जाति व्यवस्था भी बलात्कार के लिए जिम्मेदार? | दुनिया | DW | 11.05.2018
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दुनिया

जाति व्यवस्था भी बलात्कार के लिए जिम्मेदार?

भारत में बलात्कार से जुड़े मामले सुर्खियों में बने हुए हैं. देश भर में इन मामलों का जोरदार विरोध भी हो रहा है. लेकिन विशेषज्ञ यौन अपराधों के लिए जाति व्यवस्था को भी बहुत हद तक जिम्मेदार मानते हैं.

आधुनिकता के बावजूद आज भी भारत के गांव, देहात और शहरों में जाति व्यवस्था की झलक साफ नजर आती है. आम आदमी की जिंदगी भी कहीं न कहीं इससे प्रभावित है. और, कई बार तो महिलाओं के इसके सबसे भयावह रूप का सामना करना पड़ता है. पिछले कई मामलों में देखा गया है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा में जातिगत दुश्मनी की अहम भूमिका रही है.

हालांकि कई मामलों में अंतर धार्मिक कारण भी सामने आए हैं. देश को हिला कर रख देने वाली जम्मू कश्मीर में 8 साल की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या की घटना के पीछे भी जातिगत कारण माने जा रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि समाज में हाशिए पर रहने वाले दलित और आदिवासी समुदायों की महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता. विश्लेषक कहते हैं कि आज उच्च जाति के पुरुष, पिछड़ी जाति कि महिलाओं को लगातार अपना निशाना बना रहे हैं. नतीजतन, महिलाएं बलात्कार, यौन हिंसा जैसे मामलों की शिकार बनती हैं.

जघन्य अपराध

मध्य प्रदेश के सतना जिले में एक दलित लड़की ने पुलिस को बताया कि उसका कई महीनों तक उच्च जाति के तीन लड़कों ने रेप किया. छत्तीसगढ़ में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया. जहां 22 साल की एक महिला ने एक पंडित पर कथित रूप से बहला-फुसला कर रेप का आरोप लगाया. ऐसे मामलों की एक लंबी सूची है. विश्लेषकों के मुताबिक देश में यौन हिंसा को अब उच्च वर्ग के लोग निचली जाति के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं. जिसका मकसद है वर्चस्व स्थापित करना. सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी कहती हैं, "हम यह रोजाना देखते हैं. हालांकि यौन अपराधों को लेकर कोई जातिगत आंकड़ें नहीं हैं. लेकिन यह अब नजर आता है. यहां तक कि उन महिलाओं को भी ज्यादा निशाना बनाया जाता है जिनके परिवार वाले काम की तलाश में बाहर आ गए हैं."

विश्लेषकों की राय में जहां जातिगत टकराव की स्थिति बनती है, वहां बलात्कार या यौन हिंसा को लड़ाई का हथियार बना लिया जाता है. इसका एक उदाहरण साल 2016 में हुए जाट आंदोलन के दौरान भी नजर आता है. फरवरी 2016 में जाट समुदाय सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहा था. इस आंदोलन की वजह से दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा में आम जीवन काफी प्रभावित हुआ था. इस दौरान हुई हिंसा में नौ महिलाओं के साथ गैंग रेप किया गया. कुछ ऐसे ही मामले तमिलनाडु में भी सामने आए थे.

शहर भी प्रभावित

ऐसा भी नहीं है कि यौन अपराध और बलात्कार से जुड़े मामले सिर्फ ग्रामीण इलाके में ही सामने आ रहे हैं. साइबर सिटी कहे जाने वाले हैदाराबाद के आपराधिक आंकड़ें बताते हैं कि पिछले तीन साल में शहर की करीब 37 दलित और आदिवासी महिलाओं के साथ रेप किया गया. इन सारे मामलों में आरोप उच्च जाति के पुरुषों पर ही लगाए गए हैं.

समाजशास्त्री संजय श्रीवास्तव ने डीडब्ल्यू से बातचीत ने कहा, "बलात्कार ताकत से जुड़ा मसला है. जब उच्च जाति का कोई व्यक्ति किसी दलित महिला से बलात्कार करता है तो उसे शक्ति प्रदर्शन भी कहा जाता है. क्योंकि वह ये बताना चाहते हैं कि दलित जाति के पुरूष महिलाओं की सुरक्षा करने में सक्षम नहीं हैं. इसलिए रेप, पुरुषों के बीच एक प्रतिस्पर्धा भी है."

डर का माहौल

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक भारत में दलित महिलाओं की संख्या 10 करोड़ से भी अधिक है. साथ ही रोजाना करीब चार दलित महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं. सेक्स एक्सपर्ट्स कानूनी सुरक्षा पर रोशनी डालते हुए कहते हैं कि कुछ अपराधी यौन अपराध पीड़ितों को डराने के लिए भी करते हैं. कई मामलों में उन्हें लगता है कि वो सजा से बच सकते हैं. 

कार्यकर्ता मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में अगर कोई दलित या आदिवासी परिवार किसी जाति संबंधी परंपरा को तोड़ता है या बदलाव करता है तो सजा देने के लिए उस परिवार की महिलाओं को चुना जाता है. सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाश्मी कहती हैं, "सजा देने के एक तरीका प्रॉपर्टी जला देना, लूटपाट करना है. तो दूसरा तरीका महिलाओं का रेप करना, उन्हें नंगा कर सड़कों पर घुमाना माना जाता है."

अनेकों कारण

हालांकि हाशिए पर रहने वाले इन समुदायों की महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के लिए कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. मसलन ग्रामीण इलाकों से पुरुष काम की तलाश में बड़े शहरों की ओर चले जाते हैं. ऐसे में गांवों रहने वाली महिलाएं घरों में अकेली रह जाती हैं. महिलाओं को कमजोर और अकेला समझ कर भी उन्हें निशाना बनाया जाता है. इसके अतिरिक्त आज दलित वर्ग में भी राजनीतिक जागरुकता आ रही है. जो इन पर बढ़ते हमलों का एक कारण भी है. सामाजिक कार्यकर्ता पॉल दिवाकर कहते हैं, "दलितों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा सरकार का दावा खोखला है. जातीय समीकरणों को चुनौती दी जानी चाहिए. साथ ही नीतियां और फैसले तय करते हुए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम एक ऐतिहासिक समस्या से टकरा रहे हैं."

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