तेंदुओं की बढ़ती तादाद के साथ संरक्षण की चिंताएं भी बढ़ी | भारत | DW | 25.12.2020
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भारत

तेंदुओं की बढ़ती तादाद के साथ संरक्षण की चिंताएं भी बढ़ी

भारत में तेंदुओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है. लेकिन इसके साथ ही इनके संरक्षण की चिंताएं भी बढ़ रही हैं. देश के कई हिस्सों में अब भी इनके शिकार के मामले सामने आ रहे हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वोत्तर की पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में अवैध शिकार, इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ता संघर्ष और खेती व चाय बागानों से संबद्ध जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल के बढ़ते मामले तेंदुओं के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.

तेंदुओं की बढ़ती तादाद

भारत में तेंदुओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है. वर्ष 2014 में जहां देश में इनकी तादाद 7,910 थी वहीं वर्ष 2018 में यह 12,852 हो गई. केंद्र की ओर से जारी ‘भारत में 2018 में तेंदुओं की स्थिति' रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है. पश्चिम बंगाल में भी इनकी तादाद बढ़ी है और उत्तर बंगाल के तीन नेशनल पार्को में 80 से ज्यादा तेंदुए हैं. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने रिपोर्ट जारी करने के बाद कहा कि तेंदुओं की संख्या का आकलन उनकी तस्वीरें लेने की प्रक्रिया के जरिए किया गया. उनके मुताबिक तेंदुओं के अलावा देश में बाघ और शेरों की संख्या भी बढ़ी है. इससे साफ है कि देश अपनी पारिस्थितिकी और जैव विविधता दोनों की अच्छे से रक्षा कर रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2018 में तेंदुओं की संख्या 12,852 थी. इनमें सबसे ज्यादा 3,421 तेंदुए मध्य प्रदेश में पाए गए. कर्नाटक में इनकी संख्या 1,783 और महाराष्ट्र में 1,690 है. मध्य भारत और पूर्वी घाटों में तेंदुओं की संख्या सर्वाधिक 8,071 है. इस क्षेत्र में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, ओडीशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश हैं. कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल को लेकर पश्चिमी घाट क्षेत्र के इलाके में 3,387 तेंदुए हैं जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार वाले शिवालिक और गंगा के मैदानी इलाकों में 1,253 तेंदुए पाए गए.

पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में सिर्फ 141 तेंदुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वोत्तर की पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में अवैध शिकार, इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ता संघर्ष और खेती व चाय बागानों से संबद्ध जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल के बढ़ते मामले तेंदुओं के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.

जावड़ेकर कहते हैं, "देश में बाघों की निगरानी से साफ है कि पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी भूमिका एक छाते की तरह है. इससे तेंदुएं जैसे करिश्माई जीवों की स्थिति भी सामने आई है.”

बढ़ता संघर्ष

इससे पहले राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया था कि जंगलों के तेजी से कटने के कारण तेंदुओं के रहने की जगह कम हो ररही है. इसी वजह से खासकर शिवालिक और तराई के इलाकों और मध्य भारत के कई हिस्सों में तेंदुए इंसानी बस्तियों में पहुंच रहे हैं और संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं.

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिपोर्ट सही तस्वीर नहीं पेश करती. इसमें इंसानों और तेंदुओं के बढ़ते संघर्ष पर अंकुश लगाने के उपायों पर कोई ठोस सिफारिश नहीं की गई है.

वन्यजीव विशेषज्ञ निर्मल घोष कहते हैं, तेंदुओं की बढ़ती तादाद से खुश होकर अपनी पीठ थपथपाने की बजाय सरकार को उनके संरक्षण की ठोस योजना पर काम करना चाहिए. देश के विभिन्न हिस्सों से उनके शिकार के मामले लगातार सामने आते रहे हैं. उनकी आवाजाही के लिए कॉरीडोर बनाया जाना चाहिए ताकि इंसानों के साथ संघर्ष पर अंकुश लगाया जा सके. इसके अलावा जंगल से सटे इलाकों में इंसानी बस्तियों की बसावट की तेज होती प्रक्रिया को भी नियंत्रित किया जाना चाहिए.

विशेषज्ञों ने ताजा रिपोर्ट के आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2014 में तेंदुओं की आबादी पर हुए अध्ययन पर भी सवाल उठाया है. वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष अनीश अंधेरिया कहते हैं, "वर्ष 2014 में तेंदुओं की संख्या के आकलन का तरीका सही नहीं था. ताजा आंकड़े हकीकत के ज्यादा करीब हैं. अवैध शिकार, रहने की जगह का लगातार सिकुड़ना और प्राकृतिक भोजन की कमी तेंदुओं के संरक्षण के मामले में सबसे प्रमुख चुनौतियां हैं.”

वन्यजीवों के हित में काम करने वाले एक गैर-सरकारी संगठन के प्रमुख सोमेन कुमार दत्त कहते हैं, "हाथियों से लेकर बाघ, गैडें और तेंदुएं तक, अवैध शिकार के तेजी से बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के तमाम प्रयास अब तक बेअसर रहे हैं. खासकर संवेदनशील इलाकों, जहां से ऐसी घटनाएं ज्यादा सामने आती हैं, के लिए ठोस योजना बना कर उनको जमीनी स्तर पर गंभीरता से लागू करना जरूरी है. सिर्फ जानवरों की तादाद बढ़ना ही काफी नहीं हैं. उनका संरक्षण ज्यादा जरूरी है.”

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