ट्रंप के ट्वीट पर नहीं काम पर बहस का समय | ब्लॉग | DW | 19.01.2018
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ब्लॉग

ट्रंप के ट्वीट पर नहीं काम पर बहस का समय

डॉनल्ड ट्रंप एक साल से अमेरिका के राष्ट्रपति हैं. डॉयचे वेले की मुख्य संपादक इनेस पोल का कहना है कि आलोचक उनके प्रति नफरत पर एकजुट होकर अपनी जिंदगी आसान कर रहे हैं.

नफरत बटोरने वाले किरदारों को सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि लोग उनके पीछे जमा हो सकते हैं. जानी मानी बात है कि नफरत अंधा करती है, इसलिए नफरत करने वालों का अंतर, विरोध और विरोधाभास खत्म हो जाता है. नफरत करना एक दूसरे को जोड़ता है. और वह एक बेहतर जिंदगी की कल्पना होने का अहसास देता है जबकि उसमें सचमुच विचारों और कल्पनाओं का अभाव होता है.

यदि इस समय अमेरिका को देखा जाए तो अब बेहतर जिंदगी का सपना इस विशाल देश को पहले की तरह नहीं जोड़ता. इस समय विरोधी राजनीतिक गुट के खिलाफ नफरत की भावना का जोर है. दो दलीय व्यवस्था में यह अपेक्षाकृत आसान होता है. मैथ्यू गोस्पेल में कहा गया है, "जो मेरे साथ नहीं है वह मेरे खिलाफ है."

चुनाव अभियान

मैं 2016 में डॉनल्ड ट्रंप के चुनाव अभियान के दौरान अमेरिका में डॉयचे वेले की संवाददाता थी. मैं पूरे देश में हजारों किलोमीटर की यात्रा की. मैं बड़े शहरों में गई लेकिन छोटे शहरों और स्पोर्ट स्टेडियमों में भी. मैंने व्हाइट हाउस तक ट्रंप के रास्ते को शुरू से देखा है. मैंने देखा कि किस तरह उन्होंने लोगों को जोश से भर दिया, चाहे वे पढ़ने वाले छात्र हों या कामगार, पेंशनर, मांएं, घरेलू महिलाएं हों या कारोबारी.

और डेमोक्रैटों को यह समझने में कितना समय लगा कि यह इंसान पहले उम्मीदवार और फिर राष्ट्रपति बनने में कामयाब हो सकता है. यह सत्ता की मदहोशी थी जो मामने को तैयार नहीं थी कि एक अभिनेता, हिलेरी क्लिंटन की सत्ता संरचना के खिलाफ जीत सकता है. वह महिला जिसने ट्रंप का साथ देने वालों को अफसोस करने लायक इंसान तक कह दिया था.

Ines Pohl Kommentarbild App (DW/P. Böll)

मुख्य संपादक इनेस पोल

अलोकतांत्रिक प्रतिक्रिया

और एक साल पहले ट्रंप ने वाशिंगटन में अपने पद की शपथ ली. तब से अमेरिका में राष्ट्रपति की राजनीति पर विवेकपूर्ण बहस संभव नहीं लगती. सिर्फ एक ही प्रतिक्रिया होती है, कितना भद्दा, कितना खराब, कितना खतरनाक. ये अलोकतांत्रिक है. क्योंकि ट्रंप का चुनाव अमेरिकी चुनाव नियमों के तहत हुआ है. और सबसे बुरी बात ये है कि बहुत से उदारवादी मीडिया घराने भी अपनी विश्वसनीयता को दांव पर लगा रहे हैं.

स्वाभाविक रूप से इस बात की ओर ध्यान दिलाना उनकी जिम्मेदारी है कि राष्ट्रपति के बहुत से ट्वीट किताने खतरनाक हैं. या फिर रिसर्च और तथ्यों के सहारे ये साबित करना कि उनका टैक्स सुधार लंबे तौर पर किसको लाभ पहुंचायेगा. लेकिन हर आलोचक के लिए यह स्वाभाविक होना चाहिए कि वह राजनीतिक विरोधियों के भी सही कदमों और अच्छाइयों का पता करें और उसकी सराहना करें.

जर्मनी से सही मांग

मसलन इस मांग में क्या गलत है कि यूरोप को आखिरकार एक साझा और मजबूत विदेश और रक्षानीति तय करनी चाहिए? अमेरिकी राष्ट्रपति को जर्मनी से ये मांग क्यों नहीं करनी चाहिए कि वह नाटो में पहले से ज्यादा धन दे? और जर्मनी को भी अमेरिका फर्स्ट की आलोचना करने से पहले अपनी यूरोप नीति पर ध्यान देना चाहिए. जर्मन वित्त मंत्री ने भी पिछले सालों में अपनी बचत नीति के साथ मुख्य रूप से अपने देश पर ध्यान दिया है. इसी तरह संयुक्त राष्ट्र का बुरा वित्तीय प्रबंधन में गंभीर मुद्दा है.

Infografik Trump vs. Obama Ein Amt - zwei Welten

मुझे भी ट्रंप के उत्तर कोरिया के खिलाफ आक्रामक ट्वीट चौंकाते हैं. उनसे मुझे डर लगता है. लेकिन मैं उत्तर कोरिया के परमाणु सशस्त्रीकरण के सही आयाम को समझने में बराक ओबामा की सरकार की विफलता को भी देखती हूं. और मुझे इस पर भी चिंता होती है कि किस तरह चीन और रूस अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय भूमिका से पीछे हटने के कारण पैदा हुए शून्य में आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन यहां भी सच ये है कि बराक ओबामा ने पीछे से नेतृत्व करने का नया सिद्धांत दिया था. और सीरिया तथा मध्यपूर्व में उनकी नाकामी के लिए ट्रंप प्रशासन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

शासन अभी पूरा नहीं हुआ

चुनाव प्रचार के दौरान मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात मिशेल ओबामा ने कही थी, "व्हेन दे गो लो, वी गो हाई." ट्रंप विरोधियों को इसे दिल से लगाना चाहिए. डॉनल्ड ट्रंप एक साल से पद पर हैं और महाभियोग की तमाम अटकलों के बावजूद उन्हें अभी और शासन करना है. अमेरिकी कहते हैं, गेट ओवर इट. अब जो है सो है. इसलिए ये सही समय है ट्रंप के बारे में बहस को वस्तुपरक बनाने का.

यानि उनके बाल और चेहरे के रंग के बारे में बात करने के बदले उनकी राजनीति के बारे में बात करने का. हर ट्वीट पर खफा होने के बदले इस पर विचार करने का कि क्या गलत है और क्या सही. और इस पर भी ध्यान देने का कि आज की दुनिया में शासन करना कितना मुश्किल है.

नफरत करना आसान है. सही विकल्प तैयार करना और उसे लोगों के सामने पेश करना बहुत ही मुश्किल है.

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