दीदी का जादू और बीजेपी का कमाल | दुनिया | DW | 19.05.2016
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दुनिया

दीदी का जादू और बीजेपी का कमाल

पश्चिम बंगाल में यह विधानसभा चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ा गया था तो असम में नयी बयार लाने के लिए. बंगाल में मतदाताओं ने वर्तमान सरकार में भरोसा जताया है तो असम में नए नेतृत्व को मौका दिया है.

बंगाल में दीदी के नाम से मशहूर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए एक-दूसरे के परंपरागत दुश्मन रहे लेफ्टफ्रंट और कांग्रेस ने भी अपनी नीतियों से समझौता करते हुए हाथ मिलाया था. उन्होंने शारदा चिटफंड घोटाले से लेकर नारद स्टिंग वीडियो और कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे के जरिए ममता सरकार पर जम कर हमला बोला था. लेकिन लोगों ने विपक्ष के इस गठजोड़ को नकारते हुए एक बार फिर दीदी पर ही भरोसा जताया है. उधर, बंगाल के पड़ोसी असम में बीजेपी को भारी कामयाबी मिली है. वहां बांग्लादेशी घुसपैठ के संवेदनशील मुद्दे के साथ-साथ तरुण गोगोई सरकार के खिलाफ चलने वाली प्रतिष्ठान विरोधी लहर ने केसरिया पार्टी को पहली बार पूर्वोत्तर भारत के सबसे बड़े राज्य में सरकार बनाने लायक बहुमत सौंपा है.

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में ये चुनाव पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले काफी अहम था. अबकी विपक्ष ने दीदी को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए कोई भी हथकंडा उठा नहीं रखा था. विपक्षी राजनीतिक दलों ने चुनावों के तटस्थ व निष्पक्ष होने के लिए चुनाव आयोग की भी सराहना की थी. अब वह तृणमूल पर चुनावी धांधली का भी आरोप नहीं लगा सकता. इससे साफ है कि आम लोगों ने विपक्षी गठजोड़ और उसकी ओर से उठाए गए मुद्दों को नकारते हुए एक बार फिर ममता बनर्जी पर ही भरोसा जताया है. चुनावी नतीजों से यह भी साफ हो गया है कि पार्टी के नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद बीते पांच वर्षों के दौरान ममता का जादू फीका पड़ने की बजाय और बढ़ा ही है. जहां तक विपक्ष का सवाल है नतीजों के आने के बाद लेफ्ट-कांग्रेस गठजोड़ के खिलाफ सीपीएम में बगावती सुर उठने लगे हैं. नतीजों से आम लोगों की इस गठजोड़ के प्रति नाराजगी झलकती है. हां, तृणमूल कांग्रेस और इस गठजोड़ के झगड़े में उस बीजेपी को फायदा हुआ है जिसका खाता तक नहीं खुलने की संभावना जताई जा रही थी.

बंगाल में आमतौर पर ग्रामीण इलाके ही सत्ता की चाबी रहे हैं. लेकिन इन नतीजों से साफ है कि अबकी शहरी क्षेत्र के मतदाताओं ने भी तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया है. इससे यह भी साबित हुआ है कि शारदा और नारद स्टिंग वीडियो का विपक्ष का दांव बेअसर रहा है. विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां प्रतिष्ठान विरोधी लहर बेअसर रही. वैसे, यह कहना ज्यादा सही होगा कि दरअसल यहां वैसी कोई लहर थी ही नहीं. यह महज विपक्ष की उपज थी. वोटरों ने दीदी की सरकार को एक और मौका देना मुनासिब समझा है. इसके अलावा उनको लेफ्ट-कांग्रेस गठजोड़ पर भी भरोसा नहीं था. इसकी वजह यह है कि राज्य में साझा सरकारों का रिकार्ड कोई बेहतर नहीं रहा है. बीते विधानसभा चुनावों में भी तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बनाई थी. लेकिन साल भर के भीतर ही कांग्रेस को सरकार से बाहर जाना पड़ा था. यही वजह है कि अबकी लोगों ने अकेले तृणमूल कांग्रेस को भारी बहुमत देने का फैसला किया.

इस जीत के साथ वह राज्य में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाली छठी नेता बन गई हैं. वे ऐसा करने वाली अब तक की पहली और अकेली महिला हैं. अबकी ममता की जीत से यह भी साबित हो गया है कि प्रतिष्ठान विरोधी लहर का चुनावों पर कोई असर नहीं हुआ है. ममता की तृणमूल कांग्रेस अबकी अकेले अपने बूते चुनाव मैदान में उतरी थी. वर्ष 1962 के बाद यह पहला मौका है जब अकेले मैदान में उतरने वाले किसी सत्तारुढ़ पार्टी को बहुमत मिला है. उस समय कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा था और राज्य विधानसभा की 252 में से 152 सीटों पर जीत हासिल की थी। अब ममता ने एक बार फिर वही इतिहास दोहराया है.

इन नतीजों ने बता दिया है कि कभी लालकिला कहे जाने वाले बंगाल में सीपीएम के पैरों तले जमीन खिसकने का सिलसिला अभी थमा नहीं है. वामपंथियों को वर्ष 2009 से ही लगातार चौथी बार तृणमूल कांग्रेस के हाथों मुंहकी खानी पड़ी है. अबकी उसने ममता को सत्ता से हटाने के लिए अपने परंपरागत दुश्मन रहे कांग्रेस के साथ भी हाथ मिलाया था. लेकिन इससे भी उसके पैरों तले की जमीन खिसकने का सिलसिला नहीं थमा. सीपीएम से बेहतर प्रदर्शन तो राज्य में साइनबोर्ड के तौर पर सिमटी कांग्रेस का रहा है.

असम

बंगाल के पड़ोसी असम में बीजेपी का भारी बहुमत के सत्ता में आना कई लिहाज से अहम है. पार्टी ने दो साल पहले ही असम में अपने मिशन-84 की रूपरेखा तैयार की थी और उसे अपना लक्ष्य हासिल करने में कामयाबी मिली है. बीजेपी की इस कामयाबी की कई वजहें हैं. इनमें सबसे प्रमुख भूमिका है 15 साल से सत्ता में रहे कांग्रेस सरकार के खिलाफ प्रतिष्ठान विरोधी लहर की. उसके अलावा बीजेपी ने बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ रोकने का जो नारा दिया था वह काफी प्रभावी साबित हुआ है. असम में घुसपैठ का मुद्दा काफी संवेदनशील रहा है. इसी मुद्दे पर अस्सी के दशक में असम आंदोलन हुआ था. यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) समेत कई उग्रवादी संगठन उसी आंदोलन की उपज हैं. बीते विधानसभा चुनावों में लोगों ने तरुण गोगोई की अगुवाई वाली कांग्रेस को भारी बहुमत के साथ लगातार तीसरी बार सत्ता सौंपी थी. लेकिन इन पांच वर्षों के दौरान सरकार पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टचार के आरोप लगते रहे.

उन चुनावों में बीजेपी को राज्य में महज पांच सीटें मिली थीं. लेकिन वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में 14 में से सात सीटें जीत कर पार्टी ने राजनीतिक पंडितों को भी हैरत में डाल दिया था. असम गण परिषद (अगप) और बोड़ो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ भी पार्टी के हित में रहा. बीजेपी ने अखिल असम छात्र संघ के अध्यक्ष रहे सर्वानंद सोनोवाल को पहले ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था. इसका भी अच्छा असर हुआ. सोनोवाल की इलाके के लोगों के बीच साफ-सुथरी छवि रही है. दूसरी ओर, गोगोई सरकार के खिलाफ बगावत भी सिर उठाती रही है. बीते साल ही पार्टी के नौ विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे शीर्ष नेताओं ने राज्य के विकास के जो वादे किए उससे भी वोटरों को लुभाने में सहायता मिली. बरसों लंबे कांग्रेसी शासन के बावजूद राज्य विकास के मोर्चे पर काफी पिछड़ा है. राज्य में बेरोजगारी की समस्या भी बेहद विकराल है. इसी वजह से लोगों ने अबकी उसे सत्ता सौंपने का फैसला किया. लेकिन सबसे बड़ी वजह यह रही कि तरुण गोगोई और उनकी सरकार से लोगों का पूरी तरह मोहभंग हो चुका था.

लेकिन राज्य में बनने वाली नई सरकार और उसके मुख्यमंत्री सोनोवाल की राह आसान नहीं होगी. उनके समक्ष अपने वादों पर खरा उतरने की कड़ी चुनौती है. राज्य के राजनीतिक और सामाजिक हालात को ध्यान में रखते हुए इन वादों, खासकर बांग्लादेशी सीमा सील करने, पर खरा उतरना उसके लिए टेढ़ी खीर ही साबित होगी. लेकिन फिलहाल तो पार्टी अपनी जीत का जश्न मनाने में जुटी है.

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