नफरत का नया प्रोजेक्ट | ब्लॉग | DW | 18.09.2013
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

ब्लॉग

नफरत का नया प्रोजेक्ट

पिछला पेज

कितनी हैरानी की बात है कि एक भी ऐसी दिल को छू लेने वाली, घावों पर मरहम लगाने वाली और शांति की एक सच्ची कामना से भरी कोई अपील या बयान किसी नेता या बिरादरी या प्रेम के टेढ़ेमेढ़े रास्तों पर निकल जाने वाले युवाओं को क्रूर सजाएं देने वाली खाप पंचायतों की ओर से नहीं आया. जो लोग लुट गए या घर छोड़ गए न जाने अब लौटेंगे कि नहीं, उनके लिए उनके बच्चों और स्त्रियों के लिए सांत्वना की कोई अपील किसी दिग्गज ने नहीं की. जैसे लोगों को अपने घरों में ही जलने के लिए छोड़ दिया गया है. कोई ये नहीं कहता कि कमजोरों को इस तरह से घेरना बंद करो. नफरत और बेयकीनी से मत घिरो. वर्चस्व और लालच के बाड़े तोड़ो. उन्मादियों को जगह मत लेने दो. सौहार्द को मत कुचलो.

मुजफ्फरनगर में हिंदू जातियां और मुसलमान एक वृहद जातीय संरचना के तहत पीढ़ियों से रहते आए थे. देहात में जातीय भीषणताएं बेशक थीं, लेकिन इस तरह के सफाए के प्रोजेक्ट के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था. ये सब 90 के दशक के बाद अचानक शुरू हुआ. एक ओर मुक्त बाजार था तो दूसरी ओर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मानो एक तत्काल अभियान. इन सबके पीछे कोई बड़ी परियोजना थी. वो सत्ता ही रही होगी.

मुजफ्फरनगर के एक देहात में एक गहरे मित्र का घर है. वो छुट्टियों में अपनी पत्नी और बच्चे के साथ पिछले दिनों घर आए थे. उन्होंने फंसे हुए गले से बताया था कि बहुत सिलसिलेवार और तैयारी के साथ हमले किए गए. उनकी आवाज में हिंसा के कारणों को ठीक ठीक समझ पाने और नए खतरों को भांप लेने की चिंताएं थीं. और वो हिंदूवादी जुनून की डगमगाती और चूर छायाओं को देख पा रहे थे.

झपट का घिनौना विस्तार हो रहा है. कब्जों की नई लड़ाइयां धर्म और जाति के विद्वेषों और नफरतों से लैस हैं. एक तरफ भूमंडलीय कॉरपोरेट अभियान और दूसरी ओर छोटे छोटे स्तरों पर आर्थिक और सामाजिक वर्चस्व पाने के लिए खूंरेजी. कमजोर तबकों की बेदखली का निर्णायक प्रोजेक्ट भी यह है. इसके कार्यकर्ता आपको दिखते नहीं है. ये एक फुसफुसाती हुई व्यवस्था है.

इस बार मुजफ्फरनगर का देहात सांप्रदायिक दबंगई के हवाले जिस तरह हुआ, वो अभूतपूर्व था. इससे खौफ और बढ़ गए हैं. मास मीडिया के औजार, सांप्रदायिक वितृष्णा के नए और घातक हथियार बन गए हैं. फेसबुक नीचताओं का अड्डा बनाया जा रहा है. कौन रोकेगा इसे. बुराई और हिंसा को अपलोड करने की ये कैसी विधा हमने पा ली है. हिंसा और नफरत का ये कैसा अपलोड है. जेहन से लेकर फोन और फेसबुक तक.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादनः अनवर जे अशरफ

पन्ना 1 | 2 | पूरी रिपोर्ट

विज्ञापन