′जानेतू′ या जाने ना | मनोरंजन | DW | 14.02.2013
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मनोरंजन

'जानेतू' या जाने ना

उत्तरी अफ्रीकी देश अल्जीरिया, तेल की खान और यहां के लोग दीवाने बॉलीवुड के. यहां के बच्चे बच्चे के मुंह पर एक गाना है, जाने तू या जाने ना... माने तू या माने ना....

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अमीन हातू के साथ अनुषा नंदकुमार

है न हैरत की बात? आ गले लग जा, 1970 के दशक की यह फिल्म नाम से बहुत लोगों को याद होगी लेकिन फिल्म की स्टोरी बहुत कम लोगों को. इस फिल्म ने अल्जीरियाई समाज में बहुत गहरी जगह बना ली है. इतनी कि अल्जीरिया की पुलिस ने इस गाने का इस्तेमाल करते हुए सुरक्षा के लिए एक विज्ञापन भी बना दिया है. यू ट्यूब पर कई वीडियो हैं जिसमें ये गीत गाता कोई बूढ़ा या जवान आपको निश्चित मिल जाएगा.

उससे भी मजेदार बात यह कि इस फिल्म की कहानी शायद ही किसी को होगी. लोग इस फिल्म को जानेतू के नाम से जानते हैं. बर्लिन फिल्म महोत्सव, बर्लिनाले के टैलेंट कैंपस में मिली युवा फिल्मकार अनुषा नंदकुमार बताती हैं, "जब भी किसी जगह मेरी अल्जीरियाई लोगों से मुलाकात हुई, वो हमेशा मुझसे पूछते कि आहा.. इंडिया, क्या आप जानेतू जानती हैं." अनुषा को पहले समझ ही नहीं आया कि सवाल क्या है. फिर वो लोग उन्हें गाना गा कर भी बताते.

इसी जानेतू ने अनुषा को मिलवाया अल्जीरिया के युवा फिल्मकार अमीन हातू से. इन दोनों की आने वाली डॉक्यूमेंट्री फिल्म का नाम है, सर्चिंग फॉर जानेतू. कोमल, खूबसूरत दिखने वाले अमीन बताते हैं, "मैं जब छोटा था, स्कूल में पढ़ता था, तब अल्जीरिया में कई बॉलीवुड फिल्में लगती थीं. हर शुक्रवार को टीवी पर हिन्दी की कोई न कोई फिल्म आती और पूरा परिवार उसे साथ मिलकर देखता. कई सिनेमा तो ऐसे थे जहां सिर्फ हिन्दी फिल्में लगती." इतना ही नहीं अमीन ने गाने की दो लाइनें भी हमें गा कर सुनाईं.

अपने प्रोजेक्ट के बारे में अमीन बताते हैं, "मैं इस फिल्म के जरिए अल्जीरियाई युवाओं को प्यार और आपसी रिश्तों के बारे में बात करवाना चाहता हूं. अल्जीरिया एक पारंपरिक समाज है जहां स्त्री और पुरुष एक साथ तो हैं लेकिन वह एक दूसरे को देखते नहीं. खुले आम प्यार और संबंधों के बारे में बात करना अच्छा नहीं माना जाता और मुस्लिम धर्म चूंकि देश का धर्म है इसलिए शादी से पहले संबंध बनाने पर रोक है. मैं चाहता हूं कि युवा कम से कम इसके बारे में बोलें."

यह पूछने पर कि इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाना एक मुस्लिम देश में खतरनाक नहीं होगा, अमीन थोड़ा सोचते हुए कहते हैं, "देखिए आभा, सेक्स पर बात करना तो वर्जित है लेकिन इस डॉक्यूमेंट्री फीचर में मैं इसे सामने नहीं ला रहा हूं. लेकिन प्यार और आपसी संबंधों के बारे में लोग मुंह खोलें यह मैं चाहता हूं."

तो मैंने अमीन से पूछा कि इसमें आ गले लग जा की भूमिका क्या है. अमीन कहते हैं, "इस फिल्म में एक विकलांग बच्चा अपने मां बाप को फिर से मिलाता है. जो कोई अल्जीरियाई इस फिल्म को देखता, वह अंत में जरूर रोता. हमारे यहां कहा जाता है कि जो भी हिन्दी फिल्म देखकर रोता नहीं, उसका दिल दिल नहीं, पत्थर है. यह फिल्म हमारे समाज में इतना बसी है क्योंकि इसमें मां बाप का प्यार, शशि कपूर का उस बच्चे के लिए प्यार शामिल है. वह जिस तरीके से अपने बच्चे से बात करता है, वह हमारे दिल में बस गया है. इसी प्यार को मैं उभारना चाहता हूं."

हिन्दी फिल्म देखकर रोने वाले अल्जीरियाई दूसरी ओर यह सोचते हैं कि अगर वह प्यार का इजहार करेंगे तो यह उनकी कमजोरी दिखाएगा.

अल्जीरिया में फिल्म संस्कृति के बारे में अमीन बताते हैं, "1990 के दशक और उससे पहले हमारे यहां 400 सिनेमाघर थे लेकिन अब इनकी संख्या सिर्फ 40 है. एक दो स्वतंत्र फिल्मकार हैं जो काम कर रहे हैं लेकिन सिर्फ फिल्मों के जरिए रोजी कमाना संभव नहीं. इसलिए लोग दूसरा काम करके फिल्में बनाते हैं. बना भी लें तो दिखाएं कहां. जो फिल्में बनती हैं वो सिर्फ क्रांति के बारे में हैं. युवा पीढ़ी का उससे कोई लेना देना भी नहीं. वो सच्चाई, आज का समाज फिल्मों में देखना चाहते हैं. पुरानी कहानियां नहीं."

फिलहाल वह जानेतू की खोज में हैं और इसके लिए उनका साथ दे रही हैं भारतीय युवा फिल्मकार अनुषा नंदकुमार.

रिपोर्टः आभा मोंढे, बर्लिन

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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