दंगे पर कानून की राजनीति | ब्लॉग | DW | 28.01.2014
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ब्लॉग

दंगे पर कानून की राजनीति

कानून की लचरता कहें या मजबूत कानून न बनाने की लाचारी, मजहबी विविधता वाले हिंदुस्तान में धार्मिक हिंसा, हमेशा से सियासी अखाड़े की मुलायम मिट्टी साबित होती रही है.

बीजेपी के रथ पर सवार मोदी के मिशन को रोकने के लिए कांग्रेस के राहुल गांधी ने गुजरात दंगों में अपनी पार्टी के कुछ लोगों की संलिप्तता को स्वीकार कर बहस को नया रंग दे दिया है. स्पष्ट है कि साफ सुथरी और मुद्दों पर आधारित राजनीति के लिए देश में बन रहे माहौल को भांपते हुए राहुल ने स्वीकार किया है कि सांप्रदायिक दंगों की राजनीति एक समस्या है और इसकी जड़ में मजबूत कानून की कमी मूल कारण है. निसंदेह वह उस सांप्रदायिक हिंसा निरोधक कानून को चुनावी बहस का हिस्सा बनाना चाहते हैं जिसे यूपीए सरकार संसद के चालू सत्र में लागू कराना चाहती है.

विधेयक को कानून की शक्ल देने में जुटी केंद्र सरकार की मंशा और प्रस्तावित विधेयक का मसौदा दोनों बहस के केंद्र में होंगे. सरकार की मंशा को कसौटी पर कसने के पीछे सबसे बड़ी दलील 1984 के सिख विरोधी दंगों की दी जा सकती है. सवाल यह है कि सांप्रदायिक हिंसा विधेयक, वही कांग्रेस सरकार क्यों बनाना चाहती है जिसके माथे पर सिख दंगों का कलंक है और इसके पीड़ित दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक न्याय की गुहार लगा रहे हैं.

सिख दंगा मामलों की अदालती लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ वकील एचएस फुल्का कहते हैं कि कांग्रेस को ऐसा कानून बनाने के लिए आखिर 30 साल इंतजार क्यों करना पड़ा. सवाल जायज भी है क्योंकि कांग्रेस कलंक धोने के लिए माफी मांगने को काफी समझती है जबकि दूसरों के लिए वह जेल का रास्ता तैयार कर रही है. उनका कहना है कि अगर कांग्रेस सांप्रदायिक दंगों का इतना ही विरोध करती है, तो अमेरिकी अदालत के सम्मन का आदर करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी वहां पेश होने से क्यों बचती हैं.

मौजूदा स्थिति

सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए फिलहाल देश में कोई अलग कानून नहीं है. हालांकि जानकारों की राय में इसके लिए कोई अलग से कानून होना भी नहीं चाहिए. संविधानविद सुदर्शन शर्मा कहते हैं कि कानून के शासन वाले राज्य में धर्म के नाम पर हिंसा फैलाने का काम बिना सियासी प्रश्रय के मुमकिन नहीं है. इसके लिए छोटी बड़ी कौम में बंटे समाज की अशिक्षा ही जिम्मेदार है और इसका फायदा उठाकर ही राजनीतिक बिरादरी अपने हित साधती है.

ऐसे नेताओं से किसी सख्त कानून बनाने की उम्मीद किए बिना न्यायपालिका आईपीसी में वर्णित दंगा फैलाने वाली चंद धाराओं से ही काम चला रही है. इन नाकाफी प्रावधानों से जुड़ी प्रक्रियागत जटिलताओं की वजह से आज भी भागलपुर से लेकर सिंख दंगा और गुजरात दंगों तक के पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया है. जबकि मुजफ्फरनगर की सुध चुनाव बाद ली जाएगी.

नया मसौदा

गुजरात में तीसरी बार सत्ता में आए बीजेपी के नरेन्द्र मोदी के दिल्ली कूच को भांपते हुए केंद्र की कांग्रेस सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का मसौदा 2011 में ही तैयार कर लिया था. उम्मीद के मुताबिक बीजेपी इसका यह कहकर विरोध कर रही है कि इसे कानूनी अमलीजामा पहनाकर कांग्रेस मोदी का मिशन दिल्ली रोकना चाहती है. हकीकत जो भी हो लेकिन प्रस्तावित मसौदे की उपायदेयता को परखना जरूरी है.

विधायी मामलों के जानकार राकेश सिन्हा ने अपने लेख में इसकी परत दर परत व्याख्या करते हुए इसके तात्कालिक नुकसान की ओर इशारा किया है. सिन्हा ने कांग्रेस की मंशा को सवालों के घेरे में खड़ा करते हुए कहा है कि विधेयक ब्रिटिश कालीन क्रिमिनल ट्राइब एक्ट 1871 पर आधारित है.

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गुजरात दंगों को लेकर मोदी की आलोचना होती है

दरअसल इस कानून को अंग्रेजों ने ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन करने वाले सामंतों से नाराज विद्रोही कबीलाई समूहों के हमलों से बचाने के लिए बनाया था. बाद में स्वतंत्रता संग्राम तेज होने और इसमें राष्ट्रवाद की भावना से छोटे समूहों के शामिल होने पर 1924 में ब्रिटिश सरकार ने हिंदू मुस्लिम और अन्य संप्रदायों की 160 पिछड़ी जातियों को जन्मजात अपराधी मानते हुए क्रिमिनल ट्राइब घोषित कर दिया. कुलीन और कबीलाई समाज को आपराधिक प्रवृत्ति के आधार पर बांटने वाले इस कानून का जम कर विरोध हुआ और आजाद भारत में इसे लागू नहीं किया गया.

निष्कर्ष

सियासत की इस नूराकुश्ती का हर किसी को अपने तरीके से फायदा मिला. मगर बहुसंख्यक हिंदू हों या अल्पसंख्यक मुस्लिम, ईसाई या सिख, हर कौम के लोग न्याय के लिए दर दर भटक रहे हैं. मौजूदा व्यवस्था में न्याय कानून से मिलता है और कानून बनाने का काम सियासतदानों का है. कुल मिलाकर कानून की गेंद फिर उसी सियासी अखाड़े में आ जाती है जिसके इस्तेमाल का मकसद दंगा पीडि़तों को न्याय दिलाना नहीं बल्कि दंगाई राजनीति की फसल को बारहमासी बनाना है.

ब्लॉगः निर्मल यादव

संपादनः अनवर जे अशरफ

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