जलवायु परिवर्तन की वजह से संकट में जिम्बाब्वे के पशुपालक | दुनिया | DW | 06.12.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

जलवायु परिवर्तन की वजह से संकट में जिम्बाब्वे के पशुपालक

जिम्बाब्वे के कई किसान, कंकाल में तब्दील हो रहे अपने मवेशियों को बचाने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं. समृद्ध देशों के कार्बन उत्सर्जन की कीमत गरीब किसान चुका रहे हैं.

कुछ साल पहले तक जिम्बाब्वे के पशुपालक आराम से गुजर बसर करते थे लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से आज वे संकट में हैं. उनके जानवर मर रहे हैं. पशुपालन करने वाली महिला किसान सिफिवे मोयो चिलचिलाती धूप में तब तक तेजी से चलती हैं जब तक कि वह मक्के के खेत के बीच में एक छायादार पेड़ के नीचे नहीं पहुंच जातीं. उनके पास तीन गायें हैं. तीनों काफी दुर्बल हो चुकी हैं. दो गायें गर्भवती हैं. मोयो दिन में दूसरी बार गायों की जांच कर रह रही हैं.

59 साल की मोयो इन गायों को खड़ा देख राहत महसूस करती हैं. उन्हें और उनके पति डैनियल को कभी-कभी कमजोर जानवरों को दिन में तीन बार पैरों पर खड़ा करना पड़ता है ताकि उन्हें जिंदा रखा जा सके. 

देश में पड़े एक और सूखे ने जिम्बाब्वे को तबाह कर दिया है. देश के पश्चिमी क्षेत्र में काफी संख्या में किसान पशुपालन करते हैं लेकिन अब उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है. कारण ये है कि प्यास और भोजन की कमी से जानवर मर रहे हैं. 

जलवायु परिवर्तन की वजह से जिम्बाब्वे के किसान लगातार सूखे की मार झेल रहे हैं. इससे निपटने के लिए वे पशुपालन के तरीकों को बदलने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन सभी लोग नए तरीकों को समझ नहीं पा रहे हैं.

किसानों के लिए उनके मवेशी संपदा हैं. लेकिन सूखे की वजह से आय और बचत कम हो रही है. सिफिवे मोयो कहती हैं, "जानवर हमारे बैंक हैं. यदि मेरी गायें मर जाती हैं तो हम एक बार में अपने पांच जानवर खो देंगे."

लगातार मर रहे जानवर

सितंबर और अक्टूबर महीने में माटाबेलेलैंड नॉर्थ में सूखे, पानी की किल्लत और चारागाह में कमी की वजह से लगभग 2,600 मवेशियों की मौत हो गई. यह जानकारी प्रांत के वेटनरी सर्विस विभाग के अधिकारी पोलेक्स मोयो ने दी. वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि नुकसान काफी ज्यादा होगा क्योंकि कई जानवरों की स्थिति बहुत खराब है. साल भर पहले इस अवधि में 766 जानवरों की मौत हुई थी."

कृषि से संबंधित सामान बेचने वाले कैनेथ न्योनी कहते हैं, "इस क्षेत्र में जानवर मर रहे हैं क्योंकि पैसे की कमी की वजह से किसान अपने जानवरों के लिए पोषक चारा नहीं खरीद सकते हैं. इसकी वजह ये भी है कि मांग बढ़ने से इसकी कीमतें भी बढ़ी हैं. 50 किलो वाला बैग पिछले साल के मुकाबले 33 प्रतिशत तक महंगा हो गया है."

डैनियल मोयो कहते हैं कि गायों का चारा खरीदने के लिए उनका परिवार तीन बकरियां बेच चुका है. उन्हें लगता है कि अभी और बकरियां बेचनी पड़ेगी. वे कहते हैं,  "गायों को परिवार के खाने के लिए बनाया गया मक्के का भोजन भी दिया जा रहा है. यह भोजन नमक और मक्के को मिलाकर बनाया गया है. इस मक्के की उपज 2017 में हुई थी, जिसमें से कुछ मात्रा अभी बची हुई है."

मोयो कहते हैं, "इससे पहले हमने सूखे की वजह से जानवर नहीं खोए थे क्योंकि ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं बनी. हमारे परिवार के पास 20 अन्य जानवर भी हैं. यदि जल्द ही बारिश नहीं हुई तो घास और पानी की कमी से उनकी जान भी खतरे में पड़ सकती है. फिलहाल आसपास की सारी नदियां सूख चुकी है. पानी की तलाश में जानवरों को दूर ले जाना पड़ता है. सूखे की वजह से किसानों ने अपने जानवरों की संख्या घटानी शुरू कर दी, लेकिन कई लोग ऐसा करने में पीछे रह गए." 

गंभीर संकट

पड़ोस के गांव तशुत्सु के ग्राम प्रधान मुबलवा सिबांडा कहते हैं कि उन्होंने पिछले कुछ हफ्तों में 15 मवेशियों को सूखे की वजह से मरते देखा है. वे कहते हैं कि यदि तुरंत बारिश होती भी है तो जानवरों की मौत तत्काल नहीं रुकेगी क्योंकि घास उगने में भी समय लगेगा.

मोयो कहते हैं कि नेसिग्वे गांव में हाल के वर्षों में सूखे से निपटने के लिए एक प्रयास भी किया गया. इसके तहत सूखे के समय में जानवरों को बाड़े में बांधकर रखना और वहीं भोजन देना था. शुरुआत में इसके अच्छे नतीजे मिले. 2015 में की गई शुरुआत के दौरान किसानों ने बाजार से खरीदा चारा और जानवरों को खिलाया. बाजार में हष्ट पुष्ट जानवर आए. इस बिक्री से जो लाभ हुआ उससे अन्य जानवरों के पालन पोषण में मदद मिली.

लेकिन 2016 के अंत तक यह प्रोजक्ट विफल होने लगा. देश की दिवालिया अर्थव्यवस्था इसकी वजह बनी. मुद्रा के अवमूल्यन और अति महंगाई से हर चीज के दाम आसमान छूने लगे. इस प्रोजेक्ट में मदद करने वाले किसान मुहले मसुकु कहते हैं, "मुद्रा का अवमूल्यन होने की वजह से जानवरों की बिक्री से प्राप्त पैसे अन्य जानवरों के भोजन के लिए भी पर्याप्त नहीं थे." देश में अगस्त महीने में सूखे को आपदा घोषित किया गया.

सितंबर में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चेतावनी दी थी कि 2019 में जिम्बाब्वे की अर्थव्यवस्था के सिकुड़ने की संभावना है, क्योंकि मुद्रास्फीति 300% तक बढ़ गई है. यह वेनेजुएला के बाद दुनिया में दूसरी सबसे ऊंची दर है. बढ़ती महंगाई, विदेशी मुद्रा की कमी, पानी और बिजली की किल्लत ने देश में वस्तुओं और सेवाओं की लागत बढ़ा दी है.

आरआर/ओएसजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

__________________________

हमसे जुड़ें: WhatsApp | Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन