जर्मनी में एक डेयरी फार्म पर हमने भारत से अलग क्या-क्या देखा | दुनिया | DW | 08.04.2019
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दुनिया

जर्मनी में एक डेयरी फार्म पर हमने भारत से अलग क्या-क्या देखा

भारत में किसान पशुपालन भी करते हैं. लेकिन ये कभी फायदे का सौदा नहीं हो पाता. जानिए जर्मनी में कैसे बस दो लोग पशुपालन से लाखों रुपये कमा रहे हैं.

बीता दिन रविवार था. ऐसे में हमने जर्मनी के एक गांव मूखनजीफेन में जाकर यह जानने की कोशिश की कि यहां पर ग्रामीण संकट जैसी चीजें क्यों नहीं हैं. यहां पर किसानों की आत्महत्या जैसी चीजें नहीं होती हैं जबकि यहां मौसम की मार भारत से ज्यादा होती है. साल के तीन-चार महीने तो बर्फ ही रहती है. लेकिन हमें खेतों में काम करता कोई किसान नहीं मिला. इसकी वजह बताई गई कि आज रविवार की छुट्टी है. भारत में किसानी में कोई रविवार नहीं होता. लेकिन फिर हमें एक डेयरी फार्म दिखा जहां बस दो लोग काम कर रहे थे. हमने इन दोनों से बात कर पता लगाने की कोशिश की कि यहां पशुपालन कैसे होता है.

भारत में अधिकतर खेती करने वाले लोगों के पास मवेशी होते हैं. वो अपने लिए दूध का इंतजाम इन मवेशियों से ही करते हैं. मवेशियों के गोबर को खाद के रूप में खेतों में काम में ले लेते हैं. कुछ गांव में छोटी डेयरी भी मिल जाती है. जर्मनी में जरूरी नहीं कि हर किसान मवेशी भी रखे. जो मवेशी रखते हैं वो एक बड़ी संख्या में मवेशी रखते हैं. भारत में प्रति किसान पर दो मवेशियों का औसत है.

भारत करीब 131 करोड़ की आबादी के साथ जनसंख्या के आधार पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है. जबकि जर्मनी की जनसंख्या करीब सवा आठ करोड़ के साथ 19वें स्थान पर है. भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन और खपत करता है. भारत में करीब 14.631 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता है. जर्मनी इस मामले में दुनिया का छठा देश है. यहां करीब 2.934 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता है.लेकिन यहां का उत्पादन जनसंख्या के औसत के मामले में भारत से बहुत आगे है.

Farm scene in Moynalty, Co Meath, Ireland (DW/Arthur Sullivan)

जर्मनी में पशुपालन को एक व्यवसाय की तरह अपनाया गया है. (सांकेतिक तस्वीर)

जर्मनी में करीब 42 लाख गायें हैं. और गाय रखने वाले लोगों की संख्या 67,319. मतलब एक गाय रखने वाले के पास औसत 62 गाय हैं. जबकि भारत में यह संख्या औसतन दो मवेशी है. भारत में गाय के साथ भैंस भी रखी जाती हैं. भारत दुनिया का सबसे बड़ा भैंस का दूध उत्पादन करने वाला देश है. जर्मनी में भैंस नहीं होती है. जर्मनी के उत्तरी और पूर्वी हिस्से में तबेलों में मवेशियों की संख्या अधिक है. अब बात करते हैं उन वजहों की जिनके कारण ऐसा होता है.

1. मशीनों और तकनीकी का प्रयोग

जिस डेयरी फार्म में हम गए, उसमें करीब 100 गायें और छह घोड़े थे. लेकिन इस पूरे फार्म को बस दो लोग चला रहे हैं. एक यूनिवर्सिटी पास आउट लड़की नोरा वीग और उनके पिता. इस पूरे फार्म में हर काम के लिए मशीनों का सहारा लिया जाता है. पशुओं को चारा डालना, गोबर उठाना, पानी पिलाना और दूध निकालना मशीनों से ही किया जाता है. चारा डालने और गोबर उठाने के लिए छोटे और बड़े ट्रैक्टरों जैसी मशीनें काम आती हैं. जबकि पानी हर गाय के सामने बनी जगह पर नल के जरिए अपने आप पहुंच जाता है. दूध निकालने के लिए गायों को एक खास कमरे में ले जाया जाता है जहां मशीनों से उनका दूध निकालकर एक बड़े टैंक में इकट्ठा किया जाता है. इस टैंक का तापमान 4 डिग्री रखा जाता है जिससे दूध जमा करने वाली गाड़ी के आने तक ये खराब न हो.

2. खेती भी पढ़ाई के बाद करना

भारत के अधिकांश इलाके में खेती को व्यवसाय की तरह नहीं लिया जाता. खेती और पशुपालन अधिकतर वही लोग करते हैं जो ज्यादा पढ़-लिख नहीं पाते या उन्हें कोई और काम नहीं मिल पाता. यहां ऐसा नहीं है. यहां पढ़ाई अपने रुझान से की जाती है. इस डेयरी फार्म को चलाने वाली नोरा ने यूनिवर्सिटी में डेयरी फार्मिंग की पढ़ाई की है. यहां पर डेयरी फार्मिंग करने वाले लोग पढ़ाई करने के बाद ये काम करने लगे हैं. इससे इन्हें अंदाजा होता है कि मवेशियों के लिए कौन सा खाद्य पदार्थ फायदेमंद है, किस तापमान पर जानवरों को रखा जाना चाहिए, कितना चारा देना है और प्रोटीन जैसी दूसरी सामग्रियां देनी हैं. अगर कोई पशु बीमार है, तो उसकी देखभाल किस तरह करनी है. इन सबकी जानकारी होने की वजह से ये पशुओं का बेहतर तरीके से ख्याल रख पाते हैं. पशु की उत्पादन क्षमता भी इससे बढ़ती है.

Getreideanbau Biokraftstoff Symbolbild (AP)

पढ़ाई के बाद खेती करने से सही तरीकों की जानकारी होती है.​(सांकेतिक तस्वीर)

 

3. कम संख्या में पशु न रखना

भारत में हर किसान पशुपालक है लेकिन वो कम संख्या में पशु रखते हैं. डेयरी फार्म का पूरा मशीनी तामझाम लगाने के लिए बड़ी रकम की आवश्यकता होती है. ऐसे में एक किसान या पशुपालक ऐसा नहीं कर सकता है. वो कम पशु रखते हैं तो इसका कोई व्यवसायिक इस्तेमाल नहीं हो पाता. अगर कई सारे छोटे किसान या पशुपालक मिलकर ये काम करें तो ऐसा हो सकता है. कई सारे छोटे किसान एक डेयरी फार्म स्थापित करें. इसमें महज तीन से चार लोगों को ही नियमित काम करने की जरूरत होगी. बाकी लोग अपने खेती या दूसरे कामों को करते रह सकते हैं. इससे उन पर पशुपालन का अतिरिक्त दबाव कम होगा और दूध व मुनाफा भी मिलेगा.

नोरा के फार्म में मौजूद हर एक गाय से वो सालभर में करीब 800 यूरो यानी 64,000 रुपये का मुनाफा कमाते हैं. ये भारत की औसत कमाई से ज्यादा है जबकि दूध के उत्पादन की लागत यहां भारत से ज्यादा आती है. साल 2014 में जारी येस बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रति 100 लीटर दूध के उत्पादन पर खर्च करीब 32 डॉलर यानी करीब 2,200 रुपये आती है जबकि जर्मनी में प्रति 100 लीटर उत्पादन पर खर्च 50 डॉलर यानी करीब 3500 रुपये के लगभग है.

4. अतिरिक्त खर्च न उठाना

भारत में बीफ बैन होने के बाद किसानों पर दो तरीके से अतिरिक्त खर्च आ गया है. पहला नर पशुओं को बड़ा होने तक चराते रहने का. दूसरा इन्हें अब मांस या दूसरे कामों के लिए काम में नहीं लिया जाता. ऐसे में इन्हें आवारा छोड़ देने पर ये फसलों का नुकसान करते हैं. इन दोनों का खर्च किसानों पर आ गया है. साथ ही ये एक मानसिक तनाव भी लेकर आता है. जर्मनी में छह महीने का हो जाने पर नर पशु को बेच दिया जाता है. इससे बेचने पर भी पैसा मिलता है और मांस और दूसरे पशु उत्पादों की आपू्र्ति बनी रहती है.

5. पशुपालन को व्यवसाय के रूप में देखना

भारत में पशु रखने वाले अधिकतर लोग बस अपनी जरूरत पूरा करने के लिए पशु रखते हैं. ज्यादा से ज्यादा वो अपने किसी जान-पहचान वाले को थोड़ा बहुत दूध बेचते हैं लेकिन इससे वो कभी बड़े फायदे की नहीं सोचते. छोटे डेयरी फार्म चलाने वाले लोग खुद पशु न रखकर अलग-अलग जगह से दूध इकट्ठा कर उसको अलग-अलग उत्पादों के रूप में बेचते हैं. ऐसे में वो बस बीच का मुनाफा कमाते हैं. और दूध उत्पादन करने वाले लोगों को दो-चार रुपये का मुनाफा हो पाता है, जो महीने भर में कुछ सौ रुपये का ही होता है. ऐसे में उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने में यह ज्यादा मददगार नहीं होता. अगर ये काम एक संयोजित तरीके से किया जाए तो एक मुनाफे का सौदा हो सकता है.

जर्मनी में भी पशु रखने वाले लोगों की संख्या में 2000 से 2017 के बीच करीब 50 प्रतिशत की कमी आई है. इसके अलग-अलग कारण हैं. एक बड़ा कारण ये है कि कम संख्या में पशु रखने पर यहां भी यह मुनाफे का सौदा नहीं रहता. ऐसे में पशुपालक ज्यादा संख्या में या संयोजित तरीके से पशु रखते हैं. ज्यादा कमाई होने पर लोग दूसरे व्यवसाय भी खोलने के बारे में सोच सकते हैं. आर्थिक रूप से स्वतंत्रता अपने साथ कई संभावनाएं लेकर आती है. लेकिन भारत में किसान और पशुपालक बस किसी तरह अपना पेट पाल रहे हैं. अगर सही जानकारी के साथ ये काम करने लगें तो परिस्थितियां ठीक हो सकती हैं.

जल्द ही आपको इस रिपोर्ट का एक वीडियो देखने को मिलेगा. इसके लिए आप बने रहिए DW हिन्दी के साथ.

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