जाति, परंपराओं का हवाला देकर छीनी जाती रही है महिलाओं और आदिवासियों से जमीन | दुनिया | DW | 02.10.2019
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दुनिया

जाति, परंपराओं का हवाला देकर छीनी जाती रही है महिलाओं और आदिवासियों से जमीन

विश्व में सिर्फ 10 प्रतिशत जमीन पर ही आदिवासी समुदायों का मालिकाना हक है. भूमि सुधार कानूनों के बावजूद पूरे एशिया में महिलाओं, कथित निचली जाति और आदिवासी लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है.

अमेरिकी राजधानी वॉशिंगटन डीसी में स्थित राइट्स और रिसोर्सेज इनीशिएटिव नाम के एडवोकेसी समूह ने बताया है कि पूरे विश्व में आदिवासी समुदायों के पास सिर्फ 10 प्रतिशत जमीन पर कानूनी अधिकार है. जमीन पर हक दिलाने के लिए काम करने वाले सामाजित कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसके पीछे सामाजिक पूर्वाग्रह की गहरी जड़ें है.

कृषि सुधार के लिए काम करने वाले एक गैर-लाभकारी नेटवर्क एएनजीओसी के कार्यकारी निदेशक नाथानिएल डॉन मार्केज कहते हैं, "एशिया में भूमि को लेकर संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है. ऐसा सिर्फ उद्योग की वजह से नहीं हो रहा है बल्कि सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव और वर्षों से चले आ रहे एकाधिकार की वजह से भी हो रहा है. जमीन पर उद्योग लगाने के दबाव से आदिवासियों को जमीन का हक मिलना मुश्किल हो गया है. पारिवारिक संपत्ति बंटवारे में महिलाओं को उनका हिस्सा दिलाने में भी भूमि सुधार असफल रहा."

एएनजीओसी ने हाल ही में फिलीपींस, भारत और बांग्लादेश सहित एशिया के आठ देशों में सर्वे किया. इस सर्वे के नतीजे बताते हैं कि भूमि सुधार कानून, जो आदिवासियों और महिलाओं के अधिकारों को मान्यता देता है, पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया. जमीनों का फिर से सही तरीके नहीं बांटा गया. मार्केज कहते हैं कि जब भी आदिवासी लोग जमीन पर दावा करते हैं, प्रायः उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है. ब्रिटेन स्थित ग्लोबल विटनेस की रैंकिंग में पिछले साल फिलीपींस को भूमि सुधार कार्यकर्ताओं के लिए सबसे खतरनाक देश बताया गया.

भारतीय महिलाओं के नाम कितनी जमीन

भारत में जमीन का मालिकाना हक ज्यादातर पुरुषों के नाम पर होता है. जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कृषि क्षेत्र में काम करने वालों में महिलाओं की भागीदारी एक तिहाई है लेकिन उनके नाम पर मात्र 13 प्रतिशत ही जमीन है. देश में 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी हिंदुओं की है. 2005 में हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम में संशोधन किया गया. महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए.

भारत में महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली गिन्नी श्रीवास्तव कहती हैं, "सामाजिक प्रथाओं और परंपराओं की वजह से महिलाओं को अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं. ऐसी मानसिकता बन चुकी है कि जमीन पुरुषों के नाम पर ही होनी चाहिए. नौकरी के लिए पुरुषों का शहरों में पलायन बढ़ने की वजह से पूरे एशिया में कृषि के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बढ़ी है. लेकिन अभी भी जमीन का मालिकाना हक महिलाओं के नाम नहीं के बराबर हुआ है. महिलाओं पर शादी के समय अपनी पैतृक संपत्ति को छोड़ने का दबाव भी बनाया जाता है."

विधवा का घर से निकलना मना

विधवा हो गई महिलाओं को कानूनी रूप से अपने पति की संपत्ति विरासत में मिल सकती है. लेकिन गिन्नी बताती हैं, "राजस्थान में विधवाओं को एक महीने या एक साल के लिए भी घर छोड़ने की अनुमति नहीं होती है. ऐसे में 30 दिनों के अंदर संपत्ति हस्तांतरण करने की समय सीमा खत्म हो सकती है. सिर्फ कानून होने के कुछ नहीं होता. जमीन को लेकर बने नियम में लैंगिक गणना की जरूरत है ताकि क्रियान्वयन में जो कमियां है उन्हें पहचान कर दूर किया जा सके."

दलित एक्टिविस्ट सुजाता सूरीपल्ली का मानना है, "निचली जाति, दलित और आदिवासी को जमीन के मालिकाना हक से दूर रखा गया है. इसके पीछे की वजह है सामाजिक पूर्वाग्रह की गहरी जड़ें. भारत में जाति के आधार पर भेदभाव पर 1955 में ही कानूनी रोक लगा दी गई थी इसके बावजूद यह जारी है." भारत में निचली जाति के करीब आधे लोग भूमिहीन हैं. सुजाता कहती हैं, "वे सभी काम करते हैं. ऐसे कानून हैं कि भूमिहीनों को भूमि दी जा सके. इसके बावजूद उनके पास इतनी कम जमीन है."

भारत में मानवाधिकारों की वकालत करने वाले समूह एकता परिषद के अध्यक्ष राजगोपाल पीवी कहते हैं, "दिल्ली से जिनेवा तक एक साल का वैश्विक शांति मार्च बुधवार (2 अक्टूबर, 2019) को दिल्ली में समाप्त हुआ. इसका उद्देश्य भूमि संघर्ष को उजागर करना है. जमीन और जंगल पर उनका हक है जो पीढ़ियों से उसका संरक्षण कर रहे हैं. गरीबी और अन्याय हमारे देश की पुरानी समस्या है. ग्लोबल वार्मिंग जैसी नई समस्याओं के साथ ये और बढ़ती जा रही है."

आरआर/आरपी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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