नहीं पिघली दीदी और दादा के रिश्तों पर जमी बर्फ | दुनिया | DW | 10.07.2012
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दुनिया

नहीं पिघली दीदी और दादा के रिश्तों पर जमी बर्फ

राष्ट्रपति पद के यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी चुनाव से पहले प्रचार के लिए आखिरी बार अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल पहुंचे. लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ रिश्तों पर जमी बर्फ नहीं पिघल सकी.

इस दौरान तल्खी और बढ़ गई. पहले से ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि आखिरी दौर के इस प्रचार के दौरान क्या प्रणब ममता को मनाने का प्रयास करेंगे. इन कयासों को उस समय और बल मिला जब पिछले दिनों उन्होंने ममता को अपनी छोटी बहन बताया. लेकिन तमाम कयास बेकार ही साबित हुए. सोमवार को कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के बीच जम कर बयानबाजी हुई और मंगलवार को ममता उत्तर बंगाल के दौरे पर रवाना हो गईं.

प्रणब मुखर्जी ने कोलकाता के विधानसभा परिसर में सीपीएम और फॉरवर्ड ब्लाक के अलावा वाममोर्चे के दो अन्य घटक दलों के विधायकों के साथ मुलाकात की. बाद में वह कांग्रेस के विधायकों से भी मिले. लेकिन ममता के साथ मुलाकात के सवाल को वह बड़ी चालाकी से टाल गए. प्रणब ने कहा, "ममता जब भी मिलना चाहें, मैं उनसे बातचीत के लिए तैयार हूं." प्रणब का कहना था कि तृणमूल कांग्रेस ने फिलहाल समर्थन के मुद्दे पर कोई फैसला नहीं किया है और समय आने पर वह इसका फैसला करेगी. उनके इस बयान पर तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि इस मामले में किसी बिचौलिए की जरूरत ही नहीं है. प्रणब को दीदी से फोन पर बात कर उनकी मंशा जान लेनी चाहिए थी.

सीपीएम का साथ

सीपीएम विधायकों के साथ प्रणब की मुलाकात और उनसे समर्थन के मुद्दे पर भी तृणमूल ने दादा पर फब्तियां कसी. ममता ने इस मुद्दे पर अब तक चुप्पी साध रखी है. तृणमूल नेता और राज्य के वरिष्ठ मंत्री सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, "प्रणब बाबू शुरू से ही वामपंथियों के करीबी रहे हैं. इसलिए वामपंथियों का उनको समर्थन देना स्वाभाविक है. लेकिन हमारा सीपीएम के साथ छत्तीस का रिश्ता है. हम उनके साथ कोई मंच साझा नहीं कर सकते. विधानसभा में सीपीएम के साथ बैठना हमारी मजबूरी है." दरअसल, ममता शुरू से ही केंद्र से विशेष पैकेज मांग रही हैं. उन्होंने पिछले दिनों राज्य को भारी कर्ज पर ब्याज के भुगतान से तीन साल तक छूट देने की मांग की. लेकिन प्रणब ने वित्त मंत्री रहते इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया. इस नाते वह प्रणब से बेहद नाराज हैं. प्रणब से नाराजगी की वजह से ही उन्होंने शुरू में एपीजे अब्दुल कलाम का नाम उछाला. कांग्रेस और सीपीएम के कुछ नेताओं की दलील है कि बंगाली होने के नाते दीदी को दादा का समर्थन करना चाहिए. लेकिन मुखर्जी कहते हैं, "इसमें बंगाली होने की बात कहां से आ गई. यह दूसरी जाति के लोगों का अपमान है. जो लोग आज बंगाली होने की दुहाई दे रहे हैं उन्होंने बंगाल को कर्ज के बोझ से मुक्ति दिलाने की दिशा में कोई पहल नहीं की है."

तल्ख हुए रिश्ते

प्रणब के इस दौरे ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्तों को और तल्ख बना दिया. कांग्रेस के सांसदों और विधायकों के साथ प्रणब की बैठक के दौरान ही ममता के कट्टर विरोधी समझे जाने वाले दो सांसदों, अधीर चौधरी और दीपा दासमुंशी ने कांग्रेस आलाकमान से तृणमूल के साथ गठजोड़ खत्म करने की अपील की. अधीर चौधरी कहते हैं, "19 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव के बाद हम तय करेंगे कि तृणमूल से कोई रिश्ता रखना है या नहीं." लेकिन उसके कुछ देर बाद ही तृणमूल की ओर से बयान आया कि कांग्रेस जब चाहे गठजोड़ से नाता तोड़ सकती है. सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, "कांग्रेस को अब इस मुद्दे पर शीघ्र फैसला करना चाहिए. यहां हमें उसकी कोई जरूरत नहीं है."

वामपंथियों में दरार

क्या प्रणब को समर्थन के मुद्दे पर वामपंथियों में मतभेद उभरने लगे हैं. सीपीएम और फॉरवर्ड ब्लाक ने तो प्रणब को समर्थन का एलान किया है. लेकिन सीपीआई और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) ने खुद को अलग रखा है. इस मुद्दे पर उठने वाले सवालों के चलते ही विधानसभा में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र (सीपीएम) को सफाई देनी पड़ी. प्रणब के साथ बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में उनका कहना था कि दो घटक दलों के अलग रहने के बावजूद वामपंथी एकता पर कोई असर नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा कि केंद्र की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ हमारा लोकतांत्रिक आंदोलन जारी रहेगा. केंद्र की नीतियों का विरोध और राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब को समर्थन देना, दोनों अलग अलग मुद्दे हैं.

रिश्ते सुधरने के आसार नहीं

कहा जाता है कि राजनीति में दोस्ती या दुश्मनी स्थायी नहीं होती. लेकिन राष्ट्रपति पद पर प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच पहले से ही बनते बिगड़ते रिश्तों में इतनी कड़वाहट भर दी है कि अब इनके सुधरने के आसार कम ही हैं. प्रणब के जिस दौरे से इस कड़वाहट में कुछ मिठास घुलने की संभावना भर थी, वह और उलझ गया. ऐसे में 19 जुलाई के बाद राजनीतिक समीकरणों में उलटफेर हो सकता है.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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