62 मीटर बढ़ाने की घोषणा की थी. हालांकि बांध से कई लाभ हैं जैसे इसकी वजह से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाकों के एक बड़े हिस्से की सिंचाई हो सकेगी और राजस्थान और गुजरात की एक बड़ी आबादी को नर्मदा नदी का पीने पीने के लिए मिल सकेगा.

इसके अलावा सरदार सरोवर परियोजना से 1450 मेगावॉट बिजली के उत्पादन का भी लक्ष्य रखा गया है और गुजरात के बाढ़ प्रभावित इलाकों को भी बचाने में मदद मिल सकेगी. इन फायदों के बावजूद, सरदार सरोवर बांध के विरोध में मेधा पाटेकर की अगुवाई में नर्मदा बचाओ आंदोलन वजूद में आया. आंदोलन का कहना था कि इस परियोजना से दो लाख से ज्यादा लोग विस्थापित होंगे और क्षेत्र के पर्यावरण तंत्र पर प्रभाव पड़ेगा.

इसके अलावा कुछ वैज्ञानिकों ने ये भी दलील दी कि बड़े बांधों के निर्माण से भूकंप का खतरा बढ़ सकता है. बांध का विरोध करने वालों को साल 1993 में उस समय बड़ी कामयाबी मिली जब विश्व बैंक ने सरदार सरोवर परियोजना से अपना समर्थन वापस ले लिया. लेकिन साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी के बाद बांध का रुका हुआ काम फिर से शुरू हो गया. हालांकि पुनर्वास और मुआवजे जैसे मामलों का हल अभी भी पूरी तरह से नहीं निकल सका है जिसकी वजह से बांध से प्रभावित लोग आए दिन आंदोलन करने पर विवश होते हैं.

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