जर्मनी में इस्लामिक स्टेट का पहला मुकदमा | दुनिया | DW | 15.09.2014
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दुनिया

जर्मनी में इस्लामिक स्टेट का पहला मुकदमा

पश्चिमी देश युवाओं को आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के शिकंजे से बचाने की कोशिश में लगे हैं. जर्मनी में पहले संदिग्ध पर मुकदमा शुरू हुआ है.

दिसंबर 2013 में जब क्रिश्निक बी सीरिया से जर्मनी लौटा, तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस को शक था कि वह सीरिया जा कर आतंकवादी संगठनों से जुड़ गया है. जांच के दौरान उसकी इस्लामिक स्टेट (आईएस) से नजदीकियों की बात सामने आई. पिछले हफ्ते ही जर्मन सरकार ने इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया है. शुक्रवार को आईएस पर रोक की खबर के बाद, सोमवार को क्रिश्निक बी पर मुकदमा शुरू किया गया. सुरक्षा कारणों से यहां उसका नाम बदल दिया गया है.

क्रिश्निक बी जर्मनी के हेसिया इलाके का रहने वाला है और परिवार कोसोवो से नाता रखता है. अधिकारियों का कहना है कि पिछले साल वह जुलाई से दिसंबर के बीच सीरिया में रहा, जहां उसने इस्लामिक स्टेट की ट्रेनिंग में हिस्सा लिया. अदालत के प्रवक्ता ने कहा कि जांच में यह बात सामने नहीं आई है कि वह जर्मनी में हमला करने की योजना बना रहा था, लेकिन आईएस से जुड़े होने के कारण वह देश के लिए खतरा साबित हो सकता है.

जर्मनी में सलाफियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. इसी सिलसिले में पिछले एक महीने में दर्जन भर लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है. हाल ही में केन्या से आए तीन संदिग्धों को फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर गिरफ्तार किया गया. सोमालिया के आतंकवादी संगठन अल शबाब से इनके तार जुड़े होने की संभावना है. इस्लामिक स्टेट की ही तरह अल शबाब भी शरिया कानून को मानता है और सुन्नी मुसलामानों को उनका हक दिलाने की पैरवी करता है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में छह हजार से ज्यादा सलाफी मौजूद हैं. साल 2011 में यह संख्या चार हजार के करीब थी. इनमें से 400 आईएस का साथ देने के लिए सीरिया जा चुके हैं. संगठन इन लोगों तक पहुंचने के लिए ज्यादातर इंटरनेट का सहारा लेते हैं. फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब के जरिए वे जिहाद से जुड़ने के इच्छुक लोगों से संपर्क साधते हैं. अधिकतर ऑनलाइन वीडियो के जरिए वे लोगों से अपील करते हैं कि इराक और सीरिया जैसे देशों में सुन्नी मुसलमानों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाएं. इसके लिए चंदा भी मांगते हैं और हथियार उठाने को भी कहते हैं. इसे 'जिहाद जर्नलिज्म' का नाम भी दिया गया है.

इन संगठनों को कई बार सड़कों पर कुरान की प्रतियां बांटते हुए भी देखा जाता है. ये 21 से 25 की उम्र के युवाओं को अपना निशाना बनाते हैं. आंकड़े बताते हैं कि आईएस से जुड़ने वाले अधिकतर लोग अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर चुके थे, हालांकि उन्होंने यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं लिया था.

जर्मनी और आसपास के देशों में इस कारण मुस्लिम विरोधी भावनाएं सिर उठा रही हैं. जबकि सच्चाई यह है कि जिहाद और शरिया कानून से जुड़ने वाला तबका बेहद छोटा है और अधिकतर मुसलमान इसे गलत मानते हैं. जर्मनी के अलावा फ्रांस और ब्रिटेन भी इस समस्या से जूझ रहे हैं. ब्रिटेन से 400 लोग सीरिया जा कर आईएस से जुड़ चुके हैं, जबकि फ्रांस से 900. ये देश अब इन लोगों की वापसी पर रोक लगाने के बारे में भी सोच रहे हैं. लेकिन किसी भी व्यक्ति से उसकी नागरिकता छीन लेने के लिए नए कानून लागू करने होंगे. उम्मीद की जा रही है कि क्रिश्निक बी के मुकदमे से हालात में कुछ बदलाव देखे जाएंगे.

रिपोर्ट: सैरा बर्निंग/ईशा भाटिया

संपादन: आभा मोंढे

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