जापानी स्कूलों में सिसकते बच्चे | मनोरंजन | DW | 05.02.2013
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मनोरंजन

जापानी स्कूलों में सिसकते बच्चे

जापानी स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड मना है. लेकिन एक किशोर की आत्महत्या के मामले के बाद पता चला कि बच्चों के साथ अक्सर हिंसक व्यवहार होता है. वहीं शिक्षकों का एक समूह पिटाई की वकालत कर रहा है.

पिछले साल 23 दिसंबर को ओसाका में एक किशोर अपने कमरे की छत से लटका पाया गया. छानबीन से पता चला कि उसे एक दिन पहले बास्केटबॉल कोच ने बुरी तरह पीटा था. ऐसा कई दिनों से हो रहा था. किशोर की मौत के एक महीने बाद मां बाप ने शिक्षक के खिलाफ पुलिस में शिकायत की. इसके मुताबिक बार बार पिटाई की वजह से उनका बेटा आत्महत्या को मजबूर हुआ.

पुलिस ने उनकी यह शिकायत दर्ज की और किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले 47 वर्षीय कोच से पूछताछ का फैसला किया. इस मामले के सुर्खी में आने से दूसरे इलाकों के स्कूलों में हुई ज्यादतियां भी सामने आने लगी.

पढ़ाने के भयानक तरीके

आइची प्रांत में एक स्कूल में हाल में विज्ञान के एक प्रयोग में गलत परिणाम लाने पर टीचर ने दो बच्चों को बहुत पतला किया हुआ हाइड्रोक्लोरिक एसिड पीने को कहा. यह बात सामने आने पर शिक्षा विभाग को कड़े कदम उठाने पड़े. क्षेत्रीय शिक्षा परिषद के अधिकारियों का कहना है कि टीचर ने उन्हें बताया कि उस केमिकल को पीने से किसी तरह का कोई खतरा नहीं था.

इसके बाद बोर्ड ने एक बयान जारी कर कहा, "यह घटना एक खराब नेतृत्व का सबूत है. इसमें बच्चे की जान जाने का भी खतरा था. हम बच्चों और उनके परिवार वालों से इसकी माफी ही मांग सकते हैं." इस बयान में आगे कहा गया था कि ऐसा करने वाले टीतर के खिलाफ क्या सख्त कदम उठाया जाए इस पर सोचा जा रहा है.

बांध कर सजा

करीब एक हफ्ता पहले एक मामला सामने आया जिसमें 10 साल के छात्र को शिक्षक ने नाइलॉन की रस्सी से बांध कर सजा दी. बात तब सामने आई जब छात्र को इलाज के लिए डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा.

ओसाका में सामने आए आत्महत्या के मामले के बाद क्षेत्रीय असाही अखबार ने मांग की कि स्कूल यह बात स्वीकार करे कि शारीरिक सजा पर पाबंदी के बाद भी स्कूलों में इसका चलन जारी है.

अखबार ने लिखा, "यह बात साफ है कि स्कूलों से लेकर विश्विद्यालय तक हर स्तर पर छात्रों पर हिंसा का इस्तेमाल हो रहा है." अखबार के मुताबिक, खेल की ट्रेनिंग देने वाले कोचों को सख्ती से इस बात का आदेश दिया जाना चाहिए कि वे हिंसा का प्रयोग न करें.

नजरअंदाज होती हिंसा

ओसाका में हुई आत्महत्या की घटना से करीब एक साल पहले ओसाका नगर प्रशासन के पास इस बात की शिकायत आई कि स्कूल के बास्केटबॉल टीम में छात्रों के साथ हिंसा होती है. तब प्रशासन ने स्कूल को मामले की जांच के आदेश दिए थे. स्कूल इसके जवाब में शिक्षा संघ को लिख कर भेजा कि वहां बच्चों के साथ किसी तरह का हिंसक व्यवहार नहीं हो रहा है. आत्महत्या के मामले की जांच के दौरान सामने आया कि बास्केटबॉल खेलने वाले 50 में से 21 बच्चों को शारीरिक दंड दिया जा चुका है.

माइजी गाकुइन यूनिवर्सिटी के मानवशास्त्र के प्रोफेसर टॉम गिल कहते हैं, "जापान के शिक्षा तंत्र में ऐसा माना जाता है कि इस तरह की शारीरिक मुश्किलों से बच्चे अच्छाई ओर जाते हैं. कई शिक्षकों को लगता है कि नरमी की वजह से जापान नीचे जा रहा है."

अधिकारियों की मुश्किल

बच्चों में डर का आलम यह है कि छात्र की आत्महत्या के बाद भी अन्य छात्रों ने इस बारे में कुछ नहीं कहा. कोई शिकायत करने के लिए खुलकर सामने नहीं आया. आत्महत्या के इस मामले के बाद शिक्षा तंत्र में कोई बदलाव आएगा, टॉम गिल ऐसा नहीं मानते, "जब भी हमारे सामने ऐसे मामले आते हैं तो लोग कहते हैं कि वह हैरान हैं, मीडिया समाज कहां जा रहा है जैसे सवाल उठाता है लेकिन फिर यह सब बिखर जाता है और लोग पहले की तरह रोजमर्रा की भागदौड़ में लग जाते हैं."

"अगर यह किसी अमेरिकी स्कूल में हुआ होता तो माता-पिता ने तुरंत ही स्कूल पर कानूनी दावा ठोंक दिया होता, जब तक ऐसा यहां नहीं होगा, जब तक जापानी माता-पिता ऐसा नहीं करेंगे, तब तक मुझे लगता है कि यहां हालात ऐसी ही रहेंगे."

गिल भले ही निराश हों लेकिन कुछ बदलाव दिखने लगे हैं. 23 जनवरी को एक पूर्व छात्रा ने अपने स्कूल और जूडो कोच के खिलाफ 50 लाख येन का कानूनी दावा ठोंका. छात्रा का आरोप है कि फुजीमुरा गर्ल्स जूनियर एंड सीनियर हाईस्कूल के कोच ने लोहे की छड़ी से उसकी पिटाई, जिसकी वजह से उसके बाएं कान का पर्दा फट गया. स्कूल ने स्वीकार किया है कि कोच ने छात्रा की पिटाई की लेकिन हर्जाना देने से इनकार किया है.

रिपोर्ट: जूलियान रियाल, टोक्यो/एसएफ

संपादनः ए जमाल

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