दरक रहा है सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन | दुनिया | DW | 03.04.2019
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दुनिया

दरक रहा है सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन

दूसरे विश्व युद्ध के बाद बना नाटो 70 साल का हो गया है. यह इतिहास के सबसे सफल सैन्य गठबंधनों में से एक है. लेकिन अगले सात दशक तक यह गठबंधन टिक पाएगा? अमेरिकी राष्ट्रपति को तो इसमें शक है.

नाटो का पूरा नाम नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन है. 4 अप्रैल 1949 को 12 यूरोपीय देशों और अमेरिका ने इसकी बुनियाद रखी. नाटो के पहले महासचिव ब्रिटेन के हेस्टिंग्स इस्मे ने एक बार कहा था कि नाटो का मकसद "सोवियत संघ को बाहर करना, अमेरिका को अंदर लाना और जर्मनों को दबा कर रखना है."

यह दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के तुरंत बाद की बात है. उस समय पूर्वी जर्मनी समेत समूचे पूर्वी यूरोप को सोवियत संघ नियंत्रित कर रहा था और अमेरिका सोच रहा था कि क्या वह यूरोप को उसके हाल पर छोड़ दे जिसका मतलब शायद यह होता कि इस पूरे महाद्वीप पर सोवियत संघ का प्रभाव और बढ़ता.

सबसे ज्यादा सैन्य खर्च वाले देश ये हैं

जर्मनी को लंबे समय तक नहीं दबाया गया, खास कर पश्चिमी जर्मनी को, जो 1955 में नाटो का हिस्सा बन गया. वहीं पूर्वी जर्मनी सोवियत संघ के प्रभाव वाले वारसॉ पैक्ट का हिस्सा बना.

शीत युद्ध और उससे जुड़ी तनातनी लगभग 40 साल तक चली. स्थिति तनावपूर्ण थी लेकिन स्थिर रही. 1988 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कहा था, "हमारी पहली प्राथमिकता उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच मजबूत और स्वस्थ साझेदारी कायम रखना है. यही वह बुनियाद है जिस पर आजादी से जुड़ा सरोकार बहुत हद तक निर्भर करता है." उन्होंने सोवियत संघ के साथ निरस्त्रीकरण पर चल रही वार्ता के दौरान कहा था, "हम सोवियत संघ के साथ होने वाले किसी भी समझौते में इस साझेदारी के हितों को कुरबान नहीं करेंगे."

1989 में और 1990 के दशक में हालात नाटकीय रूप से बदले. सोवियत संघ का विघटन हो गया और दूसरे विश्व युद्ध के मित्र देश जर्मनी के एकीकरण के लिए राजी हो गए. यूरोप में मची उथल पुथल का नतीजा यह हुआ कि एक दशक के भीतर पूर्व वारसॉ पैक्ट में शामिल रहे पोलैंड, रोमानिया और बाल्टिक देश भी नाटो में आ गए.

रूस-अमेरिका में युद्ध हो जाए तो

नाटो की स्थापना के 70 साल बाद अब फिर हालात शीत युद्ध जैसे दिख रहे हैं. रूसी अधिकारी पूर्वी यूरोप में नाटो के विस्तार को अपने लिए खतरे के तौर पर देखते हैं और इसीलिए वे अपनी सेना को मजबूत कर रहे हैं. इससे नाटो के विस्तार की रफ्तार भी धीमी हुई है. मिसाल के तौर पर यूक्रेन और जॉर्जिया नाटो में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन नाटो रूस के साथ और तनाव से बचना चाहता है, इसलिए मामला अधर में लटका है.

नाटो पहले ही कई संकटों में उलझा है. 1990 के दशक में इस सैन्य गठबंधन ने अपनी सीमाओं से परे दुनिया के कई हिस्सों में हस्तक्षेप किया है. विस्तारवादी नाजी अतीत होने की वजह से जर्मनी को शुरू में घरेलू स्तर पर इस बारे में गर्मागर्म बहस का सामना करना पड़ा था कि क्या उसे विदेशों में चलाए जा रहे सैन्य अभियानों में हिस्सा लेना चाहिए. लेकिन अब जर्मनी अफगानिस्तान और बाल्कान इलाकों समेत नाटो के कई विदेशी अभियानों का हिस्सा है.

नाटो के 70 साल के इतिहास में सिर्फ एक बार ऐसी स्थिति पैदा हुई है जब किसी एक सदस्य की रक्षा के लिए सभी सदस्यों को एक साथ आना पड़ा है. यह स्थिति थी अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुआ आतंकवादी हमला. हालांकि इस फैसले के परिणामों को लेकर तीखी बहस भी होती रही.

अमेरिका में जब से राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने सत्ता संभाली है तब से नाटो पर अमेरिकी दबाव भी बढ़ गया है. वह हमेशा इस सैन्य गठबंधन की अहमियत पर सवाल उठाते हैं. 2018 में ट्रंप ने कहा था कि क्यों अमेरिका को मोंटेनेग्रो जैसे छोटे से देश की रक्षा करनी चाहिए और 'तीसरे विश्व युद्ध का जोखिम' उठाना चाहिए. ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका सिर्फ उन देशों की रक्षा करेगा जो इसके लिए पूरा भुगतान करेंगे. 2018 में नाटो शिखर वार्ता के दौरान ट्रंप अपने नाटो विरोधी सुरों में तो नरमी लाए, फिर भी वह यह कहना नहीं भूले कि नाटो में अमेरिका का 'जरूरत से ज्यादा फायदा' उठाया जा रहा है. उन्होंने कहा, "हम नाटो के लिए बहुत ज्यादा पैसा चुका रहे हैं. नाटो बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन हमसे ज्यादा मदद वह यूरोप की करता है."

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भारत और चीन की सेना

इसी शिखर वार्ता में जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने माना था कि जर्मनी पर नाटो का बहुत बड़ा ऐतिहासिक कर्ज है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि जर्मनी ने नाटो के लिए बहुत किया है. उन्होंने कहा, "हम नाटो के लिए सैनिक भेजने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश हैं. हम अपनी ज्यादातर सैन्य क्षमताएं नाटो की सेवा में देते हैं और हम पूरी तरह से अफगानिस्तान में ऐसा ही कर रहे हैं और ऐसा करके हम अमेरिकी हितों के लिए काम कर रहे हैं."

2014 के शिखर सम्मेलन में सभी सदस्य इस बात पर सहमत हुए कि वे 2024 तक अपनी जीडीपी का दो प्रतिशत नाटो के लिए देंगे. 2018 में अमेरिका ने 3.39 प्रतिशत खर्च किया. वहीं यूरोप में ऐसे देशों की संख्या गिनी चुनी है जो दो प्रतिशत की दहलीज को छू पाए हैं. मिसाल के तौर पर जर्मनी ने सिर्फ 1.23 प्रतिशत खर्च किया. चांसलर मैर्केल ने जर्मनी के लिए 2024 तक 1.5 प्रतिशत का वादा किया है. वहीं ट्रंप हमेशा '2 प्रतिशत' की मांग करते हैं.

नाटो के महासचिव येंस स्टोल्टेनबर्ग ने 2018 में अपने एक भाषण में कहा, "किसी पत्थर पर नहीं लिखा है कि ट्रांस अटलांटिक संबंध हमेशा हमेशा के लिए रहेगा." फिर भी वह आशावादी हैं. वह कहते हैं, "पहले हमारे बीच मतभेद थे और इतिहास से हमें यह सबक मिलता है कि हम हर बार इन मतभेदों को दूर कर लेते हैं." इसी भाषण के आखिर में उन्होंने कहा कि नाटो के सदस्य इस बात पर सहमत हैं कि उत्तरी अमेरिका और यूरोप में उसके साझीदार एक साथ रहकर ज्यादा सुरक्षित हैं.

रिपोर्ट: क्रिस्टोफ हासेलबाख/एके

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