′धमकियां तो मिलती रहती हैं′ | दुनिया | DW | 07.03.2012
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दुनिया

'धमकियां तो मिलती रहती हैं'

10 साल पहले बलात्कार की शिकार होने के बाद मुख्तारन माई अब पाकिस्तान में महिलाओं के लिए मुहिम चला रही हैं.

लगभग दस साल पहले पाकिस्तान के मुज्जफरगढ़ जिले में मुख्तारन बीबी का छह लोगों ने मिलकर बलात्कार किया. उस वक्त 12 साल के उनके भाई पर आरोप लगे थे कि उसने मस्तोई बलोच के परिवार की एक महिला को छेड़ने की कोशिश की. गांव की पंचायत ने फैसला दिया कि लड़के के परिवार को इसकी कीमत चुकानी होगी. कीमत मुख्तारन ने चुकाई और छह लोगों ने मिलकर उनका बलात्कार किया. यातना और दुख से टूट चुकीं मुख्तारन उस वक्त खुदकुशी भी कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने अदालत में शिकायत दर्ज की. लंबी सुनवाई के बाद छह में से पांच आरोपियों को छोड़ दिया गया और एक को आजीवन कारावास की सजा दी गई. वापस अपने गांव में मुख्तारन को बहुत बेइज्जती झेलनी पड़ी, लेकिन उन्होंने अपने इलाके में महिलाओं के लिए मुहिम शुरू किया. आज उनकी संस्था महिलाओं के हक के लिए काम कर रही है. डॉयचे वेले के साथ खास बातचीत में उन्होंने पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति के बारे में बताया.

डॉयचे वेलेः 2002 से लेकर आज तक अगर देखा जाए तो क्या आपको लगता है कि आपके इलाके में लड़कियों की हालत कुछ बेहतर हुई है?

मुख्तारन बीबीः पहले से तो अल्लाह का शुक्र है कि काफी बेहतर है. तब्दीली में तो कितने साल लग जाते हैं लेकिन हमारे इलाके में काफी फर्क आया है. यह लोग पहले बच्चों को तालीम दिलाने नहीं लाते थे. अब यहां 700 लड़कियां पढ़ने आती हैं.

पहले कैसी हालत थी?

पहले तो ऐसा था कि लड़की की सात आठ साल में शादी हो जाती. वो अपने शौहर को पहली बार तब देखती जब उसकी शादी कर के वो उसे ससुराल ले जाते थे. अब तो वो तरीके से रहती हैं, मीडिया के जरिए और हम जो यहां छोटे प्रोग्राम करते हैं उसकी वजह से. पहले किसी के साथ ज्यादती होती थी तो कोई आवाज नहीं उठाता था, अब जिसके साथ भी ज्यादती होती है, उन्हें इंसाफ मिले न मिले, वह अपने हक के लिए आवाज जरूर उठाता है.

किस तरह की ज्यादती की बात कर रही हैं आप?

किसी किस्म की भी ज्यादती हो, चाहे रेप हो या घरेलू अत्याचार हो, हर किस्म की ज्यादती के खिलाफ अब औरत आवाज उठाती है.

पहले लड़कियों के लिए सुरक्षा की स्थिति कैसी थी और क्या अब भी वे सड़कों पर आराम से घूम सकती हैं, बिना किसी खतरे के?

यह तो नहीं है, हम यह नहीं कह सकते, इतना कोई बदलाव नहीं आया कि लड़कियां आराम से घूम सकें हैं. हम लोग अपनी बात कर सकते हैं. औरत को पहले बोलने नहीं दिया जाता था. वह अपने हकों के लिए नहीं बोल सकती थी. अब वह अपनी आवाज उठाती है. लेकिन जो हम लोग कोशिश कर रहे हैं, मीडिया और बाकी सब, इंशाल्लाह यह दिन भी आएंगे.

आपकी संस्था किस तरह के काम करती है?

मेरी जो तन्जीम है उसका सबसे पहला मकसद तालीम है. दूसरा शेल्टर होम है जहां अगर किसी को जान का खतरा होता है तो उसे पनाह दी जाती है. तीसरा काम है रिसोर्स सेंटर. मतलब जो औरत वहां आई है उसे रिसोर्सेज देना. वकील दिलाना, उसे कोर्ट में पेश करना, कहीं कोई औरत फंसी है और उसे जान का खतरा है, तो हमारे मोबाइल यूनिट हैं, उसके जरिए उसे लाना और उसकी जान बचाना.

किस तरह के मामले होते हैं जिसमें महिलाओं की जान बचाने की बात आ जाती है?

जैसे कोई लड़की किसी के साथ शादी नहीं करना चाहती और किसी दूसरे को पसंद करती है. उसके माता पिता कहते हैं कि इसी से शादी करो. कुछ मामले होते हैं कि किसी लड़की को शक की बुनियाद पर कहते हैं कि आप फलां आदमी से बात कर रही थीं, और फिर उन्हें उन्हें बदलचलन करार दे दिया जाता है. उन्हें मारने का खतरा होता है. इसके लिए हमारी हेल्पलाइन है. यहां वह फोन करती हैं. फिर हमारे रिसोर्स सेंटर के लोग, वकील और पुलिस वहां जाकर लड़की को निकालते हैं.

जब किसी लड़की को उसका शौहर ने छोड़ दिया हो या फिर उसके सात बलात्कार हुआ हो तो इसके बाद समाज में वापस लौटने पर उसकी कितनी इज्जत होती है?

कभी कभी ऐसा होता है कि उनकी शर्तें मानकर उनके मां बाप उन्हें घर ले जाते हैं. वो भरोसा देते हैं कि जहां लड़की शादी करना चाहती हैं वहां उसकी शादी कराएंगे. अदालत में उनसे यह बात लिखवाते हैं और अगर वो नहीं मानते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है. अगर किसकी लड़की को तलाक चाहिए तो हम इसमें भी मदद करते हैं.

आपके काम में किस तरह की मुश्किलें आती हैं?

जब इन्सान इस काम में आता है तो मुश्किलें तो होती ही हैं. सबसे बड़ी मुश्किल होती है जब हम लड़की को लेने उसके घर जाते हैं. हमें पता नहीं होता कि वे कैसे हैं और किस सूरत में बैठे होते हैं. हमारे स्टाफ को बहुत ज्यादा खतरा होता है क्योंकि यह जान पर खेलने की बात होती है.

क्या आपको भी धमकियां मिली हैं?

वो तो मिलती रहती हैं.एक दिन की नहीं, रोज की बात है.

आपके साथ जो कुछ हुआ और उसके बाद आपने जो काम महिलाओं के लिए किया, उसके बाद समाज आपको कैसे देखता है?

अल्लाह का शुक्र है अब अच्छी नजर से देखते हैं. इज्जत करते हैं. पहले तो जिसके साथ ज्यादती होती थी उसी को गुनहगार मानते थे. उसको ही अजीब नजरों से देखा जाता है. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

आठ मार्च, महिला दिवस के दिन आप क्या कर रही हैं?

यहां सीदपुर में एक वाकया हुआ है, जोरामई एक महिला है, उसके कपड़े उतार कर उसे सड़कों पर घसीटा गया है. उसके लिए हम सीदपुर में रैली कर रहे हैं. अभी वह अस्पताल में हैं.

महिलाओं के लिए भविष्य आपको कैसा दिख रहा है, क्या हालत बेहतर होती दिख रही है?

जैसे हमारे कानून बन रहे हैं, इन पर अमल हो तो बेहतरी आ सकती है. लेकिन कानून ही इस तरह चलता रहा तो मुश्किल होगी. क्योंकि हम लोग तो बदल नहीं सकते, हुकूमत को भी चाहिए कि वह अपना किरदार निभाए. कानूनी दायरों को भी अपना रोल निभाना चाहिए.

दुनिया भर की महिलाओं को आप महिला दिवस पर क्या कहना चाहेंगी?

मैं दुनियाभर की खवातीनों को कहना चाहूंगी कि जिनके साथ ज्यातती होती है, जुल्म होता है, हम सब मिलकर उन्हें हौसला दें और उसके साथ खड़े हों.

इंटरव्यूः मानसी गोपालकृष्णन

संपादनः एन रंजन

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