डर के साये में बस्तर के पत्रकार | दुनिया | DW | 03.05.2016
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दुनिया

डर के साये में बस्तर के पत्रकार

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पत्रकार भय के माहौल में काम कर रहे हैं. पत्रकारों को यहां कोई “नक्सली एजेंट” समझता है तो कोई “सरकारी एजेंट”. पत्रकारों पर बढ़ते हमलों को लेकर मीडिया में चिंता है.

नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में पत्रकारों को दोहरा दबाव झेलना पड़ता है, क्योंकि इस क्षेत्र में पत्रकारों को सरकार और नक्सली, दोनों तरफ से निशाना बनाया जाता है. पिछले कुछ महीनों से सरकार पर पत्रकारों को प्रताड़ित करने के आरोप लग रहे हैं. यहां पर मीडिया के सामने आए संकट को लेकर एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट में भी चिंता व्यक्त की गयी है.

इस समय छत्तीसगढ़ में चार पत्रकार जेल में बंद हैं. इन पर पुलिस ने नक्सलियों के साथ संबंध रखने का आरोप लगाया है. जबकि इलाके में इन चारों पत्रकारों की छवि ऐसी नहीं है. पिछले दिनों अलग अलग समय पर गिरफ्तार किए गए पत्रकार प्रभात सिंह, दीपक जायसवाल, संतोष यादव और सोमारू नाग पर पुलिस ने भले नक्सलियों के साथ सांठगांठ का आरोप लगाया है, लेकिन स्थानीय पत्रकार संगठन इन्हें निष्पक्ष पत्रकार मानते हैं. रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर का कहना है कि पत्रकार-नक्सली सांठगाठ का आरोप बेतुका है. पत्रकार खबरों के लिए नक्सलियों या कई लोगों के साथ बात करता है इसका यह मतलब नहीं कि वह नक्सलियों का एजेंट है.

नक्सलियों से भी खतरा

बस्तर में नक्सलियों से सिर्फ पुलिस को ही नहीं बल्कि पत्रकारों को भी नक्सलियों से खतरा रहता है. बीजापुर जिले के पत्रकार सांई रेड्डी को नक्सली सहयोगी बताते हुए पहले पुलिस ने गिरफ्तार किया और उसे करीब दो साल जेल में रहना पड़ा. बाद में सांई को नक्सलियों ने ही पुलिस का मुखबिर समझ कर मार डाला था. अनिल पुसदकर का कहना है, “निष्पक्ष पत्रकारों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है. पत्रकारों को पुलिस का एजेंट समझ नक्सली खार खाए बैठे रहते हैं जबकि पुलिस को लगता है कि पत्रकार नक्सली से सहानुभूति रखते हैं.”

जगदलपुर से निकलने वाली समाचार पत्रिका बहुजन दर्पण के पत्रकार पी के राव का कहना है कि बस्तर क्षेत्र के पत्रकारों, कैमरामैनों का काम जोखिम भरा है. चुनौतियों के बीच इस क्षेत्र में लगभग ढाई सौ मीडियाकर्मी काम कर रहे हैं. ये मीडियाकर्मी कभी कभी पुलिस व नक्सली मुठभेड़ की दोतरफा फायरिंग में फंस जाते हैं. स्थानीय पत्रकार नंद किशोर यादव का कहना है कि विषम परिस्थितियों में पत्रकारिता का दायित्व निभा रहे ज्यादातर पत्रकारों को तनाव झेलना पड़ता है. नक्सली अक्सर पत्रकारों के काम को बाधित करने की कोशिश करते हैं. कुछ क्षेत्रों में जाने के लिए पत्रकारों को नक्सलियों की अनुमति लेनी पड़ती है. मनाही के बावजूद खबर की तलाश करने वाले पत्रकारों को पुलिस का मुखबिर समझ नकसली यातनाएं देते हैं.

एडिटर्स गिल्ड की चिंता

बस्तर में पत्रकारों की गिरफ्तारी और कुछ अन्य पत्रकारों को मिली धमकियों के बाद एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने क्षेत्र का दौरा कर स्थिति जानने की कोशिश की. एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट में क्षेत्र में सक्रिय पत्रकारों के हवाले से कहा गया है कि रिपोर्ट में क्या कहें या क्या ना कहें इसका दबाव रहता है. नक्सली कहते है कि जो सच है उसे ज्यों का त्यों लिखो जबकि दूसरी ओर पुलिस कहती है जो वह कह रही है, वैसा लिखो.

एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट के अनुसार बस्तर में काम करने वाले पत्रकारों में एक तरह का भय समाया हुआ है. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि राज्य प्रशासन ‘स्क्रॉल डॉट इन' की पत्रकार मालिनी सुब्रहमण्यम की रिपोर्ट से खुश नहीं था. स्क्रॉल डॉट इन पर उनकी रिपोर्ट आने के बाद एक तथाकथित फोरम 'सामाजिक एकता मंच' के लोगों ने पत्रकार मालिनी के घर पर हमला कर दिया. दबाव के चलते ही मालिनी घर, शहर और राज्य को छोड़ने पर विवश हो गयीं.

सरकार का पक्ष

पत्रकारों की गिरफ्तारी के संबंध में सरकार का कहना है कि गिरफ्तार लोगों का पत्रकारिता से ज्यादा लेना देना नहीं है. अपने बचाव में सरकार का कहना है कि इन लोगों को पत्रकारिता के चलते नहीं बल्कि कानून का उल्लंघन करने के लिए गिरफ्तार किया गया है. नक्सलियों से संबंध होने के आरोप में गिरफ्तार संतोष यादव को सरकार पत्रकार ही नहीं मानती. राज्य सरकार का कहना है कि संतोष यादव के खिलाफ उनके पास पर्याप्त सुबूत हैं जो साफ इशारा करते हैं कि उसके नक्सलियों से संबंध है. मामला कोर्ट में विचाराधीन है. सरकार अपने दावे और आरोप की पुष्टि के लिए कोर्ट में सुबूत देने की बात कह रही है. दीपक जायसवाल को भी सरकार पत्रकार नहीं मानती. दंतेवाड़ा पुलिस के अनुसार दीपक जायसवाल मूलतः एक छोटा-मोटा होटल चलाने का काम करता रहा है. वहीँ दंतेवाड़ा के पत्रकार प्रभात सिंह को पुलिस ने आईटी एक्ट के एक मामले में जेल भेजा है.

बस्तर के पत्रकारों पर आए इस सरकारी संकट के खिलाफ छत्तीसगढ़ के पत्रकारों ने नौ-दस मई को नई दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने की योजना बनायी है. स्थानीय पत्रकारों का आरोप है कि कुछ पत्रकार जो सरकार के दबाव में नहीं आ रहे हैं उन पर क्षेत्र छोड़ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. यहां तक कि उनके घरों पर हमले किए जा रहे हैं. पत्रकारों की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे स्थानीय पत्रकार अब अपने साथियों की रिहाई और भय मुक्त माहौल के लिए कलम के साथ सड़कों पर आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं.

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