टाइम बम बन रहा है चीन का कर्ज संकट | दुनिया | DW | 16.03.2018
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दुनिया

टाइम बम बन रहा है चीन का कर्ज संकट

चीन में कर्ज की समस्या विकराल हो चुकी है. कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर कर्ज से निपटा नहीं गया तो देश बड़े वित्तीय संकट से घिर जाएगा.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर जल्द ही जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो बीजिंग वित्तीय संकट में फंस जाएगा. चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है. उसके वित्तीय संकट का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

आईएमएफ का अनुमान है कि चीन का कुल कर्ज उसकी जीडीपी का 234 फीसदी हो चुका है. अगर हालात ऐसे ही रहे तो 2022 तक यह कर्ज बढ़कर जीडीपी का 300 फीसदी हो जाएगा. सबसे बुरी स्थिति चीन में कॉरपोरेट और हाउसहोल्ड कर्ज की है. कॉरपोरेट कर्ज जीडीपी का 165 फीसदी है. हाउसहोल्ड कर्ज भी तेजी से बढ़ रहा है.

बैंकों की तरह काम कर रहे वित्तीय संगठनों के बढ़ती भूमिका ने मामले को और गंभीर बना दिया है. बैंकिंग रेगुलेटर के दायरे से बाहर रहकर काम करने वाले ये संगठन हाल के बरसों में चीन में तेजी से फैले हैं. इनके चलते चीन बैंकिंग संकट को न्योता देता दिख रहा है. हालांकि बीजिंग बार बार कह रहा है कि सब कुछ नियंत्रण में है.

वित्तीय संकट को नियंत्रित करने के लिए चीन के नीति निर्माताओं ने निगरानी और रेगुलेशन बढ़ा दिए हैं. हाल ही में चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना को वित्तीय सेक्टर के लिए नए नियम बनाने का अधिकार दिया गया है. चाइना बैंकिंग रेगुलेटरी कमीशन और चाइना इंश्योरेंस रेगुलेटरी कमीशन को भी आपस में मिलाया जा रहा है. उम्मीद है कि इस विलय से 43,000 अरब डॉलर वाले बैंकिंग और बीमा उद्योग का जोखिम कम किया जा सकेगा. विशेषज्ञों के मुताबिक यह कदम कितने कारगर साबित होंगे, इसका अंदाजा लगाना अभी जल्दबाजी होगी.

चीन के प्रधानमंत्री ली कचियांग ने मार्च की शुरुआत में एलान करते हुए कहा कि 2018 में विकास दर 6.5 फीसदी रहेगी. 2017 में भी चीन की विकास दर इतनी ही थी. सरकार के पैसे से बनने वाले आधारभूत ढांचे का इस विकास में बड़ा योगदान है. लेकिन इसी खर्च के चलते बैंकिंग सेक्टर रिकॉर्ड कर्ज के तले दब चुका है. अमेरिका की जॉन होपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हो-फुंग हुंग कहते हैं, "चीन बीते दो दशकों से विकास के लिए निर्यात और कर्ज से अचल संपत्ति में किए गए निवेश पर निर्भर रहा है. केंद्रीय सरकार और बैंकिंग सिस्टम कर्ज को सोखने के लिए लगातार नया लोन देते रहे हैं, इसके चलते कर्ज विकराल हो चुका है."

माक्सिमिलियान कैर्नफेल्ट बर्लिन में मेरकाटोर इंस्टीट्यूट ऑफ चाइना स्ट्डीज में समीक्षक है. कैर्नफेल्ट के मुताबिक 2016 में चीन की जीडीपी में 45 फीसदी योगदान आधारभूत संरचना में किए गए निवेश का था. विशेषज्ञों के मुताबिक अगर चीन को कर्ज संकट से बाहर निकला है तो इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट में कमी लानी ही होगी. लेकिन इस बात की बहुत कम संभावना है कि चीन की सरकार ऐसा करेगी. बीजिंग को लगता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में अथाह निवेश करके ही उसका निर्यात जारी रह सकता है.

वन बेल्ट, वन रोड प्रोजेक्ट का असर

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट का वित्तीय बोझ भी अब साफ नजर आने लगा है. एशिया, अफ्रीका और यूरोप में हाईवे, रेल नेटवर्क, बंदरगाह और पाइपलाइन बनाने का यह प्रोजेक्ट खरबों डॉलर फूंकेगा. खुद शी ने 2017 में कहा कि चीन के बैंक वन बेल्ट, वन रोड प्रोजेक्ट के लिए 55.09 अरब डॉलर का कर्ज देंगे. करीब 15 अरब डॉलर का अतिरिक्त कर्ज सिल्क रोड फंड के लिए दिया जाएगा. कुछ विशेषज्ञों को लगता है कि इस कर्ज से अंत में चीन की कंपनियों को ही फायदा होगा.

लेकिन अगर कर्ज डूबा, तो विकराल समस्या और भी ज्यादा नाजुक हो जाएगी. ओरिएंट कैपिटल रिसर्च के मैनेजिंग डायरेक्टर एंड्र्यू कॉलिएर के मुताबिक, "बैंक इन योजनाओं की सफलता के प्रति आशंकित हैं और उन्हें लगता कि वे न लौटने वाले कर्ज में फंस जाएंगे. अंत में, हम देखेंगे कि छोटी छोटी संस्थाएं लड़खड़ाएंगी और बकायेदारों की संख्या बढ़ती जाएगी, वेल्थ मैनेजमेंट प्रोडक्ट्स के तहत आने वाला कर्ज डूबेगा और बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म होने लगेंगी."

कॉलिएर शी जिनपिंग के लंबे समय तक राष्ट्रपति बने रहने के फैसले को इस संकट से जोड़ते हैं, "मुझे लगता है कि चीन के पास व्यापक अशांति को टालने के लिए पर्याप्त राजनैतिक नियंत्रण और सूचनाओं के स्रोत  हैं. कोई भी क्षेत्र या बड़ा संस्थान संकट में आता है तो सरकार उसमें फिर से पूंजी झोंकती है और बेरोजगार होने वाले लोगों को उचित मुआवजा दिया जाता है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी ताकत बढ़ाते समय इस बात को समझाया था कि ऐसी स्थिति से निपटने में किसी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए."

विलियम यांग/ओएसजे

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