नेट जीरो उत्सर्जन से भारत को परहेज क्यों | ब्लॉग | DW | 15.04.2021
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ब्लॉग

नेट जीरो उत्सर्जन से भारत को परहेज क्यों

ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्यों के समांतर, टेक्नोलजी की मदद से 2050 तक नेट जीरो एमीशन हासिल करने की बात चली है. भारत पर भी नेट जीरो टार्गेट का दबाव है. लेकिन उसने अभी हां नहीं की है.

अभी तक दुनिया के 77 देश अपने यहां कानूनों या एक्शन प्लान के जरिये नेट जीरो टार्गेटों का ऐलान कर चुके हैं. भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नेट जीरो टार्गेट के चक्कर में उसके आर्थिक विकास की गति मंद पड़ जाएगी. उसे यह भी लगता है कि बड़े और संपन्न देश तो प्रौद्योगिकी की मदद से यह लक्ष्य हासिल कर लेंगे लेकिन गरीब और विकासशील देश एक बार फिर पीछे छूट जाएंगे. यह ठीक वैसा ही होगा जैसे बड़े देशों में 19वीं और 20वीं सदी के अपार औद्योगिक विकास के लंबे दौर के बाद 21वीं सदी में जाकर वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चिंताएं सामने आई हैं और बड़े देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती की दुहाई देने लगे हैं.

नेट जीरो पर नई अंगड़ाई लेता अमेरिका

अमेरिका में जलवायु परिवर्तन का सवाल पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में हाशिये पर पड़ा था लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन जलवायु मुद्दे पर मुखर रहे हैं और वैसे भी अमेरिका इस मुद्दे पर दुनिया की अगुवाई करने के लिए छटपटा रहा है. दूसरी बात अपनी प्रौद्योगिकी और उपकरणों के लिए बाजार भी चाहिए.

कुछ इन्हीं संदर्भों के साथ जलवायु परिवर्तन पर बाइडेन के विशेष दूत जॉन कैरी पिछले दिनों भारत दौरे पर थे. उन्होंने अक्षय ऊर्जा के महत्त्वाकांक्षी टार्गेट को हासिल करने की भारत की कोशिश में मदद के लिए हरित प्रौद्योगिकियां और वित्तीय मदद उपलब्ध कराने का भरोसा दिया. इस यात्रा का एक और मकसद थाः आगामी 22-23 अप्रैल को राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जलवायु परिवर्तन पर विश्व नेताओं की वर्चुअल बैठक बुलाई है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसमें न्यौता है. जलवायु परिवर्तन के मुद्दे और अमेरिकी चिंताओं को रेखांकित और पुनर्जीवित करते हुए यह बाइडेन का पहला और बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है. 

अमेरिका आगामी बैठक में 2050 तक नेट जीरो एमीशन के टार्गेट को पूरा करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर सकता है. ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश पहले ही शताब्दी के मध्य तक नेट जीरो एमीशन को हासिल करने का वादा करते हुए अपने यहां कानूनों को अमल में ला चुके हैं. यूरोपीय संघ सम्मिलत रूप से इसी दिशा में प्रयासरत है. जबकि कनाडा, दक्षिण कोरिया, जापान और जर्मनी ने नेट जीरो भविष्य के प्रति अपने सकारात्मक इरादे जाहिर किए हैं. यहां तक कि चीन ने भी 2060 तक नेट जीरो का वादा कर दिया है. इन तमाम देशों में भारत ही अकेला है जो यूं तो अमेरिका और चीन के बाद ग्रीन हाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है, लेकिन नेट जीरो एमीशन के मामले में फिलहाल उसने अपने पत्ते नहीं खोले हैं.

वीडियो देखें 04:10

हाइड्रोजन ऐसे बनेगा कि कार्बन ना निकले

नेट जीरो एमीशन हासिल करने का लक्ष्य है क्या

नेट जीरो का आशय कार्बन निरपेक्षता यानी कार्बन न्युट्रैलिटी से है. इसका मतलब यह नहीं है कि देश अपने उत्सर्जन का स्तर शून्य पर ले आएंगें, बल्कि नेट जीरो एक ऐसी अवस्था है जिसमें उत्सर्जनों की क्षतिपूर्ति के रूप में ग्रीन हाउस गैसों को तकनीक के माध्यम से जज्ब कर लिया जाता है और वायुमंडल से हटा दिया जाता है. जंगलों को विशाल कार्बन सिंक के तौर पर देखा जाता है. बड़े पैमाने पर जंगल तैयार हों तो वे भी ग्रीन हाउस गैसों को सोखने का काम करेंगे. वायुमंडल से गैसों को हटाने के लिए कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जैसी भविष्नोमुखी और महंगी प्रौद्योगिकियों की जरूरत है.

माना जाता है कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में 2050 तक वैश्विक कार्बन निरपेक्षता  मील का पत्थर साबित होगी. अगर इस लक्ष्य को पा सके, तो फिर उससे बड़ा लक्ष्य यानी पूर्व औद्योगिक समय के मुकाबले वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोत्तरी न होने देने के लक्ष्य को भी पाया जा सकता है.

भारत को लगता है कि एक बड़ा लक्ष्य पहले ही सामने है और अब यह छोटा लक्ष्य और डाल दिया गया है. विशेषज्ञों में भी इस मुद्दे को लेकर अलग अलग राय है. एक वर्ग कहता है कि उत्सर्जन में कटौती और वैश्विक तापमान में निर्धारित नियंत्रण के लक्ष्यों को लेकर भारत का प्रदर्शन अन्य देशों के मुकाबले बेहतर रहा है और अब इस नए लक्ष्य को उसकी आर्थिक गतिशीलता को अवरुद्ध करने के रूप में देखा जा रहा है.

दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को नेट जीरो वाले लक्ष्य को स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि आखिरकार उसे ही इसका लाभ हासिल होगा और वे न सिर्फ अपने लक्ष्यों में बल्कि हरित प्रौद्योगिकी के लिहाज से भी स्वायत्त और लीडर बन सकेगा.

क्या बड़े देशों के लिए मुफीद है नेट जीरो

नेट जीरो वाले गणित में किसी देश के लिए उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य नहीं रखे गए हैं. अब विकसित देशों के लिहाज से तो यह रास्ता राहत वाला है क्योंकि बोझ सिर्फ उनका नहीं है और इसमें सैद्धांतिक पहलू यह भी है कि कोई देश अपने मौजूदा एमीशन स्तरों के साथ या उन्हें बढ़ाकर भी कार्बन न्यूट्रल कहला सकता है, बशर्ते वह उन उत्सर्जनों को वायुमंडल से सोख भी ले या हटा दे.

विकसित देश जाहिर है अपने संसाधनों और प्रौद्योगिकी के दम पर इस काम में बाजी मार ले जाएंगें. भारत इसीलिए इस टार्गेट के प्रति उत्साहित नहीं है क्योंकि सबसे ज्यादा असर उसी पर पड़ेगा. माना जाता है कि अगले दो से तीन दशकों में तेज आर्थिक वृद्धि को लक्षित करते हुए भारत के उत्सर्जन पूरी दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ेंगे. अब इस बेतहाशा बढ़त में किसी तरह का वनीकरण या जंगल लगाने का अभियान बढ़े हुए उत्सर्जनों की भरपाई नहीं कर सकता. अभी कार्बन रिमूवल की तकनीकें बहुत विश्वसनीय नहीं हैं या बहुत महंगी बताई जाती हैं.

भारत की शिकायत यह भी है कि बड़े देश पेरिस समझौते के तहत न सिर्फ निर्धारित लक्ष्यों से बल्कि गरीब देशों की मदद के वादे से भी पीछे हटे हैं और 2050 की कार्बन न्युट्रैलिटी का भी यही हश्र होगा क्योंकि बड़े देश खुद हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे और विकासशील देशों को त्याग करने को कहते रहेंगे. इन्हीं तमाम आशंकाओं और संदेहों सवाल कायम है कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जारी गतिविधियों से समझौता करते हुए भारत भी नेट जीरो वैगन में सवार होगा या किनारे रहना ही पसंद करेगा.

ब्लॉग

शिवप्रसाद जोशी

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