जैपलिश: ओलंपिक से पहले अंग्रेजी में उलझे जापानी | दुनिया | DW | 19.04.2019
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दुनिया

जैपलिश: ओलंपिक से पहले अंग्रेजी में उलझे जापानी

जापान की राजधानी टोक्यो में अगले साल ओलंपिक खेल होने हैं. ऐसे में जापानी भाषा पर इंग्लिश हावी होती जा रही है जिसे लोग वहां जैपलिश का नाम दे रहे हैं. इस चक्कर बहुत उल्टा पुल्टा हो रहा है.

जापान में होने वाले ओलंपिक खेलों को देखते हुए देश के पर्यटन अधिकारियों ने कमर कस ली है. वे सभी जगहों और दिशाओं को दिखाने वाले साइनबोर्ड्स को अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में लिखने में जुटे हैं ताकि ओलंपिक के दौरान आने वाले लोगों को कोई परेशानी ना हो.

लेकिन अनुवाद में बहुत सारी गलतियां हो रही हैं. कई बार वाक्य इतने उल्टे पुल्टे होते हैं कि कुछ समझ नहीं आता. जापानी टूरिज्म एजेंसी ने देश में ट्रेन और बस सेवाएं देने वाली 85 वेबसाइटों के अनुवाद को परखा और उनमें बहुत सारी गलतियां देखने को मिली. मिसाल के तौर पर एक ट्रैवल एजेंसी ने बच्चों को 'बौने' लिखा था. इसी तरह टोक्यो में अंडरग्राउंड ट्रेन के एक स्टेशन पर लगे बड़े से बोर्ड पर लिखा था, "टोई शिनजुकु और टोई मिता लाइनें इसे नहीं ले सकतीं." वहीं होकाने में कभी जेल रही एक इमारत के बाहर लिखा है, "अपने दोषी जूतों को उतारिए और विनम्रता से जेल में आइए."

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जापान में 15 साल से रह रहे एरिक फियोर योकोहामा में फ्रेंच भाषा सिखाने वाला एक स्कूल चलाते हैं. वह एक म्यूजियम के बाहर लगे बोर्ड को पढ़ कर हैरान रह गए. यह म्यूजियम उत्तर कोरियाई एजेंटों द्वारा अगवा किए गए जापानी लोगों की कहानी बताता है.

फियोर कहते हैं, "जो मैंने पढ़ा उस पर मुझे विश्वास नहीं हुआ. यह म्यूजियम जापानी लोगों के अपहरण और उनकी रिहाई के एवज में उत्तर कोरिया की तरफ से रखी गई मांगों की कहानी बताता है, लेकिन उस बोर्ड पर फ्रेंच भाषा में लिखा था कि उन्हें वापस उत्तर कोरिया भेजा जाना चाहिए था." यही नहीं, जब फियोर ने गलती सुधारने के लिए म्यूजियम के अधिकारियों को लिखा तो उन्होंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया.

जापान की निगाता यूनिवर्सिटी में भाषा विज्ञान और पश्चिमी संस्कृति अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर ग्रेगोरी हेडली कहते हैं कि जापान में अंग्रेजी भाषा के बोर्डों की एक परंपरा रही है. यहां तक कि निगाता जैसे छोटे शहरों में भी ऐसे बोर्ड दिखते हैं जहां दूसरे विश्य युद्ध के दौरान कैदियों को रखा गया.

वह कहते हैं, "यह एक सामाजिक-भाषाई मुद्दा है. हमें समझना होगा कि जापान में जो अंग्रेजी वाले साइन बोर्ड लगे हैं वे अंग्रेजी बोलने वालों के लिए नहीं हैं. इन्हें जापान के लोगों ने जापानी पढ़ने वाले लोगों के लिए लगाया है ताकि वे दिखा सकें कि वे एक आधुनिक और विविध समाज में रहते हैं जो पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ है."

हेडली कहते हैं कि ट्रैवल कंपनियों को टूरिज्म अधिकारियों की तरफ से अपने साइन बोर्ड्स और निर्देशों में अनुवाद की गलतियों को दूर करने के लिए जो निर्देश दिए गए हैं, वे बहुत प्रभावी नहीं है और उनके लिए काफी देर हो चुकी है.

जापान जाने वाले विदेशी पर्यटकों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है कि वहां विदेशियों को आने जाने, घूमने फिरने या फिर रहने में कोई दिक्कत ना हो. 2011 में 71 लाख विदेशी सैलानी जापान गए जबकि 2018 में यह आंकड़ा बढ़ कर तीन करोड़ हो गया. 2020 के लिए अधिकारी चार करोड़ के आंकड़े को छूने का लक्ष्य रख रहे हैं.

जापानी भाषा पर पड़ रहे इंग्लिश के प्रभाव को 'जैपलिश' कहा जा रहा है और कई लोग सोशल मीडिया पर इसका मजाक भी उड़ाते हैं. खासकर कई विदेशी इस बारे में अपने अनुभव साझा कर रहे हैं. जापान टुडे वेबसाइट पर एक व्यक्ति ने लिखा, "मैं जब एक जापानी कंपनी में काम करता था तो मेरे जापानी सहकर्मी मेरे पास गूगल से अनुवाद किया हुआ टेक्स्ट लाते थे और मुझसे उसे ठीक करने को कहते थे. मैं समय निकालकर उसे ठीक भी करता था. लेकिन मैं यह देख कर झल्ला जाता था कि वे इस्तेमाल गूगल ट्रांसलेटर वाला टेक्स्ट ही करते थे."

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