जलवायु सम्मेलन से पहले साहसी उम्मीद | दुनिया | DW | 03.12.2018
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दुनिया

जलवायु सम्मेलन से पहले साहसी उम्मीद

पेरिस जलवायु संधि पर 2015 में हुए दस्तखत के तीन साल बाद पर्यावरण कार्यकर्ता इस हफ्ते पोलैंड में मिल रहे हैं. पेरिस के बाद समय बहुत बदल गया है, लेकिन येंस थुराऊ का मानना है कि उम्मीदें अब भी बाकी हैं.

पोलैंड में जलवायु सम्मेलन के पहले आप जिसे भी सुनें उसका संदेश एक जैसा ही लगता है. राजनीतिज्ञ हों या सरकारी अधिकारी, पर्यावरण संगठन हों या वैज्ञानिक, वे सब एक तरह से साहसी उम्मीद फैला रहे हैं. वे कह रहे हैं कि वे सारी बुरी खबरों के बावजूद ग्रीनहाउस गैसों के खिलाफ संघर्ष में पीछे हटने वाले नहीं हैं. वैसे भी बहुत कुछ हासिल हो चुका है. अधिक से अधिक देश अब अक्षय ऊर्जा में निवेश कर रहे हैं और पोलैंड में आश्वासनों को ठोस नीतियों में बदला जा रहा है. अमीर और गरीब मुल्क इसे मिलकर पूरा करेंगे.

स्याह परछाइयां

बहुत अच्छी उम्मीद है, खाली यदि काटोवित्से के जलवायु सम्मेलन पर स्याह परछाईयां नहीं होती. अमेरिका ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में पिछले साल पेरिस संधि छोड़ दी. ब्राजील भी अपने नए राष्ट्रपति जाइर बोल्सोनारो के शासन के दौरान जल्द ही संधि छोड़ देगा. अमेजन वर्षावन वाले इस देश ने पहले ही अगले साल का सम्मेलन में अपने देश में कराने से मना कर दिया है. दुनिया भर में फिर से जहरीली गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है और पेरिस में तय दो प्रतिशत का लक्ष्य पूरा होने की संभावना नहीं दिखती.

अमेरिका और ब्राजील में ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी यूरोप के बहुत से देशों में भी आपसी सद्भावना पर आधारित बहुपक्षीय संधियां अब लोकप्रिय नहीं रह गई हैं. दुनिया के पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी राजनीतिक इच्छा पहले बेहतर हुआ करती थी.

वीडियो देखें 01:44

पोलैंड में जलवायु सम्मेलन शुरू

और जर्मनी? हालांकि वह जोश के साथ जलवायु संरक्षण के लक्ष्य पर टिका है लेकिन वह भी 2020 तक के लिए तय अपने पर्यावरण लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाएगा. वह इस समय इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए जरूरी कोयला खानों को बंद करने पर गरमागरम बहस का इंतजार कर रहा है.

आम लोगों का दबाव

फिलहाल उम्मीद ग्रासरूट से आ रही है. मसलन अमेरिका में नगरपालिकाएं, नगर निगम और कंपनियां जलवायु परिवर्तन को झुठलाने वाले राष्ट्रपति ट्रंप की अज्ञानता के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं. जर्मनी में युवा लोग सालों की निष्क्रियता छोड़कर फिर से पर्यावरण संरक्षण के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं.

इसके अलावा ज्यादा लोग इस बात के प्रति जागरूक हो रहे हैं कि अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के अलावा क्या करना है. बड़े शहरों में नए तरह का यातायात विकसित हो रहा है. पेट्रोल से चलने वाली कारें अभी भी हैं, लेकिन ज्यादा दिनों तक नहीं नहीं रहेंगे. ये सब जलवायु संरक्षण के लिए सकारात्मक बातें हैं.

जर्मनी में हाल के प्रांतीय चुनावों में ग्रीन पार्टी को मिले अतिरिक्त समर्थन से पता चलता है कि बहुत से लोग जलवायु परिवर्तन को मानवजाति की फौरी समस्या मानते हैं. दूसरी ओर दक्षिणपंथी पॉपुलिस्ट पार्टियां जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक जानकारी को साजिश कहकर झुठला रही हैं.

क्या इसका काटोवित्से के संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन पर असर होगा कि ज्यादा रिसर्च की जरूरत होगी, गरीब देशों के अधिक संसाधन जुटाने होंगे, पेरिस संघि का जोरदार बचाव करना होगा और उसे सारी मुश्किलों के बावजूद लागू करना होगा. और हम सबको आशावान रहना होगा और उम्मीद करनी होगी कि दुनिया भर के लोगों के दबाव से परिवर्तन संभव है.

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