जर्मनी में नफरत के बादल | दुनिया | DW | 21.02.2020
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दुनिया

जर्मनी में नफरत के बादल

जर्मन शहर फ्रैंकफर्ट के पास हनाउ में हत्याकांड दिखाता है कि देश में नफरत का माहौल गहरा रहा है. डॉयचे वेले की मुख्य संपादक इनेस पोल का कहना है कि राजनीतिक और सामाजिक नेताओं को इस बर्बर हत्याकांड को गंभीरता से लेना चाहिए.

और अब हनाउ. जर्मनी में कुछ ही महीनों के अंदर तीसरी बार नफरत और पागलपन ने बांध तोड़ दिया है. पिछले साल जून में कंजरवेटिव राजनीतिज्ञ वाल्टर लुबके की शरणार्थियों की मदद में उनके कामों की वजह घर के सामने हत्या कर दी गई थी, अक्टूबर में हाले में सिनागॉग के मजबूत दरवाजे की वजह से एक उग्र दक्षिणपंथी खचाखच भरे यहूदी प्रार्थनाघर में हत्याकांड नहीं कर पाया था.

और अब फ्रैंकफर्ट के निकट हनाउ में दस लोगों की हत्या. एक वीडियो में संदिग्ध हत्यारे ने पहले नस्लवादी विचारों और साजिश के सिद्धांतों की बात की और फिर दो हुक्का बारों में ग्राहकों और अंत में अपनी मां की हत्या कर दी.

समाज में हत्यारे को मिलती जमीन

इन हत्यारों को उन सब चीजों से नफरत एक साथ जोड़ती है जो जर्मनी की राष्ट्रवादी व्याख्या के साथ फिट नहीं बैठतीं. चाहे वे एक दूसरे के साथ जुड़े रहे हों या दूसरे उग्र दक्षिणपंथी लोगों या गुटों के संपर्क में रहे हों या नहीं, जर्मनी को ये स्वीकार करना होगा कि नफरत का फैलाव अब देश के दिल तक हो चुका है.

राजनीतिज्ञों और नागरिक समाज को इस पर चर्चा करनी होगी कि इन हत्याओं की जड़ें नस्लवादी, महिलाविरोधी और उग्रदक्षिणपंथी विचारधाराओं में हैं और वे इस बीच समाज के विभिन्न तबकों में स्वीकार्य हो गई हैं.

ये हत्याएं एक दूसरे से अलग समझे जाने वाले एकल अपराध नहीं हैं. चाहे ये अमानवीय हिंसा उदारवादी राजनीतिज्ञ के खिलाफ हो या यहूदियों और मुसलमानों के खिलाफ, वे इस बात का सबूत हैं कि जर्मनी के सामाजिक माहौल में ये फिर से संभव है. और वे इस बात की गंभीर चेतावनी हैं कि हमें इस बात पर सोचना होगा कि क्या राज्य के पास नागरिकों की रक्षा करने की सार्वभौम जिम्मेदारी को पूरा करने के पर्याप्त साधन हैं. और उस तरह से जैसा कि संविधान में लिखा है, यानि मूल, धर्म और लिंग से स्वतंत्र.

मौत लाती इंटरनेट पर नफरत

इंटरनेट पर नफरत और उन्माद के प्रसार को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं? क्योंकि ये गरीबों और परेशान लोगों की वर्चुअल दुनिया नहीं है, जहां वे सूचना की आजादी की सुरक्षा में अपनी भड़ास निकाल सकते हैं. हनाउ इस बात का एक और सबूत है कि लोगों को इस तरह भड़काया जाना बेनतीजा नहीं रहता है, बल्कि वह मौत लाता है.

सरकार को अब तेजी और स्पष्ट तरीके से कदम उठाने होंगे. और वह भी सिर्फ शब्दों से नहीं. नहीं तो स्थिति कभी न कभी बिगड़ जाएगी और अंत में वह सब कुछ दांव पर होगा जो व्यक्तिगत आजादियों के साथ हमारा कानून सम्मत राज्य हमें देता है.

चांसलर अंगेला मैर्केल ने अपनी प्रतिक्रिया में सही शब्द चुने हैं. यह सही है नस्लवाद जहर है. लेकिन बीमारी की शिनाख्त अकेले काफी नहीं है. इसका जवाब है अमानवीय विचारधारधाराओं के खिलाफ पूरा संघर्ष और नेटवर्क पर उसके प्रसार को रोकना. ये जिम्मेदारी सिर्फ फेसबुक, ट्विटर या फिर दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों पर नहीं छोड़ी जा सकती है.

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