जेट एयरवेज को डुबोने वाले पांच कारण | दुनिया | DW | 17.04.2019
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दुनिया

जेट एयरवेज को डुबोने वाले पांच कारण

जेट एयरवेज पतन के कगार पर है,119 विमानों से देश विदेश के 56 शहरों को सैकड़ों उड़ानों से जोड़ने वाली एयरलाइन अब 5 उड़ानों पर सिमट गई है. भारत में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी एयरलाइन रही जेट एयरवेज इस हाल में कैसे पहुंच गई?

जेट एयरवेज का उड़ानों के बंद होने के कारण एयर टिकटों की कीमतें बढ़ गई हैं. एयर फ्रांस और केएलएम ने मुंबई से अतिरिक्त उड़ान शुरू की है ताकि जेट एयरवेज के अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को जगह मिल सके. कंपनी ने अपने कर्जदाताओं से चार अरब रुपयों की मांग की है ताकि उसकी बची खुची उड़ानों को चलाए रखा जाए. एयरलाइन विशेषज्ञों की मानें तो इन पांच कारणों ने कंपनी को इस हाल में पहुंचाया है.

1. बहुत से जानकार मानते हैं कि जेट एयरवेज के बुरे दिनों की शुरूआत 2006 में ही हो गई थी जब उसने खस्ताहाल एयर सहारा को 50 करोड़ डॉलर की रकम नगद देकर खरीदा था. जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल ने तब अपने सहयोगियों की राय को अनसुना कर दिया. सहयोगियों का मानना था कि कंपनी बहुत ज्यादा पैसे दे रही है. बाजार ने भी इस सौदे पर मिलीजुली प्रतिक्रिया दी. एयरसहारा को जेटलाइट नाम दिया गया लेकिन 2015 में यह पूरी तरह से डूब गई और इसके साथ ही जेट एयरवेज का पूरा निवेश भी डूब गया. बैंगलोर एविएशन नाम की वेबसाइट के संपादक देवेश अग्रवाल का कहना है, "वह अधिग्रहण जेट के गले पर अब भी बोझ बना हुआ है."

     

2. भारत के विमानन क्षेत्र में भारी प्रतिस्पर्धा है. जेट एयरवेज को इंडिगो, स्पाइस जेट और गो एयर जैसी बेहद सफल सस्ती एयरलाइनों की चुनौती झेलनी पड़ी. विशेषज्ञों कहते हैं कि जेट को चलाने वाले लोगों ने इन तीनों एयरलाइनों को गंभीरता से नहीं लिया. यह तीनों कंपनियां 2005-2006 के बीच शुरू हुईं. एक तो इन कंपनियों ने कीमतें कम रखीं और दूसरे ऐसे रूटों पर सेवा मुहैया कराई जहां पहले हवाई यात्रा की सुविधा नहीं थी. कारोबार पर नजर रकने वाले अमित पांडुरंगी का कहना है, "जेट मैनेजमेंट ने शुरू शुरू में उन्हें छोटा खिलाड़ी समझा. जेट एयरवेज कार्पोरेट ग्राहकों को सेवा दे रहा था और वह यह देखने में नाकाम रहा कि सस्ती एयरलाइनें उन ग्राहकों को लुभा रही हैं जो कीमतों का ध्यान रखते हैं."

3. नरेश गोयल की प्रबंधन शैली पर भी कई आरोप लग रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि उनके फैसले एक ऐसी टीम करती थी जिसका नेतृत्व वे खुद करते थे. जेट के सारे कामकाज का फैसला इसी टीम के हाथ में था जो वास्तव में एक गलती थी. इसकी बजाए सस्ती सेवाओं और मुख्य सेवा के लिए अलग अलग प्रबंधन रखने की जरूरत थी. गोयल गलत निवेश कर रहे थे और कंपनी की गिरती आर्थिक हालत को संभालने की बजाए ज्यादा से ज्यादा कर्ज पर निर्भर होते जा रहे थे. देवेश अग्रवाल के मुताबिक, "उनकी कमाई से ज्यादा उनका खर्च था और वो कर्ज लेते जा रहे थे."

4.  भारत की सभी एयरलाइनें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली उठापटक के प्रति संवेदनशील रहती हैं क्योंकि ज्यादातर तेल आयात होता है. जब रुपये कमजोर होता है तो तेल का खर्च बढ़ जाता है. एयरलाइन  कंपनियों के लिए तेल का खर्च सबसे बड़ा है. बीते एक साल में रुपये कमजोर और कच्चा तेल महंगा रहा है. इंडिगो और स्पाइस जेट को इस वजह से काफी नुकसान भी उठाना पड़ा लेकिन उन्होंने खर्चे कम रखे हैं और इन कंपनियों के अपनी तिमाही आंकड़ों के मुताबिक वे इस नुकसान को झेलने के लिए खुद को सक्षम बना सकीं. दूसरी तरफ जेट और अधिक कर्ज में डूब गया. मुंबई के अर्थशास्त्री आशुतोष दातार का कहना है, "जेट एयरवेज अपनी बैलेंस शीट को संभालने में नाकाम रहा और वो उद्योग के चक्रिय बदलावों में फंस गया था."

5. जेट एयरवेज एक रणनीतिक निवेशक ढूंढने में भी नाकाम रहा जो एयरलाइन में पैसा डालता रहे और इस वजह से एयरलाइन का घाटा और बढ़ गया. इसी वजह से आज उसे यह दिन देखना पड़ा है. पिछले साल के आखिर में टाटा के साथ चल रही बातचीत नाकाम हो गई. दूसरी तरफ एतिहाद एयरवेज ने भी अपनी भागीदारी बढ़ाने से इनकार कर दिया क्योंकि कंपनी के कर्ताधर्ता गोयल ही थे. 69 साल के नरेश गोयल को पिछले महीने नियंत्रण छोड़ना पड़ा. इसके बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले कर्जदाताओं के कंसोर्टियम ने नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया. अब कंपनी के लिए खरीदार ढूंढना उन्हीं की जिम्मेदारी है. अगर वो ऐसा नहीं कर सके तो 2012 में विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस के डूबने के बाद जेट एयरवेज पहली एयरलाइन होगी जो डूब जाएगी.

एनआर/ओएसजे(एएफपी)

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