दिक्कत में जर्मनी के शरणार्थी | दुनिया | DW | 16.03.2013
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दुनिया

दिक्कत में जर्मनी के शरणार्थी

जर्मनी में शरणार्थी कई महीनों से अपने लिए बेहतर हालात की मांग कर रहे हैं. अब कुछ कार्यकर्ता मिलकर एक बस से देश की यात्रा कर रहे हैं और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.

ओबरउर्सेल फ्रैंकफर्ट के उत्तर में है. यहां आ रहे लोगों को सबसे पहले एक बोर्ड दिखता है जिसमें लिखा है, "निजी संपत्ति." बोर्ड में कहा गया है कि यहां आ रहे लोगों को प्रशासन में पंजीकृत होना होगा. इस औद्योगिक इलाके में कौन रहता है, इसका कोई पता नहीं. इलाके में जहाजों के कंटेनर से बने घर हैं. इनके चारों तरफ एक बाड़ा लगाया गया है. हाल ही में घरों के सामने मैदान में बच्चे खेल रहे थे. कुछ किशोर सड़कों पर खड़े थे जब दो पीले बस वहां पहुंचे. बसों से पॉप संगीत की आवाज आ रही थी.

शरणार्थी की खुदकुशी

दोनों बसें रेफ्यूजीस रेवल्यूशन बस टूअर का हिस्सा हैं. ओबरउर्सेल इनका 11वां पड़ाव है. इस बस में 15 शरणार्थी और कुछ कार्यकर्ता हैं. फरवरी से यह जर्मन शहरों का दौरा कर रहे हैं और मार्च के अंत तक 22 शहर का दौरा खत्म करना चाहते हैं. उनकी मांग है कि ओबरउर्सेल की तरह शरणार्थियों के लिए हालात बेहतर किए जाएं. 23 मार्च को विरोधी संगठन बर्लिन में एक रैली का आयोजन कर रहा है.

पिछले साल ईरान के शरणार्थी मुहम्मद रासेपार ने खुदकुशी की. उसने बवेरिया के एक शहर में अपने को फांसी पर टांग लिया. वह चाहते थे कि उत्तरी जर्मन शहर कील में अपनी बहन के पास चले जाएं लेकिन सरकार ने उनकी अर्जी को ठुकरा दिया. रासेपार की कहानी विरोधियों के लिए प्रेरणा बनी और उन्होंने शरणार्थी कानून और उनके हालात में बदलाव लाने के लिए रैलियां करने की योजना बनाई.

अकेलापन के शिकार

तुर्गे तुर्की के बस टूअर का हिस्सा हैं. मार्क्सवादी होने की वजह से उन्हें तुर्की में 15 साल की सजा हुई. तुर्गे के मुताबिक उनका संगठन जर्मन सरकार से मांग कर रहा है कि वह शरणार्थियों के लिए कैंपों और निर्वासन कानून बदलें. शरणार्थियों के लिए एक खास कानून होता है जिसमें शरणार्थी जर्मनी में केवल उन प्रशासनिक इलाकों के भीतर रह सकते हैं जहां उन्हें पंजीकृत किया गया है. जर्मनी के 16 में से 11 राज्यों ने इस कानून में ढील दे दी है और शरणार्थियों को आजाद घूमने की इजाजत है. लेकिन इसे किसी एक शरणार्थी के मामले को देखते हुए भी बदला जा सकता है.

तुर्गे का कहना है कि शरणार्थी शिविर आम तौर पर शहरों से अलग थलग होते हैं और जेल जैसे होते हैं. सूडान के महदी 28 साल के हैं. वे जर्मनी में एक साल से हैं. सूडान में उनके पिता विद्रोही दलों से जुड़ गए जिस वजह से महदी को देश छोड़ना पड़ा. सूडान में वे कई महीनों तक जेल में रहे. "मैं कई यूरोपीय देश देख चुका हूं. मेरा सफर बहुत ही बुरा था. लेकिन जर्मनी मेरे लिए सबसे खराब जगह है. मुझे यहां कुछ भी अच्छा नहीं लगता. हमें सालों तक कैंपों में रखा जाता है. यह लोगों को बेकार बना देते हैं, कैंपों में बिना पढ़ाई या काम के रहना होता है."

चंदे पर निर्भर

हैदर उचर का कहना है कि उन्होंने आंदोलन के प्रति अपनी एकता दिखानी चाही और इसलिए इसमें शामिल हुए. 51 साल के तुर्की मूल के उचर कहते हैं कि वे कभी खुद शरणार्थी थे. उचर कहते हैं कि बसों के टूअर की योजना ध्यान से बनानी होती है क्योंकि पैसा कम है. डोनेशन के जरिए खाना और पेट्रोल का इंतजाम हो जाता है. "रात को हम दोस्तों के घर पर ठहर जाते हैं. हर शहर में कोई न कोई होता है जो हमारी मदद करता है."

उचर के साथ और भी लोग हैं जो उनके साथ इस विरोधी आंदोलन पर बात कर रहे हैं. कैंप के आसपास जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी और तुर्की भाषा सुनी जा सकती है. कार्यकर्ता कैंप में रह रहे शरणार्थियों के साथ बात कर रहे हैं. ईरान से आए एक व्यक्ति का कहना है कि लोग विरोध रैली में नहीं आएंगे. कई शरणार्थियों को कैंपों की हालत ठीक लगती है और बाकी कई लोग डरे हुए हैं. हेसेन राज्य में यह कैंप काफी बदनाम है. यहां 200 लोग रहते हैं. इलाके में सक्रिय नेता और स्वयंसेवियों का कहना है कि यहां रहने के लिए कमरे बहुत ही छोटे हैं और इनमें फफूंद लगी है.

कैंप में 18 साल का पेकन भी है. अफगानिस्तान के पेकन को शरणार्थी मान लिया गया है लेकिन जब तक वह खुद कमा कर अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, तब तक उसे कैंप में रहना होगा. पेकन एक तकनीकी स्कूल में पढ़ाई कर रहा है लेकिन कैंप में शोर से उसे परेशानी होती है. "11 बजे रात को मुझे कुछ शांति चाहिए होती है. लेकिन यहां शोर होता है और लोग बहुत शराब पीते हैं."

पेकन विरोध कार्यकर्ताओं का समर्थन तो करते हैं लेकिन कहते हैं कि बर्लिन में प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए उनके पास वक्त नहीं होगा. उन्हें स्कूल जाना है.

रिपोर्टः स्टेफनी होएपनर/एमजी

संपादनः आभा मोंढे

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