ताकि सब बच्चे हों समान... | दुनिया | DW | 19.06.2015
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दुनिया

ताकि सब बच्चे हों समान...

प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाली किसी अन्य टीचर के मुकाबले मारलू का काम कहीं ज्यादा चुनौती भरा है. वह कठिन पृष्ठभूमि वाले आप्रवासी परिवारों के बच्चों को जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार कर रही हैं.

मारलू के अनुभव किसी आम टीचर से अलग हैं. उनके मुताबिक किसी अन्य टीचर को याद रह जाता है कि उनके क्लास का कौन सा बच्चा किस काम में तेज था, उसने क्या हासिल किया. जबकि मारलू के लिए ऐसे कई अनुभव हैं जब कोई पीड़ित बच्चा अचानक किसी बात पर फूट फूट कर रो पड़ा हो.

मारलू इन बच्चों को भी जर्मनी के अन्य बच्चों जितना सशक्त बनाना चाहती हैं. वह चाहती हैं कि ये यूनिवर्सिटी तक जाएं और जिंदगी में कुछ हासिल करें. लेकिन यह आसान नहीं. नई सोच, सही मार्गदर्शन और पढ़ाई के साथ साथ कुछ और भी जरूरी बातें जीवन के बारे में सिखाए जाने से इन बच्चों को उज्जवल भविष्य दिया जा सकता है. लेकिन मारलू बताती हैं कि कई बच्चे तो इससे निकलना ही नहीं चाहते. वह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि वे उन्हें इस सोच से बाहर निकालने में सफल हों.

इन बच्चों में सामाजिक व्यवहार की कुशलता नहीं होती, वे दिन भर में सैकड़ों सवाल भी पूछते हैं जिसका मारलू को धैर्य से जवाब देना होता है. मारलू बताती हैं कि बच्चों को साथ बिताया गया उनका हर घंटा आठ घंटे काम करने जितना थकाने वाला होता है. लेकिन उनको इस काम में खुशी मिलती है और वह इसे आगे और बड़े पैमाने पर करना चाहती हैं.

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