नहीं मानेंगे बाध्यकारी कानूनी समझौता: रमेश | जर्मन चुनाव 2017 | DW | 10.12.2010
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जर्मन चुनाव

नहीं मानेंगे बाध्यकारी कानूनी समझौता: रमेश

भारत ने साफ किया है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर किसी तरह का कानूनी समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा. मेक्सिको में हो रहे सम्मेलन में हिस्सा ले रहे जयराम रमेश ने कहा कि कई देश भारत पर बहुत ज्यादा दबाव डाल रहे हैं.

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भारत के वन एंव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के मुताबिक भारत, चीन और अमेरिका ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को लेकर कोई कानूनी बाध्यता नहीं मानेंगे. मेक्सिको के कानकून में हो रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन के दौरान उन्हों यह बात कही. रमेश के मुताबिक उत्सर्जन में कटौती को लेकर चीन और भारत पर अत्यंत दबाब डाला जा रहा है.

भारत ने साफ किया है कि विकास कर रहे अन्य छोटे बड़े देश भी कानूनी समझौते के खिलाफ हैं. विरोध करने वालों में अफ्रीका के भी कई देश हैं. रमेश ने कहा, ''विकसित देशों का एक ऐसा ग्रुप है जो विकासशील देशों का सहारा लेकर भारत और चीन पर दबाव डालना चाह रहा है. दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते के लिए तैयार हो गए हैं, लिहाजा इनकी आड़ में भारत और चीन को कसने की कोशिश की जा रही है.''

Indien Umweltminister Jairam Ramesh

नहीं मानेंगे

उन्होंने कहा कि नई दिल्ली क्योटो संधि से सहमत है. क्योटो संधि के अनुसार अमीर विकसित देशों को उत्सर्जन में कटौती के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया जाए. 2012 में खत्म होने जा रहे क्योटो प्रोटोकॉल में विकासशील देशों को लेकर कोई बात नहीं कही गई है. इसका हवाला देते हुए रमेश ने कहा, ''इन पैमानों पर कोई रियायत नहीं दी जानी चाहिए.''

भारत और चीन का तर्क है कि बाध्य करने वाले कानूनी समझौते से उनके विकास पर असर पड़ेगा. दोनों देशों का कहना है कि अमीर देशों ने 1990 तक खूब ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन किया और आर्थिक विकास की उड़ान भरी. यही देश अब भारत और चीन को कटौती की नसीहत दे रहे हैं. हालांकि भारत का कहना है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए और ज्यादा कदम उठाए जाने जरूरी हैं. विकासशील देशों की शिकायत रहती है कि विकसित देश मदद करने के बजाए तकनीक बेचने उतर आते हैं.

भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील बेसिक नामकी छतरी के नीचे एक साथ हैं. लेकिन अब इसी में दरार पड़ चुकी है. भारतीय पर्यावरण मंत्री ने कहा, ''इस मसले को लेकर अब बेसिक में ही मतभेद हो गए हैं. भारत और चीन एक साथ हैं जबकि दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील साथ हैं.''

लेकिन भारत की मुश्किल कम होती नहीं दिखाई पड़ रही है. भूटान, नेपाल, मालदीव और बांग्लादेश जैसे देश भी बाध्यकारी समझौते की मांग कर रहे हैं. इन देशों में मौसमी बदलावों का असर दिखने लगा है. ये ऐसा असर है जिसे रोका न गया तो भविष्य हाहाकार भरा होगा.

रिपोर्ट: पीटीआई/ओ सिंह

संपादन: आभा एम़

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