दहेज के लिए होने वाले बेमेल विवाह की भेंट चढ़ रहे हैं पुरुष अधिकारी | दुनिया | DW | 11.09.2018
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दुनिया

दहेज के लिए होने वाले बेमेल विवाह की भेंट चढ़ रहे हैं पुरुष अधिकारी

भारतीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर आठ मिनट पर एक विवाहित पुरुष आत्महत्या करता है. आखिर विवाहित पुरुषों में पनप रही आत्महत्या की इस प्रवृत्ति की वजह क्या है?

कानपुर में एक युवा आईपीएस अधिकारी ने पारिवारिक कलह की वजह से बीते सप्ताह जहर खाकर जान दे दी. इससे पहले बिहार के एक आईएएस अधिकारी ने गाजियाबाद में बीते साल रेल से कट कर जान दे दी थी. ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. आखिर क्यों आत्महत्या कर रहे हैं युवा अधिकारी?

ऐसी विभिन्न घटनाओं की जो वजह सामने आ रही हैं उनमें एक समान बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारी होने की वजह से खासकर बिहार व यूपी में शादी के बाजार में करोड़ों का भाव मिलने की वजह से लड़के के माता-पिता दहेज के लालच में अकसर बेमेल विवाह कर रहे हैं.

ऐसे में लड़का तो सामान्य परिवार का होता है लेकिन करोड़ों का दहेज लाने वाली लड़की हाई-फाई व पैसे वाले घर की. नतीजतन कुछ दिनों बाद ही खटपट शुरू हो जाती है जो आगे चल कर किसी एक की मौत के साथ खत्म होती है. इन घटनाओं की वजह से अब पुरुषों के लिए भी राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर एक आयोग बनाने की मांग उठने लगी है. दहेज प्रथा ही इन घटनाओं के मूल में है.

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दहेज प्रथा है जिम्मेदार 

तमाम कानूनों के बावजूद खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में अब भी शादी के बाजार में प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों की भारी मांग है. पैसे वाले लोग अपनी बेटियों के लिए आईएएस या आईपीएस वर पाने के लिए करोड़ों की रकम देने के लिए तैयार रहते हैं. इसके पीछे मंशा यह होती है कि उनकी बेटी आजीवन राज करेगी. लेकिन समाज में लगातार घटती सहिष्णुता की वजह से अब ऐसे कई मामलों में नतीजे घातक साबित हो रहे हैं.

हाल के दिनों में ऐसी कम से कम छह घटनाएं सामने आ चुकी हैं. इनमें सबसे ताजा मामला बलिया के रहने वाले आईपीएस अधिकारी सुरेंद्र कुमार दास का है. उन्होंने बीते सप्ताह सल्फास की गोलियां खाकर अपनी जान दे दी. अब यह बात साफ हो चुकी है कि बेमेल विवाह की पेचीदगियों ने ही इस युवा अधिकारी को अत्महत्या की मानसिकता में पहुंचा दिया था.

पत्नी के रवैये से परेशान उक्त अधिकारी पहले भी एक बार आत्महत्या की कोशिश कर चुके थे. कहा जा रहा है कि सुरेंद्र दास मानसिक अवसाद से पीड़ित थे. लेकिन आखिर उनको इस हालत में किसने पहुंचाया, इस सवाल का जवाब तो पूरे मामले की जांच के बाद ही होगा.

इन देशों में मुश्किल है तलाक

इससे पहले बीते साल बिहार के बक्सर में जिलाशासक रहे मुकेश कुमार पांडेय ने गाजियाबाद जाकर रेल की पटरी पर जान दे दी थी. आत्महत्या करने से पहले बनाए गए एक वीडियो में उन्होंने कहा था कि पत्नी से उनकी जरा भी पटरी नहीं बैठ रही है. मुकेश ने कहा था कि उसके माता-पिता और पत्नी के बीच हमेशा झगड़ा होता रहता था और वह और उनकी पत्नी स्वभाव में एक-दूसरे से अधिक विपरीत थे. इस वजह से उनकी जिंदगी नरक हो गई थी और इसी वजह से उन्होंने अपना जीवन खत्म करने का फैसला किया.

2012 बैच के उक्त अधिकारी की शादी नवंबर 2013 में पटना के एक बड़े व्यापारी की पुत्री आयुषी से हुई थी. पांडेय के माता-पिता असम की राजधानी गुवाहाटी में मध्यवर्ग से ताल्लुक रखते थे. बाद में साफ हुआ था कि पांडेय को उनके ससुराल के लोग हमेशा अपमानित करते रहते थे.

समाज की बढ़ती चिंता

लगार बढ़ती ऐसी घटनाओं ने अब समाजविज्ञानियों को चिंता में डाल दिया है. उनका कहना है कि दहेज ही इन घटनाओं की जड़ है. ऐसे कई मामलों में लड़के के माता-पिता भी दोषी होते हैं. मधय्वर्ग का कोई लड़का जब हाड़-तोड़ मेहनत से सिविल सेवा की परीक्षा पास कर लेता है, तो उसके घर लड़कीवालों की लाइन लग जाती है.

लड़के के माता-पिता अकसर ऐसे मामलों में उसकी कामयाबी को भुनाते हुए पैसे के लालच में उसका रिश्ता किसी हाई-फाई पैसे वाले के घर तय कर देते हैं. दो अलग-अलग संस्कृति व पृष्ठभूमि के लड़के-लड़की में शुरुआत में कुछ दिनों तक तो सब ठीक रहता है लेकिन बाद में खटपट शुरू हो जाती है. ज्यादातर मामलों में लड़की के घरवाले भी अपनी पुत्री का ही पक्ष लेते हैं.

भारतीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर आठ मिनट पर एक विवाहित पुरुष आत्महत्या करता है. आखिर विवाहित पुरुषों में पनप रही आत्महत्या की इस प्रवृत्ति की वजह क्या है? दरअसल इस सवाल का जवाब हिंदू वैवाहिक व्यवस्था और भारतीय दंड संहिता में छुपा है.

कहां होते हैं सबसे ज्यादा तलाक

हिंदू व्यवस्था में विवाह एक संस्कार है और इसे तोड़ा नहीं जा सकता है. ऐसे में पति और पत्नी से यह अपेक्षा की जाती है कि वे जीवन भर इन संबंधों को निभाएं. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत हिंदू पति या पत्नी को अलग होने का अधिकार है. लेकिन इसके लिए क्रूरता, व्यभिचार, धर्म परिवर्तन, असाध्य रोग जैसे ठोस और मजबूत आधार का होना अनिवार्य है.

पति-पत्नी की आपसी सहमित से भी तलाक का प्रावधान है. लेकिन ऐसे लगभग सभी मामलो में दोनों पक्षों में सहमित नहीं बन पाती. ऐसे में बरसों तलाक का मुकदजमा लड़ना पड़ता है. इसके अलावा इस मामले में कानून भी महिलाओं का साथ देता है. नतीजतन ऐसे कई मामलों में पुरुष आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं.

इस समस्या का सबसे दुखद पहलू यह है कि जो मां-बाप पालते हैं, वही अपने बेटे की बोली लगाते हैं. वह उस पर धौंस जमाते हैं कि हमने पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया. दहेज के लिए होने वाले बेमेल विवाह समाज का सबसे खतरनाक पक्ष बनते जा रहे हैं.

क्या है उपाय

समाजशास्त्रियों का कहना है कि तमाम कानूनों के बावजूद दहेज प्रथा पर अब तक अंकुश नहीं लग सका है. इसकी वजह से होने वाले बेमेल विवाह ही इन समस्याओं को जन्म दे रहे हैं. उक्त दोनों मामलों में यही बात सामने आई है. समाजशास्त्री प्रोफेसर मनतोष चटर्जी कहते हैं, "इसके लिए समाज में जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है. दहेज के लालच में होने वाले बेमेल विवाहों को रोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव जरूरी है."

एक अन्य समाजविज्ञानी देवेश्वर गोहाईं कहते हैं, "इस मामले में सरकारें कुछ नहीं कर सकती हैं. इन पर अंकुश लगाने के लिए सामाजिक और गैर-सरकारी संगठनों को ही आगे आना होगा. लोगों को इन घटनाओं से सबक लेते हुए लालच त्यागना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि लड़के या लड़की की शादी अपनी बराबरी की हैसियत वालों के घर ही करें."

क्यों होता है तलाक?

पुरुषों के बढ़ते उत्पीड़न का हवाला देते हुए एक गैर-सरकारी संगठन ने तो अब राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर पुरुषों के लिए भी एक आयोग के गठन की मांग उठाई है. वर्ल्ड्स राइट्स इनीशिएटिव फॉर शेयर्ड पैरेंटिंग (क्रिस्प) के संस्थापक कुमार जागीरदार एनसीआऐरबी के आंकड़ों के हवाले से इस मांग को उचित ठहराते हैं. वह कहते हैं, "ऐसे मामलों में देश के कानून पुरुषों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त हैं. हर साल दहेज संबंधी विवादों के चलते कई पुरुष आत्महत्या कर लेते हैं. लेकिन हाई प्रोफाइल नहीं होने तक ऐसे मामले सुर्खियां नहीं बन पाते."

मनोतष चटर्जी कहते हैं, "हाल की घटनाओं से साफ है कि पानी अब सिर के ऊपर से गुजरने लगा है. अगर इस समस्या पर अंकुश लगाने की दिशा में जल्दी ही ठोस पहल नहीं की, तो इसके नतीजे घातक हो सकते हैं."

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