नेता इतने मजबूत हैं, तो अर्थव्यवस्थाएं इतनी कमजोर क्यों? | ब्लॉग | DW | 02.05.2019
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ब्लॉग

नेता इतने मजबूत हैं, तो अर्थव्यवस्थाएं इतनी कमजोर क्यों?

ट्रंप, पुतिन, एर्दोवान, ओरबान - ये सभी ऐसे "प्रभावशाली नेता" हैं जो अपने देशों के आर्थिक प्रभुत्व का दावा करते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि इनके देशों की अर्थव्यवस्था पतन के रास्ते पर हैं.

दुनिया के सभी तथाकथित प्रभावशाली नेता अपनी राजनीति को एक ही तरह से पेश करते हैं: वे जनता की मर्जी को स्वीकारते हैं और खुद की तरक्की के लिए काम करने वाले एलिट के खिलाफ हैं. अपनी इसी खासियत के चलते वे चुनाव जीतने में सफल रहे हैं.

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोवान इस रणनीति को आजमाने वाले पहले नेता थे. वे खुद को "काला तुर्क" बताते थे. जनता के लिए काम करने वाला एक ऐसा व्यक्ति जो उन्हें गोरे तुर्कों से बचाएगा. यहां "गोरे तुर्क" से उनका मतलब देश के सेक्यूलर एलिट से था. आज 15 सालों बाद एर्दोवान उसी को "सच्चा तुर्क" मानते हैं जो उन्हीं के जैसी सोच रखता हो. इस बीच एर्दोवान ने अपने फायदे के लिए देश के संविधान में बदलाव किए हैं, प्रेस की स्वतंत्रता को लगभग खत्म कर दिया है और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर भी नियंत्रित किया है. इतना ही नहीं, उन्होंने जनता के एक बड़े हिस्से में धार्मिक भावनाओं काल सरल तरीके से प्रचार भी किया है. वे यह भी बताते हैं कि एक तुर्क महिला को कितने बच्चे पैदा करने चाहिए और यह भी कि कैसे समलैंगिक होना गैरइस्लामी है. शुरुआत में इसे आम जनता के लिए राजनीति को आसान बनाने के कदमों के रूप में देखा जाता था लेकिन अब बात इतनी है कि एर्दोवान जो ठीक समझते हैं, बस वही ठीक है.

अर्थव्यवस्था को नुकसान

एर्दोवान जैसे नेता हमेशा दावा करते हैं कि वे देश की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर देंगे और दुनिया में उनके देश का दबदबा होगा. लेकिन असल में वे करते इसका ठीक उलटा हैं.  मिसाल के तौर पर तुर्की में एर्दोवान के दामाद केंद्रीय बैंक का अध्यक्ष हैं. ऐसे में अगर कभी कोई सवाल उठे भी तो आर्थिक मामलों पर आप किसी को घेर ही नहीं सकते. ठीक ऐसा ही हंगरी में भी देखा जा सकता है और रूस में भी. वैसे यह पतन चीन में भी शुरू हो गया है. वहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी विचारधारा थोप रहे हैं. अगर वहां केंद्रीय बैंक ऐसी कंपनियों को लगातार कर्ज देते रहेंगे जिनमें सरकार की हिस्सेदारी है, तो चूक की बड़ी संभावना है.

Kommentarfoto: Prof. Dr. Dr. Alexander Görlach (Harvard University/D. Elmes)

एलेक्जैंडर गोएरलाख

ये प्रभावशाली नेता हमेशा ही दावा करते हैं कि उनकी राय असल में जनता की राय है. नेतागिरी का इनका तरीका हमेशा जनता की स्वतंत्रता पर भारी पड़ता है, खास कर आर्थिक स्वतंत्रता पर. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रशंसक रहे हैं. अपने रिश्तेदारों को व्हाइट हाउस में नौकरियां दिलवाने पर ट्रंप को कभी जरा भी संकोच नहीं रहा. अपने चुनाव प्रचार के दौरान भी ट्रंप ने पुतिन और एर्दोवान के स्टाइल में भाषण दिए और साफ तौर पर इनका उन्हें फायदा भी हुआ.

अमेरिका आज भी एक लोकतंत्र है. लेकिन रूस, चीन, तुर्की और हंगरी में तो हालात अलग हैं. ऐसे देशों में आप इस दावे को खारिज कर सकते हैं कि यहां प्रभावशाली नेता अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. ये सभी देश आर्थिक मोर्चे पर पतन की राह पर हैं. क्योंकि जब लोकतंत्र का पतन होता है, तब अर्थव्यवस्था भी टिकी नहीं रह सकती.

ब्लॉग: एलेक्जैंडर गोएरलाख/आईबी

एलेक्जैंडर गोएरलाख केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑन रिलिजन एंड इंटरनेशनल स्टडीज में सीनियर रिसर्च एसोसिएट हैं.

एक नजर रेचेप तैयप एर्दोवान की ताकतों पर

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