जर्मनी में खसरे का खतरा | दुनिया | DW | 09.07.2013
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दुनिया

जर्मनी में खसरे का खतरा

बहुत से देशों में खसरे की बीमारी जड़ से मिट गई है. लेकिन जर्मनी में ऐसा नहीं है. पिछले दिनों खसरे के कई मामलों के सामने आने के बाद देश में टीके को जरूरी बनाने पर बहस छिड़ गई है.

शरीर पर भूरी गुलाबी फुंसियां, खसरे की बीमारी का साफ लक्षण है. लेकिन यह अकेला लक्षण नहीं. अक्सर इसके साथ तेज बुखार, बहती नाक और खांसी भी होती है. समस्या यह है कि इससे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बहुत कमजोर हो जाती है, जिसकी वजह से खसरे की बीमारी झेल रहे लोग निमोनिया या इनसेफ्लाइटिस जैसी दूसरी जानलेवा बीमारियों को रोक नहीं पाते. विश्व भर में खसरे से हर साल दो लाख लोग मरते हैं.

अमेरिका में खसरे की संक्रामक बीमारी शायद ही पाई जाती है, पर जर्मनी में सालाना 2308 तक मामले सामने आ चुके हैं, उनमें से कुछ जानलेवा साबित हुईं. पिछले दिनों में खास कर बर्लिन और बवेरिया से इस महामारी के फैलने की खबर आई है. जर्मनी के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2013 की पहली छमाही में 900 से ज्यादा मामलों की रिपोर्ट दी है. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि पिछले तीन दशकों से जर्मनी में खसरे के खिलाफ टीका दिया जा रहा है, फिर भी नए मामले क्यों सामने आ रहे हैं?

हालांकि खसरे, मम्प्स और रुबेला की रोकथाम के लिए दिए जाने वाले एमएमआर टीका लगाने की दर हाल के सालों में बढ़ी है, लेकिन 1990 के दशक में बहुत से माता पिताओं ने अपने बच्चों को यह टीका न दिलवाने का फैसला किया था. संक्रामक रोगों पर काम करने वाले जर्मनी के रॉबर्ट कॉख इंस्टीट्यूट की अनेट मानकैर्त्स का कहना है कि इसकी वजह से 15 से 30 साल की उम्र के बहुत से युवाओं को संक्रमण का खतरा है.

अनिवार्य टीके

मानकैर्त्स का कहना है कि खसरे का टीका जानलेवा बीमारियों से बचने के लिए जरूरी है. जर्मन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार बच्चों को दो बार टीका दिया जाना चाहिए. पहली बार 11 से 14 महीने की आयु में और दूसरी बार चार से छह हफ्ते बाद. 2011 में पहला टीका लेने की दर 96.6 फीसदी थी, जबकि 92.1 फीसदी ने दूसरा टीका लिया. दूसरा टीका इस महामारी से लगभग पूरी सुरक्षा देता है. विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व भर में 95 फीसदी टीका इस वायरस को पूरी तरह मिटा सकता है. (जर्मनी को खुशी की तलाश)

जर्मनी में भविष्य में खसरे की महामारी को रोकने के लिए स्वास्थ्य मंत्री डानिएल बार ने अनिवार्य टीके का प्रस्ताव दिया है. देश में पहले भी महामारियों के खिलाफ अनिवार्य टीका अभियान चलाया जा चुका है. 1874 में चेचक के खिलाफ टीका अभियान चला था. दूसरे औद्योगिक देशों में भी इसके लिए कड़े कानून हैं. अमेरिका में बच्चों को स्कूल में भर्ती करने से पहले दोहरे टीके का सर्टिफिकेट देना पड़ता है. स्कैंडेनेवियाई देशों में टीका स्वैच्छिक है लेकिन मानकैर्त्स का कहना है कि वहां परिवारों को इस बारे में बताया जाता है और उन्हें बच्चों को टीका लगवाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

जर्मन पेड्रियाटिक सोसाइटी के अध्यक्ष वोल्फराम हार्टमन भी खसरे के खिलाफ अनिवार्य टीके की मांग का समर्थन करते हैं. उनका कहना है कि खसरे की नई बीमारियों को देखते हुए डॉक्टर इस बात का भरोसा नहीं कर सकते कि माता पिता अपने बच्चों को स्वैच्छिक ढंग से टीका दिलाएंगे. जर्मनी में टीके को अनिवार्य करने का कानूनी आधार छुआछूत की बीमारियों के खिलाफ सुरक्षा कानून है. इसके जरिए सरकार खतरनाक बीमारियों के जोखिम से बच्चों को बचाने के लिए चीका लगाने को अनिवार्य कर सकती है.

इम्यून सिस्टम के लिए बीमारी जरूरी

स्वैच्छिक टीके का समर्थन करने वाले डॉक्टरों के संघ के प्रमुख टीके को अनिवार्य करने की मांग से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि चूंकि बीमारी वैयक्तिक प्रक्रिया है, इसलिए इससे जुड़े फैसलों को व्यक्तियों पर छोड़ दिया जाना चाहिए. वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति पर काम करने वाले डॉक्टर खसरे के खिलाफ टीके के विरोधी नहीं हैं, लेकिन वे बचपन में ही टीका दिए जाने के खिलाफ हैं. उनका कहना है कि तेज बुखार पैदा करने वाली अन्य बीमारियों की तरह खसरा भी शरीर को समझने के लिए एक खास काम करता है.

मिषाएल फ्रीडल का कहना है कि यह एक ओर बच्चों को अपने शरीर को बेहतर तरीके से समझने का मौका देता है तो दूसरी ओर यह शरीर की रोधक क्षमता को मजबूत बनाने में भी मदद देता है. फ्रीडल का कहना है कि बच्चे सात साल की उम्र तक बुखार से अच्छी तरह से निबट सकते हैं, "बालिगों के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी करने वाली बहुत सी बीमारियों के विपरीत बचपन के सालों में मुश्किलों की दर, यदि उनका उचित इलाज किया जाए, और मेरे लिए इसमें उन्हें जोर का बुखार होना शामिल है, बहुत ही कम है."

जोखिम भी हैं टीके के

इसके विपरीत अनेट मानकैर्त्स कहती हैं, "इम्यून सिस्टम को मजबूत" बनाने का मतलब यह नहीं है कि शरीर को खसरा होने दिया जाए. उनका कहना है कि ज्यादा जरूरी यह है कि टीके से हजारों जानें बचाई जा सकती हैं. इसके अलावा जिन लोगों ने टीका लिया है वे अपनी जान बचाने के साथ साथ दूसरी की भी रक्षा करते हैं. दूसरी ओर ये भी सच है कि चूंकि टीके में जीवित वायरस भी होते हैं, इसलिए इसके साइड इफेक्ट्स संभव हैं. दस में से एक मामले में बुखार और सिरदर्द हो सकता है जबकि कुछ मामलों में मरोड़ की शिकायत भी संभव है. मानकैर्त्स के अनुसार दस लाख में एक मामले में दिमाग में जलन का भी खतरा होता है.

लेकिन इसके बावजूद यह खसरा हो जाने के मुकाबले एक हजार गुना कम खतरनाक है. खसरा बहुत ही संक्रामक होता है. यह सांस के अलावा बोलते, खांसते या छींकते समय संक्रमित व्यक्ति की नाक या मुंह से निकलने वाले तरल से भी फैलता है. यह खासकर एक साल तक के शिशुओं के लिए अत्यंत खतरनाक है. यदि तुरंत इलाज न किया जाए तो यह जानलेवा साबित हो सकता है.

रिपोर्ट: जेनिफर फ्राचेक/एमजे

संपादन: ए जमाल

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