जलवायु परिवर्तन: वक्त आ गया है कुछ करने का | विज्ञान | DW | 22.06.2011
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विज्ञान

जलवायु परिवर्तन: वक्त आ गया है कुछ करने का

भारत सहित पूरी दुनिया में बड़े शहरों की आबादी तेजी से बढ़ रही है. लेकिन विशेषज्ञों की राय में यह सिर्फ शुरुआत है. 2050 तक दुनिया की सत्तर फीसदी आबादी शहरों में रहेगी. जलवायु परिवर्तन है जिम्मेदार.

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पहले से ही घनी आबादी वाले इन शहरों पर दबाव बढ़ेगा. बिजली की जरूरत के अलावा बुनियादी सुविधाओं की भी व्यवस्था करनी होगी. नासा की ताजा रिपोर्ट कहती है कि 2060 तक धरती का औसत तापमान चार डिग्री बढ़ जाएगा, जिससे एक तरफ प्राकृतिक जलस्त्रोत गर्माने लगेंगे, तो दूसरी तरफ लोगों का विस्थापन भी बढ़ेगा. दिल्ली की आबादी डेढ़ करोड़ से ज्यादा हो गई है. वहीं मुंबई की भी लगभग सवा करोड़ छूने जा रही है.

Earth Hour Berlin

बड़े शहरों पर बड़ा खतरा

जर्मन इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल एंड एरिया स्टडीज के मुख्य शोधकर्ता योआखिम बेट्ज के मुताबिक बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की जीवन शैली ग्रामीण इलाकों के लोगों से ज्यादा विकसित है और आने वाले दिनों में ये शहर ग्रीन हाउस गैस के लिए और जिम्मेदार हो जाएंगे. प्रोफेसर बेट्ज के मुताबिक दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों पर खतरा ज्यादा है. योआखिम बेट्ज के मुताबिक "भारत में वायु और जल प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा है कि इससे लोगों की सेहत और औसतन उम्र खतरे में पड़ जाएगी. इसलिए मुझे लगता है कि सबसे बड़े शहर जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे."

शहरों पर आबादी का दबाव

भारत जैसे देश जिसकी आबादी सवा अरब है. और तेजी से बढ़ती जा रही है, इन बड़े शहरों के पर्यावरण को बचाने के लिए काम करना होगा. सवा करोड़ के भारत में शहरों की घनी आबादी पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी बजा रही है. आबादी के मामले में साठ सत्तर लाख से लेकर करोड़ के आंकड़े को छूते इन शहरों में अगर फौरन पर्यावरण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है.

वुप्परटाल इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट, इनवायरोमेंट एंड एनर्जी के शोधकर्ता डेनियल फैलेनटीन के मुताबिक इन शहरों में ऐसी प्लानिंग करनी होगी, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें. घर से ऑफिस आने जाने के लिए साइकिल या कार पूलिंग भी जरूरी होगी. फैलेनटीन के मुताबिक इन उपायों के जरिए काफी हद तक ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम किया जा सकता है. फैलेनटीन कहते हैं "यह एक रणनीति है शहरों को लो कार्बन शहर बनाने की. इसके लिए अलग अलग सेक्टरों को शामिल करना होगा क्योंकि कुछ सेक्टर सीओटू एमिशन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं. मसलन इंडस्ट्री, ट्रांसपोर्ट. और आवास क्षेत्र भी इनमें शामिल हैं जहां एयरकंडिशनिंग की वजह से ऊर्जा की बहुत ज्यादा खपत होती है. लेकिन मुझे लगता है कि जिस सेक्टर में सबसे ज्यादा काम करने की जरूरत है, वह है ट्रांसपोर्ट सेक्टर. हमें लोगों को अकेले यात्रा करने के बजाय सामूहिक यात्रा के चलन की ओर ले जाना होगा."

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बदलाव को समझना होगा

लेकिन भारत में बड़ी संख्या में लोग अभी भी जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूक नहीं है. भारतीय मिडिल क्लास इस बड़े मुद्दे के बारे में सोचता है. इसके प्रभावों के बारे में जानने की कोशिश भी करता है. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में भूगोल की शोधकर्ता सुजाना फिशर के मुताबिक लोगों को जागरूक बनाने के अलावा उन्हें बदलते पर्यावरण के परिणाम भी बताने होंगे. सुजाना कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि भारत सिर्फ लोगों को जागरूक करके जलवायु परिवर्तन से लड़ सकता है. समाज का काम का सिर्फ इस बारे में काम करना ही नहीं है बल्कि उन्हें बदलावों के हिसाब से खुद को ढालने के लिए तैयार भी होना होगा. यह काम सिर्फ जागरूकता से नहीं हो सकता. मसलन गांवों को मॉनसून में आने वाले बदलावों के बारे में बताना होगा."

विकसित देशों के बड़े शहरों में ग्रीन हाउस उत्सर्जन को रोकने के लिए कई योजनाएं चलती हैं. जैसे चौड़े फुटपाथ बनाना, साइकिलिंग को बढ़ावा देना, पैदल यात्रियों के लिए अलग व्यवस्था करना. लोगों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल की सलाह दी जाती है. भारत में भी इस तरह की योजना चलानी होगी. ताकि बड़े शहरों के काल के प्रकोप से बचाया जा सके. मानव इस दिशा में बेशक कुछ सचेत हो चला है और वैश्विक स्तर पर पर्यावरण सुधार के प्रयास जारी हैं. सफलता कितनी मिलती है यह आगे ही पता लगेगा.

रिपोर्ट: आमिर अंसारी

संपादन: अनवर जे अशरफ

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