ट्रांस समुदाय ने संशोधित बिल को बताया पहचान पर खतरा
१८ मार्च २०२६
भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ता सरकार द्वारा प्रस्तावित ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल, 2026 का विरोध कर रहे हैं. यह 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति' की कानूनी परिभाषा को संकुचित कर सकता है, जिससे संभावित रूप से कई लिंग-विविध पहचानों को कानूनी मान्यता नहीं मिल सकेगी.
इस प्रस्ताव को लेकर ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है. उनका कहना है कि यह बिल ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को सीमित करने, लैंगिक पहचान की प्रक्रिया में बदलाव और उन्हें अपराधी घोषित करने के लिए कड़े प्रावधान लागू करता है.
असल में 13 मार्च को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने लोक सभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन का प्रस्ताव रखा. इसमें सरकार ने 'ट्रांसजेंडर' की नई परिभाषा तय की है. मान्यता अब केवल सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों, मसलन किन्नर, हिजड़ा, अरावानी, जोगता और इंटरसेक्स विविधताओं तक ही सीमित रहेगी.
ट्रांस माहिला और वकील राघवी शुक्ला ने बताया कि, मंगलमुखी, नुपी मानबी, नुपा मानबा, थिरुनंगई, धुरानी, ख्वाजा सिरा और कोठी जैसी अन्य पहचानों का बिल में जिक्र ही नहीं है. वहीं वे ट्रांस महिलाएं जो किसी घराने या गुरु से संबंधित नहीं, ट्रांस पुरुष और जेंडरक्वियर व्यक्तियों को इस परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है.
लिंग बदलना संवैधानिक अधिकार: इलाहाबाद हाई कोर्ट
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद की सदस्य कल्कि सुब्रमण्यम ने एक बयान जारी कर कहा कि यह बिल ट्रांस समुदाय के अधिकारों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाता है. ट्रांस और इंटरसेक्स व्यक्तियों से जुड़े मुद्दों पर सरकार को सलाह देने के लिए बनाई गई इस परिषद को इन संशोधनों के बारे में जानकारी नहीं थी और उनसे परामर्श भी नहीं किया गया.
‘स्वयं की पहचान तय करने के अधिकार को खत्म करने की कोशिश'
क्वीर एक्टिविस्ट और एक्सेसरी डिजाइनर आकाश के अग्रवाल, डीडब्ल्यू से कहते हैं, "यह सोच हमें एक तय ढांचे में बांध देती है कि अगर आप ट्रांसजेंडर हैं, तो साड़ी पहनिए, बिंदी लगाइए, घराना चुनिए, ताली बजाइए और सड़क पर बैठिए. हम ऐसा नहीं चाहते. मैं उस व्यवस्था के बजाय शिक्षा और नौकरी को चुनता हूं. लेकिन सरकार के मुताबिक कोई ट्रांसजेंडर व्यक्ति इन पहचानों से खुद को नहीं जोड़ता, तो कानूनी दर्जा नहीं मिलेगा."
"प्राइड" स्टेशन में काम कर गर्व करते ट्रांसजेंडर
सरकार ने टीजी अधिनियम की धारा 2 (के) में बदलाव सुझाया है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति को परिभाषित करती है. राघवी बताती हैं कि किसी भी विधेयक को समझने के लिए उसकी मंशा जानना जरूरी है. संशोधित बिल में आठ बदलाव, चार नए और तीन हटाए गए प्रावधान शामिल हैं. अपनी जेंडर पहचान खुद तय करने के अधिकार को कमजोर किया गया है और इसे सरकार द्वारा नियुक्त मेडिकल बोर्ड को सौंपने की बात कही गई है.
राघवी कहती हैं, 'यह कदम सुप्रीम कोर्ट के 2014 के (नालसा बनाम भारत संघ) फैसले के खिलाफ जाता है, जिसमें जेंडर पहचान को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत संरक्षण दिया गया था. किसी को भी मेडिकल टेस्ट या सरकारी मंजूरी के बिना अपनी पहचान चुनने की आजादी है.'
अपना अस्तित्व साबित करने के पांच चरण
जहां टीजी अधिनियम में ट्रांस व्यक्ति को पहचान पत्र बनवाने के लिए सिर्फ सेल्फ-एफिडेविट और आधार कार्ड की जरुरत पड़ती है. अब 2026 के बिल में कई अतिरिक्त परतें और जटिलताएं जोड़ी गई हैं.
ट्रांस व्यक्ति को पहले मेडिकल प्रक्रिया से गुजरना होगा. इसके बाद उसे सरकारी मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना पड़ेगा. उस बोर्ड की सिफारिश जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) के पास जाएगी. अगर डीएम संतुष्ट नहीं होता, तो वह मामले को अन्य मेडिकल विशेषज्ञों के पास भी भेज सकता है. इन सभी चरणों के बाद ही डीएम पहचान प्रमाण पत्र दे सकेगा.
राघवी बताती हैं कि नया प्रावधान पुट्टस्वामी फैसले (2017) में दिए गए निजता के अधिकार के खिलाफ जाता है. उनके अनुसार, "सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति की पहचान, शरीर और मेडिकल जानकारी पूरी तरह निजी होती है. लेकिन अब यह मेडिकल बोर्ड, विशेषज्ञों और जिला प्रशासन के बीच साझा की जाएगी. वे हमारे लिए, हमारी पहचान का निर्णय लेंगे. यह गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन है."
ट्रांसजेंडर व्यक्ति की मदद करना हो सकता है अपराध
यह बिल मुख्य अधिनियम की धारा 18 में संशोधन करते हुए एक नया प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव रखता है. जिसके तहत किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर बनने के लिए 'बहकाना' या 'मजबूर' करना दंडनीय अपराध माना जाएगा. किसी को ट्रांसजेंडर की तरह रहने के लिए मजबूर करना और उससे भीख मंगवाने पर पांच से दस साल की सजा हो सकती है. जबकि नाबालिग के मामले में यह सजा 10 से 14 साल लंबी होगी.
रिसर्चर और ट्रांस माहिला कृशाणु का मानना है कि सरकार ने समाज में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ फैली भ्रांतियों और गलत अवधारणाओं को मिटाने के बजाए उसी को ध्यान रखते हुए बिल बनाया है.
वह डीडब्ल्यू से कहती हैं, "अधिकतर क्वीर-ट्रांस व्यक्तियों को परिवार से समर्थन और सहयोग नहीं मिलता. उन्हें घर से निकाल दिया जाता है. ऐसे में हम अपनी चुनी हुई फैमिली बनाते हैं और साथ मिलकर रहते हैं. लेकिन बिल के तहत एनजीओ, डॉक्टर, दोस्त या समुदाय के लोग, जो ट्रांस व्यक्तियों को सहारा देते हैं, वे सभी शक के दायरे में आ सकते हैं."
ट्रांस पुरुषों, जेंडरक्वियर और नॉन-बाइनरी को परिभाषा में जगह नहीं
दलित ट्रांस पुरुष और शिक्षक कबीर मान ने अपना टीजी पहचान पत्र दिखाते हुए सरकार के इस कदम पर निराशा व्यक्त की. उनका कहना है कि यदि नई परिभाषा लागू हो गई, तो उनका अस्तित्व, कानूनी तौर पर मान्यता खो देगा. अपनी जेंडर पहचान को समझने में समय लगता है और इस दौरान ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अक्सर हिंसा और शोषण का सामना करना पड़ता है.
कबीर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, "कॉलेज में मुझे मेरी पहचान के चलते परेशान किया जाता था. मुझ पर सेक्स ट्रैफिकिंग और सेक्स वर्क से जुड़े आरोप लगाए गए. जिसके कारण मुझे कॉलेज फाइनल ईयर (2015) में छोड़ना पड़ा."
कबीर आगे कहते हैं कि इस बिल के मुताबिक जो जेंडर पहचानें परिभाषित नहीं हैं, उनके लिए पहचान-आधारित हिंसा या शोषण की शिकायत पुलिस में दर्ज कराना भी संभव नहीं होगा.
बिना बदलाव बिल वापस ले सरकार
समुदाय से जुड़े कुछ लोग मानते हैं कि यह बिल उन्हें बांटने के इरादे से लाया गया है. बिल में जिन सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों को मान्यता दी गई है, उन्हें ऐसे समूहों के रूप में देखा जा रहा है जो वोट और आर्थिक रूप से प्रभाव डालते हैं. ड्रैग आर्टिस्ट अवतारी देवी का कहना है कि यह बिल समुदाय के उन लोगों को अपराधी की तरह पेश करता है जो शिक्षा, आरक्षण, रोजगार और गरिमा की मांग कर रहे हैं. डर है कि इस तरह के प्रावधान समुदाय को और ज्यादा हाशिए पर धकेल देंगे.
राघवी कहती हैं, "हमने बहुत संघर्ष के बाद अपने लिए अधिकार हासिल किए हैं. यह बिल उस पर खतरा है. यह कोलोनियल युग की अमानवीय धारणाओं को फिर से लागू करता है. हम चाहते हैं कि सरकार इस विधेयक को यथावत वापस ले. हम सरकार में संबंधित हितधारकों से बातचीत भी कर रहे हैं."