नफरत की भावना से कैसे बचेगा यूरोप? | दुनिया | DW | 27.07.2016
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दुनिया

नफरत की भावना से कैसे बचेगा यूरोप?

नफरत और आतंक के खिलाफ प्रार्थना और उपवास. फ्रांस में 85 वर्षीय पादरी की हत्या के बाद दुनिया भर के कैथोलिक शोक मना रहे हैं. सऊदी अरब चुप है. डॉयचे वेले के क्रिस्टॉफ श्ट्राक का कहना है कि नफरत के पीछे बहुत से लोग हैं.

ये एक बर्बर अपराध था जिसने दुनिया भर में लोगों को दहला दिया. एक बूढ़े पादरी की उसके गिरजे में प्रार्थना के दौरान हत्या एक ऐसा अपराध है जो मानवता की सबसे पुरानी परंपरा को धता बताता है. मंदिर, सिनागॉग और गिरजे जैसी पवित्र जगहें पवित्र हैं और वहां भगोड़ों को सुरक्षा मिलती है.

ये एक बर्बर अपराध है और पहले से ही घायल फ्रांस की आत्मा पर आघात है. फ्रांस, धर्म से प्रभावित एक धर्मनिरपेक्ष राज्य. फ्रांस, प्राचीन रोम की सबसे बड़ी बेटी. यूरोप में घूमने वालों को नॉरमांडी, बुरगुंड और वेंडी के देहातों में गांवों का पता है, जहां विशालकाय गिरजे ज्यादातर शांत रहते हैं. कभी कभी कोई बुजुर्ग पादरी वहां प्रार्थना का आयोजन करता है.

आतंक के खिलाफ प्रार्थना

साँ एतियेन दू रूवरे में ये पादरी जाक हामेल थे जो कुछ ही दिनों में 86 साल के होते. पेंशन में जाने के 10 साल बाद भी वे अपने समुदाय के लिए उपलब्ध थे. लोग इस साधारण और विनम्र पादरी को संवेदनशील, सामान्य और दोस्ताना इंसान बताते हैं. गिरजे पर हमला करने वाले दोनों आतंकी हमलावरों ने पहले उन्हें घुटने पर जाने को मजबूर किया और जब बुजुर्ग व्यक्ति ने अपनी रक्षा करनी चाही तो उनका गला रेत दिया. गिरजे में, अलटार के सामने. हत्या कर और लोगों से शहीदों जैसा सम्मान करवा कर इस्लामी कट्टरपंथी शहादत शब्द को बदनाम कर रहे हैं. वे बस मामूली हत्यारे हैं, अमानवी अपराधी हैं.

पादरी जाक हामेल इसके विपरीत सही मायनों में शहीद हैं. निर्दोष जिनकी प्रार्थना के समय धार्मिक कारणों से हत्या की गई. रूएन के आर्चबिशप जोमिनीक लेबरुन को पादरी हामेल की हत्या का पता क्राकोव में चला जहां इस समय विश्व कैथोलिक युवा समारोह हो रहा है. उन्होंने एक बडी़ बात कही. "कैथोलिक गिरजा प्रार्थना और इंसानों के बीच भाइचारे के अलावा किसी हथियार को नहीं जानता." फ्रांस का चर्च अब एक दिन उपवास और प्रार्थना करेगा.

नफरत और उसके पोषक

इस फैसले के पीछे ये प्रतिबद्धता है कि अपराध का बदला अपराध और बदले की भावना से नहीं दिया जाता. जर्मन कैथोलिक बिशपों के प्रमुख राइनहार्ड मार्क्स की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया थी, साँ एतियेन की घटना का मकसद नफरत फैलाना था, "जिसका हम प्रतिरोध करेंगे." इसके लिए यथासंभव प्रयास करना होगा कि यह घटना नई हिंसा का कारण न बने. लेकिन फिर भी अपराधियों की अंधभक्ति का सवाल तो बचता ही है. खासकर तथाकथित इस्लामिक स्टेट जैसी व्यवस्था के पागलपन के बाद जो मौत का जश्न मनाता है.

जर्मनी में मुस्लिम संगठनों के नेता आयमान माजिएक जैसे मुसलमानों ने हामेल की हत्या और अन्य हमलों की निंदा की है. वे आस्थाओं के सहमेल में विश्वसनीय पार्टनर हैं लेकिन वे भी असहाय दिखते हैं. जरूरी है रियाध की प्रतिक्रिया. सऊदी अरब का वहाबी इस्लाम आतंक की घटनाओं से कब परेशान होगा? सऊदी अरब की वित्तीय मदद से चलने वाले दुनिया भर के मस्जिदों और स्कूलों के उपदेशों में स्वघोषित योद्धाओं की आलोचना कब शुरू होगी? नफरत और बर्बरता के पीछे बहुत से लोग हैं. और बहुत ज्यादा लोग इस दहशत को स्वीकार कर रहे हैं.

LINK: http://www.dw.de/dw/article/0,,19428773,00.html

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