जिंदगी छीनती भारतीय पटरियां | दुनिया | DW | 22.02.2012
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दुनिया

जिंदगी छीनती भारतीय पटरियां

दुनिया का पुराना और चौथा सबसे बड़ा भारतीय रेल नेटवर्क तमाम कोशिशों के बावजूद पटरियों पर होने वाली मौतों और हादसों पर रोक नहीं लगा पा रहा है. भारत में हर वर्ष लगभग 15 हजार लोग पटरियों पर जान गंवा देते हैं.

ये आंकड़े भयावह होने के साथ शर्मनाक भी है क्योंकि विश्व पटल पर तेजी से आगे बढ़ रहा भारत रेलवे सुरक्षा मापदंडों के मामले में छोटे-छोटे देशों से भी पीछे है. इंसानी खून से रोजाना पटरियां लाल हो रही हैं और लोगों का मरना यहां बेहद मामूली बात है. ट्रेनों से कट कर क्षत विक्षत होते इंसानी शरीरों को देखकर भी जिम्मेदारों की नींद नहीं खुलती. भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में ही 1 साल में 6 हजार लोगों की मौत विभिन्न कारणों से पटरियों पर हुई है.

भारत का रेल नेटवर्क 64 हजार किलोमीटर लंबा है. देश के बेहद दुर्गम इलाकों तक भी ट्रेनों की आवाजाही वर्षों से हो रही है. इतने विशाल नेटवर्क को स्थापित करने का काम तो काफी कुछ अंग्रेजों ने कर दिया था, लेकिन आजाद होने के 65 वर्ष बाद भी यहां ट्रेन दुर्घटनाओं, मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग से होने वाले हादसों की रोकथाम पर न तो सरकार गंभीर है, न रेल प्रशासन और न ही देश के लोग.

बिना गेटमेन वाले क्रॉसिंग

भारतीय रेल मंत्रालय के अनुसार देश भर में रेलवे के 33 हजार लेवल क्रॉसिंग हैं. इनमें से 18 हजार पर ही गेटमेन की तैनाती की जा सकी है. 15 हजार क्रॉसिंग अब भी मानव रहित ही हैं. इस वित्तीय वर्ष में 1500 नए क्रॉसिंगों पर गेटमेन की तैनाती को मंजूरी दी गई है.

Siemens Deutsche Bahn

तेज रफ्तार आईसीई

रेल मंत्रालय के अतिरिक्त महानिदेशक अनिल कुमार सक्सेना के अनुसार "मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग पर कर्मचारियों की तैनाती के पहले वहां से गुजरने वाले ट्रैफिक आदि की स्थिति देखनी होती है. पहले वहां कर्मचारी तैनात किए जाते हैं जहां आवागमन अधिक हो." लेकिन जिस गति से यह कार्य किया जा रहा है उसे देखते हुए अभी वर्षों तक हादसों से बचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

यूरोप में सुरक्षा से समझौता नहीं

ऐसा नहीं है कि रेलवे क्रॉसिंग की सुरक्षा की तकनीक नहीं है. जर्मनी और यूरोप के दूसरे देशों में रेलवे नेटवर्क प्रणाली बेहद विकसित हो चुकी है. यहां सुरक्षा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जाता है. जर्मनी में कहीं भी रेलवे ट्रैक खुला नजर नहीं आता. फाटक रहित रेलवे क्रॉसिंग तो दूर की बात है, रेलवे ट्रैक को भी घेर कर रखा जाता है.

जर्मनी में आईसीई जैसी हाई स्पीड ट्रेन 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है, लेकिन कहीं हादसों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई है. ट्रेनों में टक्कर रोधी उपकरणों का प्रयोग भी काफी पहले से किया जा रहा है.

हर साल नई ट्रेन पर संसाधन नहीं

भारतीय रेलवे देश के उन चुनिंदा विभागों में से हैं जो लगातार मुनाफा कमा रहे हैं. रेल बजट में हर वर्ष नई ट्रेन चलाने की घोषणा की जाती है. लेकिन संसाधनों में बढ़ोतरी के मामले में आंख मूंद ली जाती हैं. रेलवे फिलहाल 1 लाख से अधिक कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी का सामना कर रहा है. मानवीय भूलों से दर्जनों भीषणतम रेल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन अब भी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर विचार ही किया जा रहा है.

Flash-Galerie Iran Verkehr

बेतरतीब ट्रैफिक

मध्य प्रदेश के इंदौर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ए.साईं मनोहर कहते हैं, "क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों से बचने के लिए हमें रोड इंजीनियरिंग और सुरक्षा दोनों मुद्दों पर एक साथ काम करने की जरूरत है. यूरोप की तुलना में हमारे यहां सड़कों की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है. सभी रास्ते लेन में भी विभाजित नहीं हैं. चालक शराब पीकर वाहन चलाते हैं. उनके काम के घंटे भी तय नहीं हैं और न ही उन्हें आराम मिल पाता है. ऐसे में मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों की संख्या बढ़ जाती है." उन्होंने कहा कि रेलवे ट्रैक जितना भार वहन कर सकता है उससे अधिक भार रेलवे ने उस पर डाल दिया है. ट्रेनों की संख्या हर वर्ष बढ़ जाती है लेकिन संसाधनों का अभाव बना रहता है.

रेलवे का जागरुकता अभियान

क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों के अलावा चलती ट्रेन से गिरकर मरने वालों की संख्या भी भारत में काफी अधिक है. वहां ट्रेन के दरवाजे चलते समय बंद नहीं किए जाते. रोजाना दर्जनों लोग ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या भी कर लेते हैं. हर दिन 40 लाख से अधिक यात्रियों को अपने मुकाम तक पहुंचाने वाला रेलवे अभी तक पर्याप्त संख्या में कोच या रैक का इंतजाम भी नहीं कर सका है. हजारों लोग रोजाना दरवाजे पर लटक कर या छत पर बैठ कर यात्रा के लिए मजबूर हैं. इसका परिणाम हादसों के रूप में सामने आता है.

अनिल कुमार सक्सेना के अनुसार "रेल प्रशासन सुरक्षा और हादसों के मामले को काफी गंभीरता से ले रहा है. रेल सुरक्षा का मुद्दा सबसे पहले है. मानवीय भूलों की वजह से होने वाले हादसों की जांच कर यह प्रयास किया जाता है कि ऐसे हादसे दोबारा न हो." उन्होंने कहा कि रेलवे क्रॉसिंग पर होने वाले हादसों को रोकने लिए जरूरी है कि लोग भी जागरूक हों. रेलवे इसके लिए लगातार जागरुकता अभियान चलाता है. उन्होंने बताया कि ओवर ब्रिज और अंडर पास आदि भी तेजी से बनाए जा रहे हैं. पिछले सप्ताह ही मंत्रालय की अनिल काकोडकर कमेटी ने भी सुरक्षा मामले पर अपनी रिपोर्ट दी है. उसके सुझावों पर विचार किया जा रहा है.

रिपोर्ट: जितेन्द्र व्यास

संपादन: महेश झा

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