दूरबीन से डार्क मैटर से पर्दा उठाने की कोशिश | विज्ञान | DW | 15.07.2012
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

विज्ञान

दूरबीन से डार्क मैटर से पर्दा उठाने की कोशिश

वैज्ञानिक सबसे बड़ी दूरबीन का इस्तेमाल कर न्यूट्रीनो जैसे सूक्ष्म कणों का रहस्य जानने में लगे हैं जिससे कि बह्मांड के बनने की कहानी पता चले. दुनिया कैसे बनी यह जानने की बेचैनी उन्हें नए तरीके ढूंढने पर विवश कर रही है.

आइस क्यूब नाम की इस विशाल दूरबीन को बनाने में 10 साल लगे हैं और यह अंटार्कटिक के बर्फ में करीब 2400 मीटर की गहराई में है. एक घन किलोमीटर लंबी यह दूरबीन कितनी बड़ी है यह इससे समझा जा सकता है कि न्यूयॉर्क का एंपायर स्टेट बिल्डिंग, शिकागो का विलिस टावर और शंघाई के वर्ल्ड फाइनेंशियल सेंटर की पूरी लंबाई मिलाने पर भी यह दूरबीन से छोटी ही होगी.

यह दूरबीन न्यूट्रीनो जैसे सूक्ष्म कणों पर निगरानी रखने के लिए बनाई गई है. अंतरिक्ष में सितारों की टक्कर होने पर यह कण पैदा होते हैं और करीब करीब प्रकाश की गति से चलने लगते हैं. पिछले हफ्ते हिग्स बोसोन जैसे एक कण की खोज होने के बाद से इस दूरबीन की ओर लोगों की दिलचस्पी ज्यादा दिखने लगी है. माना जा रहा है कि ब्रह्मांड के निर्माण की बुनियाद यही कण है.

न्यूजीलैंड की कैंटरबरी यूनिवर्सिटी में भौतिकी की प्रोफेसर और आइस क्यूब पर काम कर रही जेनी एडम्स बताती हैं, "आप अपनी एक उंगली उठाते हैं और सूरज से निकले सैकड़ों अरब न्यूट्रीनो हर सेकेंड इससे होकर गुजर जाते हैं." आइस क्यूब वास्तव में लाइट डिटेक्टरों की एक ऋंखला है जिन्हें बर्फ में बहुत गहराई तक लगाया गया है. न्यूट्रीनो हर जगह मौजूद हैं. जब वे बर्फ के संपर्क में आते हैं तो आवेशित कणों को जन्म देते हैं और तब प्रकाश भी पैदा होता है, जिसे डिटेक्टर पकड़ लेता है. इस प्रक्रिया में बर्फ एक ऐसे जाल के रूप में काम करता है जो न्यूट्रीनो को अलग कर उन्हें नजर में ला देता है.

मेलबर्न में इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन हाई एनर्जी फिजिक्स के दौरान एडम्स ने पत्रकारों को बताया, "अगर हमारी आकाशगंगा से सुपरनोवा अब गुजरे तो हम आइस क्यूब के जरिए सैकड़ों न्यूट्रीनो का पता लगा सकते हैं. हम उन्हें अलग अलग तो नहीं देख पाएंगे लेकिन पूरा डिटेक्टर इस तरह रोशन हो जाएगा जैसे कि भारी आतिशबाजी के दौरान होता है." वैज्ञानिक इन कणों की गति पर नजरें टिका कर उनके पैदा होने की जगह का पता लगाने में जुटे हैं. उन्हें उम्मीद है कि इसके जरिए वो यह पता लगा सकेंगे कि अंतरिक्ष में क्या होता है. खासतौर से अंतरिक्ष के उस अनदेखे हिस्से में जिसे डार्क मैटर कहा जाता है.

आइस क्यूब 2010 में बन कर तैयार हुआ. इसके पहले वैज्ञानिकों ने केवल 14 न्यूट्रीनो देखे थे. इस नए उपकरण के जरिए अब तक सैकड़ों न्यूट्रीनो कणों का पता लगाया जा चुका है. अब तक जो कण मिले हैं वो सब पृथ्वी के वायुमंडल में पैदा हुए हैं लेकिन आइस क्यूब के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वो आखिर में अंतरिक्ष से निकले न्यूट्रीनो का भी पता लगा लेंगे. एडम्स ने कहा, "हम यह पता लगा ही लेंगे कि न्यूट्रीनो आते कहां से हैं."

एनआर/एमजे (रॉयटर्स)

DW.COM

विज्ञापन