जर्मन फिल्मकार को स्टूडेंट ऑस्कर | मनोरंजन | DW | 09.06.2014
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मनोरंजन

जर्मन फिल्मकार को स्टूडेंट ऑस्कर

रिजल्ट आने के बाद जो खुशी छात्रों को होती है वैसी ही खुशी जर्मन फिल्मकार लेनार्ट रुफ को हुई वेवरली हिल्स फिल्म अकादमी का स्टूडेंट ऑस्कर पाने का फोन आने पर. इस पुरस्कार ने उनके लिए करियर के नए दरवाजे खोल दिए हैं.

टेलीफोन की घंटी और दूसरी तरफ हॉलीवुड. घर पर जब फोन आया तो लेनार्ट रुफ की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा. बेहतरीन विदेशी फिल्म का पुरस्कार जीतने वाले रुफ बताते हैं, "मेरा पूरा शरीर लाल हो गया."

लेनार्ट रुफ म्यूनिख के टीवी और फिल्म इंस्टीट्यूट के तीसरे स्टूडेंट हैं जिन्हें मानद विदेशी फिल्म अवार्ड मिला है. अमेरिका का एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज 1972 से यह पुरस्कार दे रहा है जिसे प्रसिद्ध ऑस्कर पुरस्कारों का छोटा भाई माना जाता है. अक्सर यह पुरस्कार जीतने वाले युवा फिल्मकार बाद में चल कर ऑस्कर की दुनिया में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं.

सपने और हकीकत के बीच

लेनार्ट रुफ ने हाल ही में अपनी पढ़ाई पूरी की है और अब उन्हें अपनी डिप्लोमा फिल्म नोसेबो के लिए यह पुरस्कार मिला है. उन्हें स्वर्ण पुरस्कार मिला तो बर्लिन में रहने वाले उनके साथी फिल्मकार पेटर बाउमन को शॉर्ट फिल्म बोर्डर पेट्रोल के लिए कांस्य पुरस्कार.

विजेता फिल्म नोसेबो एक्शन, भावनाओं और खूबसूरत तस्वीरों से भरी 40 मिनट की थ्रिलर है, जिसके केंद्र में दवाओं के टेस्ट में हिस्सा ले रहा एक जोड़ा है. 22 वर्षीय क्रिस्टियान और उसकी गर्लफ्रेंड को एक मरीज के मरने के बारे में पता चलता है, लेकिन डॉक्टर उसे दबाने की कोशिश कर रहे हैं. अब वह अपनी गर्लफ्रेंड को बचाना चाहता है और क्लीनिक से भगाना चाहता है. दवा माफिया के लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं. चूंकि क्रिस्टियान शिजोफ्रेनिया का शिकार है, फिल्म के बढ़ने के साथ सपना और हकीकत गड्डमगड्ड होने लगते हैं.

Studenten-Oscar für Münchner Nachwuchsfilmer

लेनार्ट रुफ और टोबियास हूबर

हकीकत के साथ इस खेल ने युवा फिल्मकार को बहुत आकर्षित किया. वे इसमें फिल्म का समांतर भी देखते हैं, "हम सारा समय एक प्रोजेक्शन देखते हैं, ये बस रोशनी है जिसे छोटी तस्वीरों के ऊपर से भेजा जाता है, लेकिन जो हम महसूस करते हैं वह असली होता है." रुफ कहते हैं कि यही उनकी फिल्म में भी होता है, "अंत में यह अहम नहीं है क्रिस्टियान ने वह सब झेला या नहीं, उसने भावनात्मक तौर पर उसका अनुभव किया है."

फिल्म इंस्टीट्यूट का नेटवर्क

रुफ की फिल्म नोसेबो को बनाने में पैसा टीवी चैनलों, बवेरियन रेडियो और टीवी चैनल आर्टे ने लगाया है और उसे प्रोड्यूस किया है ज्युडआर्ट प्रोडक्शन और मेनेलाओस प्रोडक्शन ने. दोनों ही कंपनियां में फिल्म इंस्टीट्यूट के दो दो छात्रों ने मिल कर बनाई है. मेनेलाओस प्रोडक्शन के संस्थापक टोबियास हूबर कहते हैं कि इंस्टीट्यूट के छात्रों द्वारा कंपनी बनाना सामान्य है. पढ़ाई के दौरान होने वाले संपर्कों को वे महत्वपूर्ण मानते हैं. वे कहते हैं कि इंस्टीट्यूट के छोटा होने के कारण दुनिया भर के नामी और कम नामी फिल्मकारों से संपर्क होता है. "अगर आप फिल्म बनाना चाहते हैं तो यह अहम है."

Studenten-Oscar für Münchner Nachwuchsfilmer

फिल्म इंस्टीट्यूट में साल में सिर्फ 30 दाखिले

बहुत सारे संपर्क पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद भी बने रहते हैं और वे फिल्म के लिए सहयोगियों के अलावा पैसा जुटाने, टैक्स कंसलटेंसी और कानूनी सलाह के रूप में काम आते हैं. लेनार्ट रुफ को भी अंतरराष्ट्रीय संपर्क जरूरी लगते हैं. उनके अपने कोर्स में कोलंबिया, फिनलैंड, कोरिया और ऑस्ट्रिया के छात्र हैं. "सबसे बढ़ कर यहां इंस्टीट्यूट में सफल फिल्मकारों से भी मुलाकात होती है और वे अक्सर आपके साथ एडीटिंग रूम में बैठते हैं." फिल्मों के प्रोफेसर आंद्रेयास ग्रूबर कहते हैं, "यह कोई अचानक नहीं होता, यह इंस्टीट्यूट के कोर्स कंसेप्ट का हिस्सा है."

जर्मन फिल्मों का ऑस्कर कारखाना

अपने क्षेत्रों के बेहतरीन लोगों से सीखें कार्यक्रम का लाभ नोसेबो को भी मिला है. म्यूनिख के फिल्म इंस्टीट्यूट को इस बीच जर्मन फिल्मों का ऑस्कर कारखाना समझा जाने लगा है. उसने सिर्फ पुरस्कार जीतने वाले युवा निर्देशक ही पैदा नहीं किए हैं, बल्कि दो ऑस्कर विजेता भी. फ्लोरियान हेंकेल फॉन डोनर्समार्क को 2007 में द लाइफ ऑफ अदर्स के लिए ऑस्कर मिला तो कारोलीन लिंक को 2003 में नोव्हेयर इन अफ्रीका के लिए.

कोई आश्चर्य नहीं कि हर साल सैकड़ों लोग म्यूनिख के टीवी और फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिल होने के लिए आवेदन देते हैं. उनमें से 30 लोगों को चुना जाता है जिसमें 10 छात्र फिल्म की पढ़ाई करते हैं. इंस्टीट्यूट में भर्ती के लिए आवेदन के साथ दो फिल्में भेजनी होती हैं, एक कहानी कहती फिल्म और दूसरा अपने बारे में. इसके अलावा एक फोटो डॉक्युमेंटेशन और सिनोप्सिस भेजनी होती है. लेनार्ट रुफ कहते हैं, "सबसे जरूरी होता है कि आप पूरे मन से फिल्म करना चाहते हैं, आधे अधूरे से काम नहीं चलता."

रिपोर्टः गेरहार्ड ब्राक/एमजे

संपादनः ए जमाल

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