′नवाज हूं, नवाज ही बनना चाहता हूं′ | लाइफस्टाइल | DW | 24.07.2012
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लाइफस्टाइल

'नवाज हूं, नवाज ही बनना चाहता हूं'

नवाजुद्दीन सिद्दीकी का नाम इस साल की सबसे हिट फिल्मों से जुडा है. असल जिंदगी में बहुत कम बोलने वाले नवाज ने नई फिल्म में गूंगे की भूमिका निभाई है. पूरे देश का दिल जीत चुके नवाज को न्यूयॉर्क में पहला अवॉर्ड भी मिला है.

फिल्म 'देख इंडियन सर्कस' में आपने बेहतरीन काम किया है. आपके लिए गूंगे का किरदार निभाना कैसा अनुभव रहा?

गूंगे व्यक्ति का किरदार निभाना थोड़ा मुश्किल था, क्योंकि इस बात का डर रहता है कि कहीं ऐसा ना लगे कि एक्टिंग कर रहा है. यह स्वाभाविक लगना जरूरी है. ऐसा लगना चाहिए कि यह इंसान बचपन से ही गूंगा है. मैंने अपने पास ऐसे बहुत सारे लोग देखे हैं. शूटिंग के पहले दिन एक ट्रक ड्राइवर ने मुझसे पूछा, "क्या करता है तू?" मैंने उसे गूंगा बन कर ही जवाब दिया और उसे मेरी बात का यकीन हो गया. इसी तरह जब मैं खाना खाने गया, तब भी मैंने ऐसा ही किया और मुझे वहां से यह कह कर भगा दिया गया कि तुम्हारा खाना कहीं और लगा हुआ है. मुझे अच्छा लगा कि आम लोग इस बात का यकीन कर रहे हैं कि यह आदमी गूंगा है. तब मुझे लगा कि मैं ठीक ठाक अभिनय कर रहा हूं.

'कहानी', 'पान सिंह तोमर', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और अब 'देख इंडियन सर्कस'. इन सब फिल्मों के बाद क्या आपको लगता है कि आप अपनी मंजिल तक पहुंच गए हैं?

नहीं, मंजिल तो बहुत दूर है. अभी बहुत सारी चीजें करनी हैं जो मन में हैं. खुद को टटोलना है. बहुत से किरदार हैं जो अभी मैं निभाना चाहता हूं. फिल्मों के जरिए अपने अंदर छिपे बहुत सारे छोटे छोटे किरदारों को निभाने का मौका मिलता है.

ये सभी फिल्में आम बॉलीवुड फिल्मों से हट कर थीं. सभी पैरेलल सिनेमा की दिशा में थीं. कहीं आपको ऐसा लगा कि आप एक जैसे किरदार करने लगे हैं या मेनस्ट्रीम में नहीं आ पा रहे हैं?

गूंगे का रोल तो मैंने इस से पहले कभी किया ही नहीं था. एक फिल्म में मैं पुलिस अफसर का किरदार निभा रहा हूं तो दूसरी में गैंगस्टर का. ये सब किरदार एक दूसरे से अलग हैं. मैंने कहीं कोई किरदार दोहराया नहीं. मेनस्ट्रीम में हमारे जो सुपरस्टार हैं वे 35 फिल्में उसी हाव भाव के साथ एक ही सुर में कर जाते हैं. उन्हें इस बात का डर रहना चाहिए कि वे किरदार दोहरा रहे हैं. मैं हर फिल्म में अलग अलग तरह के किरदार निभा रहा हूं.

आज से दस साल बाद एक अभिनेता के रूप में आप खुद को कहां देखते हैं?

मैं ना तो शाहरुख बनना चाहता हूं, ना ही नसीरुद्दीन शाह. मैं नवाजुद्दीन बनना चाहता हूं और उसका सफर बहुत लंबा है. ऐसा नहीं है कि मैं पांच छह फिल्में कर के रुक जाउंगा. मैं नवाज हूं, नवाज ही बनना चाहता हूं. कभी जब एक्टिंग की बात हो तो हल्का फुल्का मेरा भी जिक्र आ जाए कि एक नवाज था, बस इतना ही चाहता हूं.

पश्चिमी फिल्मों में और खास तौर से यूरोपीय फिल्मों में किरदारों को लिखने में बहुत मेहनत की जाती है. लेकिन भारतीय सिनेमा में लेखक उतनी बारीकी से किरदार नहीं लिखते. क्या आपको लगता है कि इस कारण अभिनेता अपना बेस्ट नहीं दे पाते?

ऐसा उनके साथ होता है जो हमारे यहां सुपरस्टार हैं, क्योंकि वे हर फिल्म में किरदारों को दोहराते हैं. उनके किरदार का बस एक ही पहलू होता है. लेकिन पिछले कुछ समय से हमारे सिनेमा में बदलाव आया है. उसे पूरी दुनिया में देखा और सराहा जा रहा है. अब जो हमारा सिनेमा है वह पश्चिमी सिनेमा से किसी भी मायने में कम नहीं है. तो अब वैसा नहीं रहा.

आपने आमिर खान के साथ काफी काम किया है. 'सरफरोश' से आपने शुरुआत की, फिर 'पीपली लाइव' और अब आप 'तलाश' में उनके साथ काम कर रहे हैं. आमिर के साथ आपका अनुभव कैसा रहा है?

आमिर खान के साथ 'सरफरोश' में मेरे ख्याल से मेरा करीब पचास सेकंड का रोल था. उसके बाद मैंने उनकी फिल्म 'पीपली लाइव' की और फिर 'तलाश' में उन्होंने ही मुझे चुना. उनके साथ काम करना इसलिए अच्छा रहा क्योंकि वह अलग तरह का सिनेमा भी करते हैं, जैसे 'पीपली लाइव' या 'लगान'. वह केवल बॉलीवुड की मसाला फिल्में ही नहीं करते. और वह बिलकुल एक साथी की तरह काम करते हैं. उनके अंदर कोई इनसिक्यूरिटी नहीं है. अगर किसी सीन पर चर्चा हो रही है तो वह एक आम अभिनेता बन कर उसे करते हैं. इसलिए मुझे उनके साथ काम करना बहुत अच्छा लगता है.

आपकी फिल्म कई फेस्टिवल में दिखाई गई. आपको न्यूयॉर्क में बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड भी मिला. क्या आपने सोचा था कि फिल्म को और आपको इतना सराहा जाएगा?

नहीं, मुझे बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी. मुझे न्यूयॉर्क के बारे में बाद में पता चला. मैं कान फिल्म फेस्टिवल में गया हुआ था. वहां मेरी तीन फिल्में दिखाई जा रही थी: 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' भाग एक और दो; और 'मिस लवली'. मैं जब मुंबई लौटा तब पता चला कि न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल में मुझे 'देख इंडियन सर्कस' के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला है. मुझे बहुत अच्छा लगा. यह मेरे जीवन का पहला अवॉर्ड है.

अचानक ऐसी फिल्मों की बाढ़ आ गई है जिनमें आम जिंदगी दिखाई जाती है. अचानक बॉलीवुड की दिशा बदल गई है. क्या दर्शक बदल गए हैं या निर्देशकों की पसंद में बदलाव आ गया है?

पिछले पांच छह सालों से ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट हो रही हैं. यकीनन दर्शक बदले हैं. इस तरह के निर्देशक पहले भी थे. उन्हें मौका नहीं मिलता था. इस तरह की फिल्मों को फाइनेंसर नहीं मिला करते थे. इस बदलाव के पीछे अनुराग कश्यप का बहुत बड़ा हाथ है. उनकी वजह से बहुत सारे नए निर्देशक आ रहे हैं. उन पर विश्वास किया जा रहा है और यह यकीन बॉक्स ऑफिस पर झलक भी रहा है.

क्या आपको लगता है कि बॉलीवुड में इस तरह के दौर आते हैं. कभी शाहरुख खान की रोने धोने वाली फिल्में चल पड़ती हैं तो कभी अक्षय कुमार की कॉमेडी, और आज कल ऐसी फिल्में जिनमें रोजमर्रा की जिंदगी दिखती है?

जी, ऐसा तो है. पर यह चलता रहेगा. फॉर्मूला फिल्में भी चलेंगी और इस तरह का सिनेमा भी. इस तरह से दर्शकों को हर तरह का सिनेमा देखने का मौका मिल रहा है. आप इंडिपेंडेंट फिल्में भी देख रहे हैं और फॉर्मूला फिल्में भी चल रही हैं. अब पहले की तरह नहीं रहा कि आप बस दाल रोटी ही खिलाते रहें. अब मच्छी भी है और कोरमा भी.

आगे आप किन फिल्मों पर काम कर रहे हैं?

मैं भी इरफान खान के साथ एक फिल्म 'लंचबॉक्स' पर काम कर रहा हूं. बिपाशा के साथ भी एक फिल्म कर रहा हूं.

क्या ये दोनों फिल्में भी पैरेलेल सिनेमा की ही दिशा में हैं या मेनस्ट्रीम के करीब हैं?

पैरेलेल सिनेमा तो अब कुछ रह ही नहीं गया. कुछ समय में लोगों के लिए यह तय करना ही मुश्किल हो जाएगा कि यह पैरेलेल सिनेमा है या मेनस्ट्रीम, क्योंकि दोनों ही तरह की फिल्में हिट हो रही हैं. मेरे ख्याल से फिल्में सिर्फ दो तरह की होती हैं - एक अच्छी फिल्म और एक बुरी. और मैं अपनी तरफ से अच्छी फिल्में करने की कोशिश करूंगा.

इंटरव्यूः ईशा भाटिया, श्टुटगार्ट

संपादनः महेश झा

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