नहीं थम रही सेना पर राजनीति | दुनिया | DW | 09.12.2016
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दुनिया

नहीं थम रही सेना पर राजनीति

पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस और केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के बीच सेना की भूमिका को लेकर छिड़ा विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है.

बीते सप्ताह पश्चिम बंगाल के टोल प्लाजा पर सेना की तैनाती के मुद्दे पर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था. सेना और केंद्र की सफाई के बाद यह मामला ठंडा पड़ गया लगता था. लेकिन अब केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की ओर से इस मुद्दे पर ममता को भेजे गए एक पत्र ने इस झगड़े की आग में घी डालने का काम किया है. वैसे, सेना को राजनीति में घसीटने की घटनाएं पहले भी होती रही हैं. लेकिन इस विवाद ने जिस तरह तूल पकड़ा है वैसा कोई विवाद हाल में सामने नहीं आया था.

रक्षामंत्रीकापत्र

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने ममता बनर्जी को भेजे गए पत्र में सेना पर लगाए गए आरोपों के लिए उनकी आलोचना करते हुए कहा है कि इससे सशस्त्र बलों के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. मंत्री ने कहा है कि वे ममता के इस आरोप से काफी दुखी हैं कि नोटबंदी का विरोध करने की वजह से ही केंद्र ने बंगाल में सेना का अभ्यास शुरू किया है. उन्होंने लिखा है, "आपके इन आरोपों से देश के सैन्य बलों का मनोबल गिर सकता है." रक्षा मंत्री ने तृणमूल कांग्रेस को सेना को राजनीति में नहीं घसीटने की भी चेतावनी दी है. पर्रिकर ने लिखा है कि सार्वजनिक जीवन में ममता के अनुभव और स्थिति को देखते हुए उनसे ऐसी टिप्पणियों की उम्मीद नहीं थी. रक्षा मंत्री का कहना है कि राजनीतिक दलों के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाना काफी आसान है. लेकिन इसमें सेना को घसीटने पर मामला जटिल हो जाता है. इसलिए सेना पर आरोप लगाने से पहले काफी एहतियात बरता जाना चाहिए.

क्याथामामला

ममता ने केंद्र पर राज्य में तख्तापलट की कोशिश का आरोप लगाते हुए कहा था कि यह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण है. दूसरी ओर, सेना ने इसे रूटीन अभ्यास बताते हुए कहा था कि बंगाल पुलिस को पहले से ही इसकी सूचना दे दी गई थी. सेना के सड़क पर उतरने के विरोध में ममता ने एक रात राज्य सचिवालय में ही गुजारी थी.मुख्यमंत्री का दावा था कि सेना को राज्य सरकार को सूचित किए बिना ही तैनात किया गया है. उन्होंने इसे अभूतपूर्व और बेहद गंभीर मामला करार दिया था.

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने सरकार से सलाह लिए बिना विभिन्न हिस्सों में सेना की तैनाती की कड़ी निंदा करते हुए सवाल उठाया था कि केंद्र सरकार कहीं राज्य में आपातकाल तो कहीं लागू नहीं कर रही है? उन्होंने इसे राजनीतिक और बदले की भावना से प्रेरित एक असंवैधानिक कदम बताया था.

इस मुद्दे पर बढ़े विवाद के बाद सेना की ओर से ममता के तमाम आरोपों को निराधार करार देते हुए संबधित दस्तावेज जारी किए गए. इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने शुक्रवार को संसद में जमकर हंगामा किया था.

इस बीच, तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन ने रक्षा मंत्री के पत्र पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ममता तक पहुंचने से पहले पत्र को मीडिया में लीक करने से केंद्र की मंशा जाहिर होती है. उन्होंने कहा कि इस पत्र का माकूल जवाब दिया जाएगा.

पहलेभीहुएहैंविवाद

वैसे, सेना को राजनीति में घसीटने का यह कोई पहला मामला नहीं है. सबसे हालिया मामला जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमले के बाद पाक कलाकारों वाली फिल्मों की रिलीज पर महाराष्ट्र के नेता राज ठाकरे की ओर से लगाई गई पाबंदी का है. बाद में एक बैठक में इस शर्त पर यह पाबंदी हटी कि फिल्म निर्माता सेना कल्याण कोष में पांच करोड़ की रकम देंगे. लेकिन इस पर काफी विवाद हुआ. सेना ने ऐसी कोई रकम लेने से मना कर दिया. बाद में मामला दब गया. इसके कुछ साल पहले एक अंग्रेजी अखबार ने तख्तापलट के मकसद से सेना की एक बड़ी पलटन के दिल्ली की ओर कूच करने संबंधित खबर छाप कर सनसनी पैदा कर दी थी. इस पर भी काफी विवाद हुआ था और संसद में हफ्तों हंगामा होता रहा. केंद्र सरकार और सेना की ओर से बार-बार सफाई के बावजूद विवाद थमने की बजाय बढ़ता ही रहा. उसका सच अब तक सामने नहीं आ सका है.

वैसे, रक्षा मंत्री कहते हैं, "भारतीय सेना सबसे अनुशासित संस्थानों में से एक है. उसके पेशेवर रवैये और गैर-राजनीतिक आचरण पर पूरे देश को नाज है." लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रक्षा मंत्री के ताजा पत्र के बाद यह मामला एक बार फिर जोर पकड़ सकता है. ऐसे में होम करते हाथ जले की तर्ज पर रक्षा मंत्री का यह पत्र भी सेना को राजनीति मे घसीटने का जरिया साबित हो सकता है.

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