निवेश के लिए खतरा बनता जलवायु परिवर्तन | विज्ञान | DW | 08.12.2012
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विज्ञान

निवेश के लिए खतरा बनता जलवायु परिवर्तन

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और आस पास के इलाके में पर्यावरण का बदलाव औद्योगिक क्षेत्र में नए निवेश के लिए घातक साबित हो सकता है. राज्य में पिछले चार-पांच वर्षों में नया निवेश नहीं के बराबर हुआ है.

टाटा की लखटकिया कार परियोजना के यहां सिंगुर से कामकाज समेटने के बाद राज्य में कोई बड़ा निवेश नहीं हुआ है. इसबीच, सरकार तो बदल गई, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद निवेश का माहौल नहीं बदल सका है. अब एक विश्वस्तरीय सलाहकार कंपनी मैपलक्राफ्ट की ताजा चेतावनी यहां निवेशकों के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है.

वैश्विक तापमान में होने वाले बदलाव का असर कोलकाता और उससे सटे सुंदरबन इलाके में साफ महसूस किया जा सकता है. यहां बंगाल की खाड़ी का जलस्तर देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले तेजी से बढ़ रहा है. इसकी वजह से सुंदरबन के कुछ द्वीप पानी में समा चुके हैं और कुछ इसके लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. अब मैपलक्राफ्ट ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कोलकाता में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पर्यावरण में बदलाव से व्यापार को निकट भविष्य में होने वाले खतरों से आगाह किया है. कंपनी के मैप्स एंड इंडेक्सेज विभाग के प्रमुख हेलेन होज कहते हैं, ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कारोबार के विस्तार के लिए नए-नए बाजार तलाश रही हैं. लेकिन इस इलाके के पर्यावरण में होने वाले बदलाव की वजह से उनके कारोबार को कई तरह के खतरों से जूझना पड़ सकता है.' मैपलक्राफ्ट के पांचवें सालाना जलवायु परिवर्तन एटलस में इस बदलाव के प्रति संवेदशनशील शहरों की सूची में कोलकाता सातवें नंबर पर है.

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे शहरों में आए दिन चक्रवाती तूफान और बवंडर आएंगे. यहां तापमान बेहद बढ़ जाएगा और बारिश भी कम होगी. इसका असर पर्यावरण, आम लोगों के स्वास्थ्य, औद्योगिक प्रक्रिया, सप्लाई चेन और आधारभूत ढांचे पर पड़ेगा. कोलकाता को फिलहाल साल में दस महीने भारी गर्मी और उमस से जूझना पड़ता है. अब इस तापमान में और बढ़ोतरी से स्वास्थ्य संबंधी कई तरह के खतरे बढ़ जाएंगे.

यादवपुर विश्वविद्यालय की जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम की जयश्री राय कहती हैं, ‘गर्मी के मुकाबले के लिए हमें ज्यादा वातानुकुलन (एयर कंडीशनिंग) की जरूरत होगी. यानी ऊर्जा की खपत बढ़ेगी और कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ जाएगा.' इसी विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञान संस्थान के प्रमुख डा. सुगत हाजरा, जो सुंदरबन में जलवायु परिवर्तन के असर का लंबे समय से अध्ययन कर रहे हैं, कहते हैं, ‘दरअसल, भारतीय उपमहाद्वीप पूर्व की ओर झुका हुआ है. तमाम नदियां पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं. इस इलाके में समुद्री जलस्तर के बढ़ने का औसत वैश्विक और राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. यहां अपेक्षित बढ़ोतरी वैश्विक बढ़ोतरी के मुकाबले बहुत ज्यादा है. यहां समुद्र का जलस्तर 12 मिमी प्रति वर्ष के हिसाब से बढ़ रहा है.' तमाम विशेषज्ञों का मानना है कि सुंदरबन से सटे होने की वजह से कोलकाता में जलवायु परिवर्तन का असर ज्यादा ही होगा. समुद्र का जलस्तर बढ़ने का सीधा असर सुंदरबन होगा और उससे यह महानगर भी अछूता नहीं रहेगा.

Indien Zyklon

आबादी के बढ़ते दबाव की वजह से इस महानगर को पीने की पानी की किल्लत से भी जूझना होगा. यहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष विनय कुमार दत्त कहते हैं, ‘हमें पानी की बर्बादी रोकनी होगी. फिलहाल एक-तिहाई पानी नष्ट हो जाता है. इस पर काबू पाना जरूरी है.' राज्य के पर्यावरण सचिव आरपीएस कहलों कहते हैं, ‘समस्या यह है कि कोलकाता एक बेहद पुराना शहर है. यहां पर्यावरण में होने वाले बदलावों की वजह से निकट भविष्य में सामने आने वाली चुनौतियों का सामना कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित कर के ही किया जा सकता है.'

पर्यावरण विशेषज्ञ डा. हाजरा कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन से मौसम में अप्रत्याशित बदलाव हो सकते हैं. इसका महानगर में व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा. इस महानगर को अभी से भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए हरित क्रांति यानी ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने की राह अपनानी चाहिए. लेकिन ‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा' की तर्ज पर सरकार और संबंधित एजंसियां फिलहाल अपनी-अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने में ही जुटी हैं.ऐसे में राज्य में नए निवेश की संभावना भी कम ही नजर आती है.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः एन रंजन

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