तिब्बती विद्रोह के 50 साल | ताना बाना | DW | 09.03.2009
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ताना बाना

तिब्बती विद्रोह के 50 साल

तिब्बत की राजधानी ल्हासा में चीन सरकार के खिलाफ़ विद्रोह को 50 साल हो रहे हैं. इस मौके पर कई मानवाधिकार संगठनों ने कहा है कि तिब्बत में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का हनन हो रहा है जिसे चीन को रोकना चाहिए.

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1959 में विद्रोह के बाद दलाई लामा को भारत में शरण लेनी पड़ी. उस समय हिमालय के रास्ते आते दलाई लामा.

चीन के सरकारी मीडिया का कहना है कि विद्रोही की 50वीं सालगिरह के मौके पर किसी भी तरह की अप्रिय घटना से निटपने के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं.

चीन के स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाली सीमा और उसके आसपास के इलाक़ों में सुरक्षा बेहद कड़ी कर दी गई है, जहां पुलिस के मुताबिक दलाई के समर्थक तोड़फोड़ कर सकते हैं. 10 मार्च 1959 को तिब्बत की राजधानी ल्हासा में विद्रोह हुआ, जो नाकाम रहा और इसके बाद दलाई लामा को भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी. तभी से तिब्बती 10 मार्च को अपने राष्ट्रीय दिवस के तौर पर मनाते आ रहे हैं. चीनी की सरकार दलाई लामा पर आरोप लगाती है कि वह चीन को तोड़ने का षडयंत्र रच रहे है. जबकि दलाई कहते हैं कि वह चीन से तिब्बत की आज़ादी नहीं, बल्कि उसके लिए सिर्फ़ सार्थक स्वायत्ता चाहते हैं जहां तिब्बतियों को अपने तरीक़े से जीने का हक हो. एक तिब्बती बौद्ध भिक्षु का कहना है, ' एक जमाना था कि तिब्बत स्वतंत्र था, लेकिन अब हम चीन का हिस्सा हैं. मैं स्वतंत्रता नहीं चाहता. मैं उम्र भर चीनी रहा हूं. लेकिन मैने सुना है कि हॉन्गकॉन्ग को हमसे ज्यादा आजादी है. तिब्बती भी बस इसी तरह की आजा़दी चाहते हैं. बस इतना ही है.'

लेकिन इस बीच ऐसे तिब्बती युवाओं की तादाद भी बढ़ रही

China Tibet Demonstration in Lhasa Polizei

ये है ल्हासा. पिछले साल यहीं भड़क उठा था 1959 जैसा आंदोलन.

है, जो सिर्फ़ स्वायत्ता नहीं बल्कि पूर्ण आजादी चाहते हैं. और इसके लिए वह हिंसक रास्ता अपनाने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं. हालांकि दलाई लामा किसी भी तरह की हिंसा का विरोध करते रहे हैं.

साल भर पहले ल्हासा में बौद्ध भिक्षुओं के नेतृत्व में चीन विरोधी प्रदर्शन हुए, जिन्हें पेइचिंग की सरकार ने ताक़त के ज़ोर पर दबाने की कोशिश की. अलग अलग देशों में स्थित और तिब्बत में स्वशासन की मांग करने वाले में कई समूहों का कहना है कि इस कार्रवाई में 200 लोग मारे गए थे हालांकि चीन मरने वालों की संख्या को बहुत कम बताता है. साथ ही चीन का यह भी दावा है कि तिब्बत में ख़ूब विकास हुआ है और लोगों को पूरी धार्मिक आजादी है. चीन सरकार के एक अधिकारी का कहना है. ' दलाई लामा की तस्वीरें दिखाया जाना या न दिखाया जाना कोई मुद्दा नहीं है. जब से दलाई लामा भागकर भारत गए हैं, आजादी की मांग करते रहे हैं, जिसे कोई संप्रभु देश बर्दास्त नहीं कर सकता. हमने तिब्बती इलाकों में पूरी धार्मिक आज़ादी दी है. इसीलिए लोग हमारी पार्टी के समर्थक हैं.'

वैसे तो आज तिब्बती पूरी दुनिया में फैले हैं, लेकिन इनमें सबसे ज़्यादा यानी एक से डेढ़ लाख तिब्बती लोग भारत में रहते हैं. हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला से उनकी निर्वासित सरकार भी चलती है.

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