′देवभूमि′ उत्तराखंड में महिलाओं पर बढ़ते हमले | दुनिया | DW | 24.12.2018
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

'देवभूमि' उत्तराखंड में महिलाओं पर बढ़ते हमले

उत्तराखंड में एक आदमी के पेट्रोल हमले की शिकार छात्रा ने रविवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया. लोग स्तब्ध और चिंतित हैं और स्कूलों कॉलेजों और सड़कों पर सुरक्षा के अतिरिक्त उपायों की मांग की जाने लगी है.

दिल्ली के निर्भया कांड की शोकाकुल बरसी के दिन, 16 दिसंबर की दोपहर को, उत्तराखंड के पौड़ी जिले के एक ग्रामीण इलाके में 18 साल की छात्रा कॉलेज से घर लौट रही थी. उसके पीछे लगा 30 साल का टैक्सी चालक एक सुनसान मोड़ पर उसे रोकने और छेड़ने की कोशिश करने लगा. विरोध करने पर उसने छात्रा पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी.

करीब 80 फीसदी जली हालत में लड़की को नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया, और उसके बाद नाजुक स्थिति में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया. लेकिन एक हफ्ते के संघर्ष के बाद उसने दम तोड़ दिया. इस आघात से परिवार बिखर सा गया है और पहाड़ स्तब्ध है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और उत्तराखंड पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर लगातार बढ़ रही है. लोगों में रिपोर्ट करने की जागरूकता को भी इन बढ़े हुए आंकड़ों की वजह बताया जाता है, लेकिन आंकड़ों के पीछे जो भयानक मंजर है वो तो जस का तस है.

2016 में रेप के 187 मामले दर्ज किए गए, और 2017 में 236. इस साल जुलाई तक का आंकड़ा ही 300 के पार जा चुका है. उत्पीड़न के मामले भी कमोबेश इसी दर से बढ़ते हुए 300 के पार हैं. ज्यादातर आपराधिक वारदातें देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंहनगर से हैं. मंडलवार देखें तो कुमांऊ मंडल में 2017 में रेप के 100 मामले और गढ़वाल मंडल में 136 मामले सामने आए. लेकिन इस साल जुलाई तक कुमाऊं में 125 मामले और गढ़वाल में 181 मामले रजिस्टर हुए है. हालांकि पुलिस का कहना है कि बलात्कार के मामलों में कई बार शिकायतें फर्जी भी पाई गई हैं और उनका तदानुसार निस्तारण भी किया गया है. लेकिन चिंताजनक तो ये है ही कि संदिग्ध अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं.

उत्तरकाशी में पिछले दिनों एक नाबालिग लड़की से बलात्कार कर फिर उसकी हत्या कर दी गई थी. फिर इस अपराध को सांप्रदायिक और क्षेत्रवादी रंग देने की कोशिश भी की गई. देहरादून में ही एक प्रतिष्ठित कॉलेज की छात्रा को कुछ दबंगों ने घेरकर मारपीट की, गालियां और धमकियां दीं. लड़की इस कदर डरी हुई बताई जाती है कि उसे मनोवैज्ञानिक उपचार दिया जा रहा है. पुलिस ने कॉलेज के इर्दगिर्द सुरक्षा देने की बात कही है.

उत्तराखंड की ये घटनाएं दहलाने वाली इसलिए भी हैं कि ये वारदातें उन पहाड़ों में हो रही हैं, जिसे कथित तौर पर देवभूमि बताया गया है. स्थानीय भावनाओं से लेकर स्थानीय सत्ता राजनीति में "देवभूमि” अघोषित रूप से नत्थी है. छिटपुट आंदोलनों और प्रदर्शनों को छोड़ दें, तो बलात्कार, हिंसा और आग के हवाले कर देने की बर्बरताओं पर देवभूमि के भावनात्मक हाहाकार को सांप सूंघ जाता है. और यही वो आड़ भी है जिसकी वजह से हम देखने में असमर्थ हैं या देखना नहीं चाहते हैं कि उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र, दमन भट्टियों में क्यों तब्दील हो रहे हैं. कैसे लड़कियां असुरक्षित बनाई जा रही हैं और लड़के कैसे खूंखार, वहशी.

महिला उत्पीड़न पर भारत की छवि कोई अच्छी नहीं कही जा सकती है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाल के दिनों में हुए अध्ययनों और आंकड़ों में सामने आ चुका है कि औरतों पर हमारा समाज खूंखार है. क्या पहाड़ क्या मैदान. पड़ोसी हिमाचल हो या कश्मीर, उत्तरप्रदेश का उन्नाव या आजमगढ़, झारखंड का पाकुड़ या चतरा जिला हो, बिहार का खगड़िया या राजस्थान का जोधपुर या डूंगरपुर, मध्यप्रदेश का राजगढ़, तेलंगाना का जांगौन, सिंकदराबाद या देश की राजधानी दिल्ली- कौन सी ऐसी जगह होगी जहां स्त्री देह इस तरह न जल रही हो.

आखिर पुलिस कब तक और कहां तक हर गली नुक्कड़ चौराहे स्कूल कॉलेज सुनसान तक - कहां कहां हिफाजत के लिए तैनातियां करेगी. उन ग्रामीण इलाकों का क्या जहां आम पुलिस नहीं बल्कि राजस्व पुलिस और पटवारी का नियंत्रण है. तात्कालिक रूप से ऐसे उपाय सही हो सकते हैं लेकिन इस बीमारी के समूल नाश के लिए तो सामाजिक और प्रशासनिक उपायों को तीक्ष्ण बनाना होगा. महिलाओं के प्रति व्यवहार और मानसिकता में बदलाव रातोंरात नहीं आएगा, लेकिन इसके लिए छोटे छोटे और विविध स्तरों पर कोशिशें करनी होंगी. लड़कियों के प्रति भेदभाव मिटाने और उन्हें वस्तु मानने वाली वासना से निपटने के लिए घरों से ही शुरुआत करनी चाहिए.

परिवार अगर अपने घर की बेटियों को लेकर संवेदनशील होंगे और अपने घर के लड़कों को लैंगिक सम्मान के सबक लगातार देते रहेंगे तो कुछ असर पड़ सकता है. धीरे धीरे ये अभियान सामाजिक और सामूहिक स्तरों पर चलाया जाना चाहिए. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के लुभावने नारे पेट्रोल डालने वाले या गालियां देने वाले लड़कों के कानों तक नहीं पहुंच रहे हैं. सुधारने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं होगा बल्कि उन्हें एक कड़े अभ्यास से गुजारना होगा. सेक्स और लड़कियों को लेकर उनकी सड़ीगली और अधकचरी मान्यताओं को ध्वस्त करना होगा. वर्जनाओं का समाज ऐसे ही कामलोलुप और सेक्स के भूखे शोहदों का समाज बनता जाता है. फिर वो देवभूमि हो या मातृभूमि.

सही है कि लोग जागरूक हुए हैं और लड़कियों की शिक्षा को लेकर सक्रिय भी हैं. अपनी बेटियों का भविष्य बनाने की चिंता और सरोकार व्यापक हुए हैं. यह भी सही है कि साक्षरता दर बढ़ी है, लेकिन साक्षर और शिक्षित करने के सरोकार आगे चलकर ठिठक क्यों जाते हैं. जिस समाज में अभी भी सिर्फ एक ट्रेलर देखकर चंद कट्टरपंथी लोग, लवजेहाद कहकर एक फिल्म को रिलीज करने से ही रुकवा देने का माद्दा रखते हों, वहां सामाजिक जागरूकता की कैसी अपेक्षा कर सकते हैं. लव-जेहाद के नाम पर भीड़ इकट्ठा करने वालों को सोचना चाहिए कि पहाड़ की लड़कियों पर झपटने वाले वहीं आसपास घूम रहे हैं, घर हो या जंगल या सड़क स्कूल मैदान. कोई नहीं जानता कि वे कब बलात्कारियों और हत्यारों में बदल जाते हैं.

DW.COM

संबंधित सामग्री