जर्मनी में महिला होने के कारण मेयर को रोका गया | दुनिया | DW | 21.01.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

जर्मनी में महिला होने के कारण मेयर को रोका गया

जर्मनी में चंदा जमा करने के लिए होने वाला एक समारोह इसलिए सुर्खियों में आ गया क्योंकि महिला मेयर को उसमें हिस्सा लेने से रोक दिया गया. आयोजकों का कहना है कि अगर पोप महिला होते, तो उन्हें भी इसी तरह सूची से हटा दिया जाता.

भारत की तरह जर्मनी में महिलाओं को मंदिर और मस्जिद में जाने के अपने हक के लिए तो नहीं लड़ना पड़ रहा है लेकिन बराबरी की लड़ाई यहां भी बरकरार है. जर्मनी को भले ही एक महिला चांसलर के लिए जाना जाता है लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि उच्च पदों पर यहां महिलाओं की संख्या आज भी काफी कम है. इसके अलावा महिलाओं और पुरुषों के वेतन में भी फर्क नजर आता है.

लिंग आधारित पक्षपात की एक मिसाल यहां हाल में तब देखने को मिली जब एक चैरिटी इवेंट की सूची से एक मेयर का नाम इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वह एक महिला हैं. दरअसल आमंत्रण ब्रेमेन शहर में होने वाले एक सालाना आयोजन का था. इस आयोजन को "आइसवेटे" यानी बर्फ की शर्त के नाम से जाना जाता है. 1829 से शहर के जानेमाने पुरुष हर साल जनवरी में एकजुट होते हैं और इस बात पर शर्त लगाते हैं कि स्थानीय नदी वेजर इस साल जमेगी या नहीं. छह जनवरी को शर्त लगाई जाती है और उसके दो हफ्तों बाद देखा जाता है कि किसने शर्त जीती.

सालों से चली आ रही इस परंपरा में कभी महिलाओं को शामिल नहीं किया गया है. इस साल ब्रेमेन के मेयर कार्स्टन जीलिंग को आयोजन में हिस्सा लेना था लेकिन वे ग्डांस्क के मेयर पावेल अदामोविच के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए पोलैंड गए हुए थे. ऐसे में उनकी प्रतिनिधि के तौर पर कारोलीन लिनर्ट को आयोजन में जाना था लेकिन आखिरी वक्त पर उन्हें मना कर दिया गया. वजह दी गई कि यह केवल पुरुषों का एक क्लब है और इसमें महिलाओं का आना वर्जित है.

लिनर्ट ने चुप्पी साधने की जगह फेसबुक पर इस बारे में अपने विचार व्यक्त किए और इस व्यवहार पर गुस्सा जताया. उन्होंने लिखा, "हम यहां जर्मनी में महिलाओं के मताधिकार के सौ सालों का उत्सव मना रहे हैं और आइसवेटे को लगता है कि परंपरा के भेष में छिप कर महिलाओं को आज भी अलग रखना सही है."

उम्मीदों से विपरीत क्लब ने इसके लिए माफी नहीं मांगी, बल्कि क्लब के अध्यक्ष पाट्रिक वेंडिश ने अखबार "बिल्ड" से कहा कि अगर पोप महिला होते, तो उन्हें भी आमंत्रित नहीं किया जाता, "यह एक पुरुषों का क्लब है और हम इस लिंग भेद वाली बहस में नहीं पड़ते हैं." हैम्बर्ग, बर्लिन और ब्रेमेन जर्मनी के वे शहर हैं जिन्हें राज्य का दर्जा भी हासिल है. ब्रेमेन में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री दोनों को मेयर ही कहा जाता है. 

पश्चिमी देशों में महिलाओं को भले ही हर दिन उन दिक्कतों से ना गुजरना पड़ता हो जिनसे भारत और आसपास के देशों में महिलाओं को अकसर जूझना होता है लेकिन बराबरी की लड़ाई यहां भी आज भी जारी है. मसलन विश्व आर्थिक फोरम के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन में इतना बड़ा फासला है कि इसे भरने में दो सौ साल भी कम पड़ जाएंगे.

ईशा भाटिया (डीपीए)

कई जगहों पर बैन है महिलाओं की एंट्री

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन